नियमों के अभाव में स्व-वित्तपोषित संस्थानों के कर्मचारी सेवानिवृत्ति लाभ के हकदार नहीं: इलाहाबाद हाईकोर्ट

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया है कि किसी विश्वविद्यालय के भीतर संचालित स्व-वित्तपोषित (Self-Financing) संस्थानों के कर्मचारी, विशिष्ट सेवा नियमावली या वैधानिक प्रावधानों की अनुपस्थिति में पेंशन और ग्रेच्युटी जैसे सेवानिवृत्ति लाभों का दावा नहीं कर सकते। हाईकोर्ट ने इस बात पर जोर दिया कि किसी संस्थान का विश्वविद्यालय का “अभिन्न अंग” होना मात्र उसे पेंशनरी लाभों का अधिकार नहीं देता, विशेषकर तब जब ऐसे लाभों का वित्तीय भार सरकारी खजाने पर नहीं डाला जा सकता।

यह निर्णय न्यायमूर्ति सौरभ श्याम शमशेरी की पीठ ने रेखा सिंह बनाम भारत संघ और अन्य (WRIT – A No. 4877 of 2021) के मामले में सुनाया है।

मामले की पृष्ठभूमि

याचिकाकर्ता रेखा सिंह ने इलाहाबाद विश्वविद्यालय के पत्राचार पाठ्यक्रम और सतत शिक्षा संस्थान (ICC&CE) में सहायक निदेशक और बाद में निदेशक के रूप में कार्य किया था। 31 अगस्त, 2017 को सेवानिवृत्त होने के बाद, उन्होंने पेंशन, ग्रेच्युटी और भविष्य निधि सहित अन्य सेवानिवृत्ति देयों की मांग की थी।

इससे पहले, याचिकाकर्ता ने 2016 में वेतन बकाया के लिए हाईकोर्ट का रुख किया था। उस समय (रिट-ए संख्या 31696/2016), हाईकोर्ट ने विश्वविद्यालय को नवंबर 2014 से उनकी सेवानिवृत्ति तक का वेतन भुगतान करने का निर्देश दिया था। हालांकि, तब भी हाईकोर्ट ने यह टिप्पणी की थी कि चूंकि ICC&CE एक स्व-वित्तपोषित संस्थान है, इसलिए वेतन भुगतान का दायित्व सरकारी खजाने या सरकार पर नहीं पड़ना चाहिए।

जब विश्वविद्यालय ने 30 मई, 2019 के एक कार्यालय आदेश के माध्यम से उनके सेवानिवृत्ति लाभों के दावे को खारिज कर दिया, तो याचिकाकर्ता ने वर्तमान रिट याचिका दायर की। विश्वविद्यालय का तर्क था कि यह संस्थान अस्थायी और स्व-वित्तपोषित है, और विश्वविद्यालय के अध्यादेश XXXII में संस्थान के कर्मचारियों के लिए सेवानिवृत्ति लाभों का कोई प्रावधान नहीं है।

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पक्षों के तर्क

याचिकाकर्ता की ओर से: वरिष्ठ अधिवक्ता श्री जी.के. सिंह ने तर्क दिया कि राज्य विश्वविद्यालय के मूल अध्यादेशों के तहत, ICC&CE को विश्वविद्यालय का “अभिन्न अंग” माना गया था और इसके कर्मचारी संबंधित विश्वविद्यालय विभागों की क्षमता का हिस्सा थे। उन्होंने आगे दलील दी कि जब 2005 में इलाहाबाद विश्वविद्यालय एक केंद्रीय विश्वविद्यालय बना, तो याचिकाकर्ता की सेवा शर्तें और पेंशन व ग्रेच्युटी के अधिकार इलाहाबाद विश्वविद्यालय अधिनियम, 2005 की धारा 5(d) के तहत सुरक्षित थे। इसके अतिरिक्त, याचिकाकर्ता ने कुछ दस्तावेजों का हवाला देते हुए कहा कि इसी संस्थान के कुछ अन्य कर्मचारियों को ऐसे लाभ दिए गए थे।

