सुप्रीम कोर्ट ने ‘कंसीडर ज्यूरिसप्रूडेंस’ की आलोचना की; 16 साल पुराने विवाद में हाईकोर्ट को बिना रिमांड के निर्णय लेने का निर्देश

सुप्रीम कोर्ट ने अदालतों द्वारा अपनाई जाने वाली उस “कंसीडर ज्यूरिसप्रूडेंस” (मामले को बार-बार विचार के लिए वापस भेजना) पर कड़ी नाराजगी जताई है, जिसमें मामलों को बिना किसी अंतिम निर्णय के बार-बार संबंधित अधिकारियों के पास भेज दिया जाता है। एक कथित अवमाननाकर्ता द्वारा हाईकोर्ट के आरोपों को तय करने (framing of charges) के आदेश के खिलाफ दायर अपील पर सुनवाई करते हुए जस्टिस पमिदिघंटम श्री नरसिम्हा और जस्टिस आलोक अराधे की पीठ ने टिप्पणी की कि ऐसी प्रथाएं “कोर्ट से गेंद बाहर फेंकने” (throw the ball out of the Court) जैसी हैं और न्याय प्रणाली को नुकसान पहुंचाती हैं।

यह विवाद 16 साल से अधिक समय से चल रहा है, जिसे एक निजी कॉलेज के व्याख्याताओं (lecturers) ने सरकारी खजाने से वेतन भुगतान की मांग को लेकर शुरू किया था। हाईकोर्ट ने बार-बार राज्य सरकार को दावों पर “पुनर्विचार” (reconsider) करने का निर्देश दिया था, जिससे बार-बार अस्वीकृति और सिलसिलेवार रिट याचिकाओं का एक चक्र बन गया। सुप्रीम कोर्ट के समक्ष यह मामला हाईकोर्ट के उस अंतरिम आदेश की जांच के लिए आया था, जिसमें अवमानना कार्यवाही के दौरान सरकारी अधिकारी के खिलाफ आरोप तय करने का निर्देश दिया गया था।

मामले की पृष्ठभूमि

प्रतिवादियों की नियुक्ति 1993 में एक निजी कॉलेज में व्याख्याताओं के रूप में हुई थी। कॉलेज को शुरू में वित्तीय सहायता प्राप्त थी, जो वर्ष 2000 की सरकारी नीति के बाद बंद हो गई। इस नीति के तहत गैर-सहायता प्राप्त सरकारी कॉलेजों को वित्तीय सहायता पर रोक लगा दी गई थी। प्रतिवादियों ने अनुच्छेद 226 के तहत इसे चुनौती दी और पदों की स्वीकृति तथा वेतन भुगतान की मांग की।

इस मुकदमेबाजी के इतिहास में तीन प्रमुख दौर रहे:

  1. पहली रिट याचिका (2010): इसे शिक्षा निदेशक को “बोलता हुआ और तर्कसंगत आदेश” (speaking and reasoned order) पारित करने के निर्देश के साथ निपटाया गया। इसके परिणामस्वरूप 25 मार्च 2011 को दावा खारिज कर दिया गया।
  2. दूसरी रिट याचिका (2013): हाईकोर्ट ने 2011 की अस्वीकृति को रद्द कर दिया और अधिकारियों को दावे पर “पुनर्विचार” करने का निर्देश दिया। इसके बाद 1 जुलाई 2013 को फिर से दावा खारिज हुआ।
  3. तीसरी रिट याचिका (2023): हाईकोर्ट ने 2013 के आदेश को रद्द कर दिया और मामले को “नए आदेश” के लिए प्रमुख सचिव को भेज दिया।
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अवमानना याचिका लंबित रहने के दौरान, विभाग ने 13 दिसंबर 2023 और फिर 9 मई 2025 को फिर से दावे को खारिज कर दिया। इन आदेशों के बावजूद, हाईकोर्ट ने अनुपालन के नए हलफनामे दाखिल करने का निर्देश जारी रखा और अंततः 28 मई 2025 को आरोप तय करने का आदेश दिया।

