अमेरिकी सुप्रीम कोर्ट ने ट्रंप के वैश्विक टैरिफ को किया रद्द, आपातकालीन शक्तियों के इस्तेमाल को असंवैधानिक ठहराया

वाशिंगटन, डी.सी. — अमेरिकी सुप्रीम कोर्ट ने 6-3 के एक ऐतिहासिक फैसले में राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप द्वारा लगाए गए व्यापक वैश्विक टैरिफ (आयात शुल्क) को असंवैधानिक करार देते हुए खारिज कर दिया है। अदालत ने निर्णय सुनाया है कि राष्ट्रपति ने 1977 के इंटरनेशनल इमरजेंसी इकोनॉमिक पॉवर्स एक्ट (IEEPA) के तहत एकतरफा आयात शुल्क लगाकर अपने वैधानिक और संवैधानिक अधिकारों का स्पष्ट उल्लंघन किया है।

चीफ जस्टिस जॉन रॉबर्ट्स द्वारा लिखे गए बहुमत के फैसले में यह स्पष्ट किया गया कि अमेरिकी संविधान के तहत कराधान (टैक्स लगाने) का अधिकार सख्ती से केवल कांग्रेस (संसद) के पास है, और IEEPA कार्यपालिका को टैरिफ लगाने का कोई अधिकार नहीं देता।

सुप्रीम कोर्ट के समक्ष मुख्य कानूनी प्रश्न यह था कि क्या इंटरनेशनल इमरजेंसी इकोनॉमिक पॉवर्स एक्ट (IEEPA)—एक ऐसा कानून जो राष्ट्रीय आपातकाल के दौरान राष्ट्रपति को वाणिज्यिक गतिविधियों को विनियमित करने की अनुमति देता है—कार्यपालिका को एकतरफा आयात शुल्क लगाने का अधिकार देता है?

अदालत ने 6-3 के बहुमत से इसका उत्तर ‘ना’ में दिया। बहुमत पीठ में चीफ जस्टिस जॉन रॉबर्ट्स, जस्टिस सोनिया सोटोमायोर, जस्टिस एलेना कगन, जस्टिस केतनजी ब्राउन जैक्सन, जस्टिस नील गोरसच और जस्टिस एमी कोनी बैरेट शामिल थे, जिन्होंने इन टैरिफ को रद्द कर दिया। वहीं, जस्टिस क्लेरेंस थॉमस, जस्टिस सैमुअल अलिटो और जस्टिस ब्रेट कवानुघ ने इस फैसले से असहमति जताई।

यह कानूनी विवाद 2025 में शुरू हुआ था, जब राष्ट्रपति ट्रंप ने व्यापार घाटे और अवैध फेंटेनाइल की घुसपैठ का हवाला देते हुए IEEPA के तहत राष्ट्रीय आर्थिक आपातकाल की घोषणा की थी। इन शक्तियों का इस्तेमाल करते हुए, ट्रंप प्रशासन ने “लिबरेशन डे” (अप्रैल 2025) के तहत दुनिया भर से आने वाले लगभग सभी आयातों पर 10 प्रतिशत का बेसलाइन ड्यूटी (शुल्क) लागू कर दिया था। इसके अलावा कुछ देशों पर 15 से 50 प्रतिशत तक का अतिरिक्त टैरिफ लगाया गया और चीन, मैक्सिको व कनाडा के उत्पादों पर फेंटेनाइल से संबंधित सख्त शुल्क भी लगाए गए।

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इस अभूतपूर्व कदम के खिलाफ छोटे व्यवसायों के गठजोड़, कई राज्यों और अमेरिकी आयातकों ने निचली संघीय अदालतों में याचिकाएं दायर कीं। निचली अदालतों (फेडरल ट्रेड कोर्ट) ने पहले ही यह फैसला सुना दिया था कि ट्रंप प्रशासन के पास IEEPA के तहत इस तरह के शुल्क लगाने का अधिकार नहीं है। इसी फैसले के खिलाफ सरकार ने सुप्रीम कोर्ट का रुख किया था।