प्रतिवादी-विश्वविद्यालय की ओर से: विश्वविद्यालय की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता श्री मनीष गोयल ने कहा कि ICC&CE की प्रकृति हमेशा अस्थायी और स्व-वित्तपोषित रही है, जिसे 2005 के अधिनियम की धारा 30(2) के तहत भी बरकरार रखा गया है। उन्होंने स्पष्ट किया कि अध्यादेश XXXII के अनुसार, संस्थान की निधि केवल छात्रों से प्राप्त शुल्क और अन्य प्राप्तियों पर निर्भर है। उन्होंने तर्क दिया कि सेवानिवृत्ति देयों के लिए कोई प्रावधान मौजूद नहीं है और संस्थान का कोई भी कर्मचारी अधिकार के रूप में ये लाभ प्राप्त नहीं कर रहा है।

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हाईकोर्ट का विश्लेषण और टिप्पणियां

हाईकोर्ट ने वैधानिक ढांचे और संस्थान की प्रकृति का बारीकी से परीक्षण किया। हाईकोर्ट ने कहा कि भले ही संस्थान विश्वविद्यालय का अभिन्न अंग हो, लेकिन इसका अर्थ यह नहीं है कि इसके कर्मचारी विशिष्ट नियमों के बिना सेवानिवृत्ति लाभों के हकदार हो जाते हैं।

पेंशन के लिए कानूनी आधार की आवश्यकता पर चर्चा करते हुए, हाईकोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के प्रभु नारायण बनाम उत्तर प्रदेश राज्य (2004) 13 SCC 662 के फैसले का हवाला दिया, जिसमें कहा गया है:

“इसमें कोई संदेह नहीं है कि पेंशन कोई खैरात (bounty) नहीं है, यह एक कर्मचारी को दिया गया मूल्यवान अधिकार है, लेकिन सबसे पहले यह दिखाया जाना चाहिए कि कर्मचारी किसी विशेष नियम या योजना के तहत पेंशन का हकदार है।”

हाईकोर्ट ने आगे पाया कि याचिकाकर्ता रिकॉर्ड पर ऐसा कोई सेवा नियम पेश करने में विफल रही जो विशेष रूप से इस स्व-वित्तपोषित संस्थान के कर्मचारियों के लिए सेवानिवृत्ति लाभों का प्रावधान करता हो।

अन्य कर्मचारियों को लाभ मिलने के आधार पर याचिकाकर्ता के समानता (parity) के दावे पर हाईकोर्ट ने “नकारात्मक समानता” (Negative Equality) के सिद्धांत को लागू किया। आर. मुथुकुमार बनाम अध्यक्ष और प्रबंध निदेशक, टेंजेंटको (2022) और बसावराज बनाम विशेष भूमि अधिग्रहण अधिकारी का उल्लेख करते हुए हाईकोर्ट ने कहा:

“यह एक स्थापित कानूनी प्रस्ताव है कि संविधान का अनुच्छेद 14 अवैधता या धोखाधड़ी को बनाए रखने के लिए नहीं है, भले ही अन्य मामलों में गलत निर्णय लिए गए हों… यदि कुछ अन्य समान रूप से स्थित व्यक्तियों को अनजाने में या गलती से कुछ राहत/लाभ दिया गया है, तो ऐसा आदेश दूसरों को वही राहत प्राप्त करने का कोई कानूनी अधिकार नहीं देता है।”

हाईकोर्ट का निर्णय

हाईकोर्ट ने अंततः यह निष्कर्ष निकाला कि याचिकाकर्ता अपने दावे के समर्थन में कोई कानूनी प्रावधान स्थापित नहीं कर सकीं और वह नकारात्मक समानता का लाभ भी नहीं उठा सकतीं।

“उपरोक्त परिस्थितियों में, चूंकि याचिकाकर्ता सेवानिवृत्ति लाभों के अपने दावे का समर्थन करने के लिए कोई कानूनी प्रावधान दिखाने में सक्षम नहीं है और उसे नकारात्मक समानता का कोई लाभ भी नहीं मिल सकता है, इसलिए विवादित आदेश में हस्तक्षेप करने का कोई आधार नहीं है,” हाईकोर्ट ने कहा।

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इसी के साथ रिट याचिका खारिज कर दी गई।

केस विवरण

  • केस का शीर्षक: रेखा सिंह बनाम भारत संघ और अन्य
  • केस संख्या: रिट – ए संख्या 4877/2021
  • पीठ: न्यायमूर्ति सौरभ श्याम शमशेरी
  • याचिकाकर्ता के वकील: अनुराग खन्ना (वरिष्ठ अधिवक्ता), मोहम्मद आतिफ, प्रदीप कुमार उपाध्याय, राहुल सहाय, संजय सिंह
  • प्रतिवादी के वकील: ए.एस.जी.आई., चंदन शर्मा, रिजवान अली अख्तर

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