कोर्ट का विश्लेषण: ‘कंसीडर ज्यूरिसप्रूडेंस’ पर प्रहार

सुप्रीम कोर्ट ने इस मुकदमेबाजी को “एपिसोड्स” (कड़ियों) की एक श्रृंखला के रूप में वर्णित किया। कोर्ट ने न्यायिक प्रक्रिया के संबंध में कई महत्वपूर्ण टिप्पणियां कीं:

  • रिमांड की विफलता: कोर्ट ने कहा, “इसमें कोई संदेह नहीं है कि आजकल सामान्य रूप से अपनाई जा रही ‘कंसीडर ज्यूरिसप्रूडेंस’, जो कि मामले को कोर्ट से बाहर फेंकने का एक तरीका है, प्रतिकूल प्रभाव डालती है और व्यवस्था को नुकसान पहुंचाती है।”
  • राहत प्रदान करने का कर्तव्य: पीठ ने स्पष्ट किया, “जब किसी अधिकार का दावा कानूनी और उचित हो, तो राहत मिलनी ही चाहिए। संवैधानिक या वैधानिक उपचार अकादमिक चर्चा के लिए नहीं होते हैं। यदि कोई मामला राहत का हकदार है, तो उसे तुरंत और बिना किसी हिचकिचाहट के दिया जाना चाहिए।”
  • निर्देशों की स्पष्टता: कोर्ट ने पाया कि हाईकोर्ट के आदेशों में “अधिकार के अस्तित्व के बारे में स्पष्ट निर्देश” की कमी थी और यह स्पष्ट नहीं था कि सरकार को वास्तव में क्या अनुपालन करना है।
  • अवमानना अधिकार क्षेत्र का दुरुपयोग: पीठ ने अवमानना क्षेत्राधिकार का उपयोग करने की हालिया प्रवृत्ति पर भी ध्यान दिया, जहाँ अपील योग्य आदेश पारित होने के बावजूद त्वरित राहत के लिए अवमानना याचिका दायर की जा रही है।
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सुप्रीम कोर्ट का निर्णय

सुप्रीम कोर्ट ने 16 साल पुरानी इस मुकदमेबाजी को समाप्त करने के लिए निम्नलिखित निर्देश दिए:

  1. नवीनतम आदेश को चुनौती: प्रतिवादियों को 9 मई 2025 के सरकार के नवीनतम अस्वीकृति आदेश के खिलाफ रिट याचिका दायर करने की अनुमति दी गई है।
  2. संयुक्त सुनवाई: नई रिट याचिका की सुनवाई हाईकोर्ट में लंबित अवमानना कार्यवाही के साथ की जाएगी।
  3. दोबारा रिमांड नहीं: सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट निर्देश दिया: “हाईकोर्ट मामले को पुनर्विचार के लिए अधिकारियों के पास वापस नहीं भेजेगा क्योंकि सरकार का दृष्टिकोण स्पष्ट रूप से सामने आ चुका है।”
  4. गुण-दोष पर निर्णय: यदि हाईकोर्ट मामले के गुणों से संतुष्ट है, तो उसे अनुपालन के लिए “स्पष्ट और श्रेणीबद्ध निर्देश” जारी करने चाहिए। यदि नहीं, तो वह सरल कारणों के साथ रिट याचिका को खारिज कर सकता है।
  5. समय सीमा: हाईकोर्ट के माननीय मुख्य न्यायाधीश से अनुरोध किया गया है कि वे इन मामलों को एक उपयुक्त पीठ को सौंपें ताकि 30 अप्रैल 2026 तक अंतिम आदेश पारित किया जा सके।
  • केस का शीर्षक: महेंद्र प्रसाद अग्रवाल बनाम अरविंद कुमार सिंह व अन्य
  • केस संख्या: सिविल अपील संख्या…/2026 (एस.एल.पी. (सी) संख्या 17141/2025)

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