न्यायिक कार्य करते समय जिला अदालतों के न्यायाधीश DM और पुलिस कप्तान से ‘ऊपर’ हैं: इलाहाबाद हाईकोर्ट

अधीनस्थ न्यायपालिका के अधिकार और सम्मान को रेखांकित करते हुए इलाहाबाद हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है। हाईकोर्ट ने टिप्पणी की है कि न्यायिक कार्य का निर्वहन करते समय एक न्यायिक अधिकारी का दर्जा जिला मजिस्ट्रेट (DM) या जिला पुलिस प्रमुख से “ऊपर” होता है। न्यायमूर्ति अरुण कुमार सिंह देशवाल ने कहा कि जिला अदालतों द्वारा पारित न्यायिक आदेशों की अवहेलना करना “पूरी तरह से अक्षम्य” है और यह कानून के अधिकार को चुनौती देने के समान है।

यह सख्त टिप्पणी एक आवेदक सानू उर्फ राशिद की जमानत अर्जी और उससे जुड़े अवमानना मामले की सुनवाई के दौरान आई। इस मामले में ललितपुर के कोतवाली थाने के SHO और विवेचक (I.O.) द्वारा मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट (CJM) के बार-बार दिए गए नोटिसों के बावजूद सीसीटीवी फुटेज पेश न करने पर नाराजगी जाहिर की गई।

मामले की पृष्ठभूमि

आवेदक सानू पर बजाज फाइनेंस लिमिटेड से जुड़े ऋण धोखाधड़ी के मामले में भारतीय न्याय संहिता (BNS) की विभिन्न धाराओं के तहत केस दर्ज किया गया था। आवेदक के वकील ने आरोप लगाया कि पुलिस ने उसे 14 सितंबर, 2025 को ही अवैध हिरासत में ले लिया था, जबकि उसकी औपचारिक गिरफ्तारी 17 सितंबर को दिखाई गई।

इस अवैध हिरासत को साबित करने के लिए आवेदक की बहन ने ललितपुर के CJM के समक्ष सीसीटीवी फुटेज सुरक्षित रखने और उसे पेश करने के लिए अर्जी दी थी। CJM द्वारा तीन विशिष्ट आदेशों (22 सितंबर, 30 सितंबर और 3 नवंबर, 2025) के बावजूद पुलिस अधिकारियों ने फुटेज नहीं दी, जिसके बाद मामला हाईकोर्ट पहुंचा।

पक्षों की दलीलें

  • आवेदक: वकील ने तर्क दिया कि औपचारिक गिरफ्तारी से पहले हिरासत में रखना मौलिक अधिकारों का घोर उल्लंघन है और पुलिस अपनी अवैधता छिपाने के लिए जानबूझकर सीसीटीवी फुटेज दबा रही है।
  • राज्य/पुलिस: ललितपुर कोतवाली के SHO अनुराग अवस्थी और विवेचक नरेंद्र सिंह व्यक्तिगत रूप से पेश हुए और “बिना शर्त माफी” मांगी। उन्होंने दावा किया कि स्टोरेज क्षमता कम (दो महीने) होने के कारण फुटेज डिलीट हो गई। ललितपुर के SP ने वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के जरिए बताया कि उन्होंने आदेश पालन के निर्देश दिए थे, लेकिन उन्हें अधिकारियों की हठधर्मी की जानकारी नहीं थी।
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हाईकोर्ट का विश्लेषण और टिप्पणियां

हाईकोर्ट ने जिला न्यायपालिका के संवैधानिक महत्व और न्यायिक आदेशों के पालन की अनिवार्यता पर जोर दिया।

न्यायपालिका के दर्जे पर: सुप्रीम कोर्ट के ऑल इंडिया जजेस एसोसिएशन बनाम भारत संघ (2024) के फैसले का हवाला देते हुए न्यायमूर्ति देशवाल ने कहा:

“जब एक न्यायिक अधिकारी (चाहे वह जूनियर डिवीजन का ही क्यों न हो) अपने न्यायिक कार्य का निर्वहन कर रहा होता है, तो वह जिला मजिस्ट्रेट या जिला पुलिस प्रमुख और यहां तक कि राज्य के राजनीतिक प्रमुख से भी ऊपर होता है। उनके न्यायालय में प्रवेश करने वाले किसी भी व्यक्ति को संबंधित न्यायिक मजिस्ट्रेट की कुर्सी का सम्मान करना होगा और न्यायिक मजिस्ट्रेट के आदेश की अवहेलना करना न केवल अदालत की अवमानना है, बल्कि कानून के अधिकार को चुनौती देना भी है।”

अदालत ने आगे कहा कि जिला न्यायिक अधिकारी “न्यायपालिका की रीढ़” हैं क्योंकि वे आम नागरिकों के लिए राहत का पहला केंद्र होते हैं।

पुलिस के आचरण और सीसीटीवी पर: अदालत ने पाया कि फुटेज न देना परमवीर सिंह सैनी बनाम बलजीत सिंह (2021) के फैसले का उल्लंघन है। कोर्ट ने नोट किया कि यूपी के कई थानों में सीसीटीवी कैमरों का सही रख-रखाव न करना एक “नियमित विफलता” बन गया है, जो सीधे तौर पर व्यक्तिगत स्वतंत्रता को प्रभावित करता है।

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अवमानना पर: हाईकोर्ट ने माना कि CJM के आदेशों की अनदेखी जानबूझकर की गई थी। न्यायालय ने अवमानना अधिनियम, 1971 की धारा 10 के तहत अपनी शक्ति का प्रयोग करते हुए अधिकारियों को अधीनस्थ न्यायालय की अवमानना का दोषी पाया।

हाईकोर्ट का फैसला

  1. अवमानना के लिए सजा: SHO और विवेचक दोनों को अवमानना का दोषी ठहराया गया। उन्हें “अदालत की कार्यवाही समाप्त होने तक हिरासत” (Custody till rising of the Court) की सजा सुनाई गई और शाम 4:00 बजे के बाद रिहा किया गया।
  2. अवैध हिरासत का मुआवजा: 14 से 16 सितंबर, 2025 तक की हिरासत को अवैध मानते हुए, कोर्ट ने राज्य सरकार को आवेदक को 1 लाख रुपये मुआवजा देने का निर्देश दिया। यह राशि दोषी अधिकारियों के वेतन से वसूलने की छूट दी गई है।
  3. जमानत मंजूर: आवेदक की जमानत मंजूर कर ली गई, हालांकि उसे अपनी स्वेच्छा से दी गई अंडरटेकिंग के अनुसार फाइनेंस कंपनी को 15 लाख रुपये हस्तांतरित करने का निर्देश दिया गया है।
  4. निरीक्षण की शक्ति: हाईकोर्ट ने CJM और मजिस्ट्रेटों को सशक्त किया कि वे सीसीटीवी कैमरों की कार्यप्रणाली सुनिश्चित करने के लिए अपने अधिकार क्षेत्र के थानों का अदालती समय के बाद “औचक निरीक्षण” कर सकते हैं।
  5. DGP को निर्देश: उत्तर प्रदेश के पुलिस महानिदेशक को दोषी अधिकारियों के खिलाफ कार्रवाई करने और सुप्रीम कोर्ट की सीसीटीवी गाइडलाइंस का पालन सुनिश्चित करने का निर्देश दिया गया।
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केस विवरण:

  • केस का नाम: सानू उर्फ राशिद बनाम उत्तर प्रदेश राज्य
  • केस संख्या: क्रिमिनल मिसलेनियस बेल एप्लीकेशन संख्या 3821 ऑफ 2026
  • पीठ: न्यायमूर्ति अरुण कुमार सिंह देशवाल
  • आदेश की तिथि: 19 फरवरी, 2026

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