इलाहाबाद हाईकोर्ट ने चेक बाउंस (धारा 138 एन.आई. एक्ट) से जुड़े एक मामले में कार्यवाही को रद्द करने से इनकार कर दिया है। कोर्ट ने कड़ी टिप्पणी करते हुए कहा कि समरी ट्रायल (संक्षिप्त विचारण) में 13 साल का विलंब “अदालत की प्रक्रिया का घोर दुरुपयोग” है। न्यायमूर्ति सत्य वीर सिंह की पीठ ने स्पष्ट किया कि आरोपी को बचाव के पर्याप्त अवसर दिए गए थे और कानूनी कार्यवाही में देरी करने की रणनीति न्याय के विरुद्ध है।
आवेदक की ओर से अधिवक्ता विनोद कुमार यादव और राज नाथ भक्त पेश हुए, जबकि राज्य का पक्ष अपर शासकीय अधिवक्ता (A.G.A.) श्री सुभेंद्र सिंह और श्री बी.पी. पांडे ने रखा।
मामले की पृष्ठभूमि
यह विवाद वर्ष 2013 में आजमगढ़ जिले में धारा 138 एन.आई. एक्ट के तहत दर्ज की गई एक शिकायत से शुरू हुआ था। आवेदक बृजेश कुमार ने न्यायिक मजिस्ट्रेट, आजमगढ़ द्वारा 16 अक्टूबर 2025 को पारित उस आदेश को चुनौती दी थी, जिसमें मजिस्ट्रेट ने बचाव साक्ष्य प्रस्तुत करने का अवसर फिर से खोलने की याचिका खारिज कर दी थी।
निचली अदालत ने पाया कि आरोपी के हस्ताक्षर के नमूने 2023 में ही ले लिए गए थे, लेकिन उसने हस्तलेख विशेषज्ञ की रिपोर्ट पेश करने में कोई रुचि नहीं दिखाई। बार-बार चेतावनी और अंतिम अवसर देने के बावजूद पैरवी न होने के कारण 18 अगस्त 2025 को उसका साक्ष्य देने का अवसर समाप्त कर दिया गया था।
पक्षों के तर्क
आवेदक के वकील ने तर्क दिया कि निचली अदालत का आदेश अवैध है क्योंकि इससे उनके मुवक्किल को बचाव का उचित अवसर नहीं मिला। उन्होंने दावा किया कि हस्ताक्षर और हस्तलेखन की विशेषज्ञ रिपोर्ट मामले के सही फैसले के लिए अनिवार्य थी और इसे अनुमति न मिलने से आवेदक को अपूरणीय क्षति होगी।
दूसरी ओर, राज्य के वकील (A.G.A.) ने दलील दी कि एन.आई. एक्ट के तहत कार्यवाही ‘समरी’ प्रकृति की होती है। सुप्रीम कोर्ट के विभिन्न निर्देशों के अनुसार, ऐसी शिकायतों का निस्तारण छह महीने के भीतर हो जाना चाहिए। उन्होंने कोर्ट को बताया कि यह मामला एक दशक से अधिक समय से लंबित है और आवेदक केवल कार्यवाही को लंबा खींचना चाहता है।
कोर्ट का विश्लेषण और कानूनी सिद्धांत
कोर्ट ने एन.आई. एक्ट की धाराओं 143, 143A, 144 और 145 के विधायी उद्देश्य का बारीकी से परीक्षण किया। न्यायमूर्ति सिंह ने उल्लेख किया कि वर्ष 2002 के संशोधन के माध्यम से इन प्रावधानों को इसलिए लाया गया था ताकि चेक के माध्यम से होने वाले व्यापारिक लेन-देन को सुरक्षित बनाया जा सके और विवादों का त्वरित निपटारा हो।
कोर्ट ने रेखांकित किया कि:
- धारा 143(2) के तहत सुनवाई दिन-प्रतिदिन (day-to-day) होनी चाहिए।
- धारा 143(3) निर्देश देती है कि शिकायत दर्ज होने के छह महीने के भीतर ट्रायल पूरा करने का प्रयास किया जाए।
हाईकोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के महत्वपूर्ण निर्णयों, विशेष रूप से In Re: Expeditious Trial of Cases Under Section 138 N.I. Act (2021) और हालिया Sanjabij Tari vs. Kishore S. Borcar & Anr. (2025) का संदर्भ दिया।
वर्तमान मामले में हुई अत्यधिक देरी पर कोर्ट ने टिप्पणी की:
“12 साल से अधिक समय बीत चुका है, जो समरी ट्रायल के अधिनिर्णयन में अत्यधिक देरी का एक प्रत्यक्ष उदाहरण है। ऐसी लंबी लंबित स्थिति समरी ट्रायल के मामलों में अदालत की प्रक्रिया का घोर दुरुपयोग है।”
कानूनी सूक्ति “In diem vivere in lege sunt detestabilis” का उल्लेख करते हुए कोर्ट ने कहा:
“कानूनी कार्यवाही में अनावश्यक टालमटोल या विलंब की रणनीति न्याय के लिए घृणित है। ऐसी सुस्ती न केवल जनता के विश्वास को कम करती है बल्कि कानून को राहत के बजाय संकट का साधन बना देती है। इस संदर्भ में विलियम शेक्सपियर के शब्द सटीक बैठते हैं: ‘समय न गंवाएं; देरी के परिणाम खतरनाक होते हैं।'”
पीठ ने आगे कहा कि इस तरह की देरी संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत प्राप्त ‘त्वरित सुनवाई के अधिकार’ के भी विरुद्ध है।
अदालत का निर्णय
न्यायमूर्ति सत्य वीर सिंह ने निचली अदालत के आदेश में कोई अवैधता नहीं पाई। उन्होंने नोट किया कि आरोपी का बयान 2021 से दर्ज किया जा रहा था, लेकिन उसने वर्षों तक कोई बचाव दस्तावेज पेश नहीं किया।
“इस कोर्ट को आक्षेपित आदेश में कोई अवैधता या अनियमितता नहीं मिली क्योंकि ट्रायल कोर्ट द्वारा बचाव के पर्याप्त अवसर प्रदान किए गए थे,” पीठ ने कहा।
हाईकोर्ट ने कार्यवाही रद्द करने की मांग वाली याचिका को खारिज करते हुए निर्देश दिया कि ऐसे मामलों को प्राथमिकता के आधार पर निपटाया जाए। कोर्ट ने आदेश दिया कि इस फैसले की प्रति संबंधित जिला एवं सत्र न्यायाधीश के समक्ष रखी जाए ताकि यह सुनिश्चित हो सके कि वैधानिक अवधि के भीतर पुराने मामलों का निस्तारण करने का प्रयास किया जाए।
केस विवरण:
- केस शीर्षक: बृजेश कुमार बनाम उत्तर प्रदेश राज्य और अन्य
- केस संख्या: APPLICATION U/S 528 BNSS No. 50246 of 2025
- पीठ: न्यायमूर्ति सत्य वीर सिंह
- आवेदक के वकील: विनोद कुमार यादव, राज नाथ भक्त
- विपक्षी के वकील: जी.ए., शुभेंद्र सिंह, बी.पी. पांडे