प्रभावित व्यवसायों और राज्यों का तर्क था कि टैरिफ लगाना मूल रूप से कर (Tax) लगाने की शक्ति है, जिसे अमेरिकी संविधान के अनुच्छेद I के तहत स्पष्ट रूप से कांग्रेस के लिए आरक्षित रखा गया है। उन्होंने यह भी दलील दी कि IEEPA को विदेशी खतरों के खिलाफ संपत्ति को फ्रीज करने और प्रतिबंध लगाने के लिए बनाया गया था, न कि पूरे अमेरिकी टैरिफ ढांचे को एकतरफा तरीके से बदलने के लिए।

सरकार ने दलील दी कि राष्ट्रीय आपातकाल के दौरान IEEPA राष्ट्रपति को असाधारण लचीलापन प्रदान करता है। सरकार ने कानून के उस प्रावधान का हवाला दिया जो राष्ट्रपति को विदेशी खतरों से निपटने के लिए “आयात या निर्यात को विनियमित” (regulate) करने की अनुमति देता है। सरकार का तर्क था कि टैरिफ लगाना, आयात को विनियमित करने की परिभाषा के अंतर्गत ही आता है।

सुप्रीम कोर्ट ने सरकार की कानूनी व्याख्या को सिरे से खारिज कर दिया। चीफ जस्टिस रॉबर्ट्स ने कराधान के संबंध में शक्तियों के पृथक्करण (Separation of Powers) के सिद्धांत पर जोर दिया। उन्होंने अपने फैसले में लिखा, “संविधान निर्माताओं ने कराधान की शक्ति का कोई भी हिस्सा कार्यपालिका (Executive Branch) को नहीं सौंपा है।”

IEEPA के प्रावधानों का विश्लेषण करते हुए, अदालत ने टैरिफ शक्तियों के स्पष्ट उल्लेख की अनुपस्थिति को रेखांकित किया। चीफ जस्टिस ने लिखा, “IEEPA राष्ट्रपति को जांच करने, जांच लंबित रहने तक रोक लगाने, आयात या निर्यात को विनियमित करने, निर्देशित करने, अमान्य करने या प्रतिबंधित करने का अधिकार देता है। विशिष्ट शक्तियों की इस लंबी सूची में कहीं भी टैरिफ या शुल्क का कोई जिक्र नहीं है।”

अदालत ने यह स्थापित किया कि जब कार्यपालिका असीमित मात्रा और दायरे के टैरिफ लगाने जैसी असाधारण शक्तियों का दावा करती है, तो इसके लिए स्पष्ट विधायी (संसदीय) अधिकार की आवश्यकता होती है। फैसले में कहा गया, “यदि कांग्रेस का इरादा टैरिफ लगाने की विशिष्ट और असाधारण शक्ति सौंपने का होता, तो वह अन्य टैरिफ कानूनों की तरह इसे स्पष्ट रूप से लिखती।”

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जस्टिस नील गोरसच ने अपने सहमति वाले मत (Concurring Opinion) में लिखा, “संविधान देश की कानून बनाने की शक्तियां केवल कांग्रेस में निहित करता है।”

दूसरी ओर, जस्टिस ब्रेट कवानुघ ने जस्टिस थॉमस और जस्टिस अलिटो के साथ अपने असहमति वाले मत (Dissenting Opinion) में तर्क दिया कि राष्ट्रपति की यह कार्रवाई कांग्रेस द्वारा दिए गए वैधानिक दायरे के भीतर थी। कवानुघ ने लिखा, “यहां विचाराधीन टैरिफ एक बुद्धिमान नीति हो सकती है या नहीं भी, लेकिन पाठ, इतिहास और पूर्व उदाहरणों के अनुसार, वे स्पष्ट रूप से वैध हैं।”

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सुप्रीम कोर्ट ने निष्कर्ष निकाला कि IEEPA राष्ट्रपति को टैरिफ लगाने के लिए अधिकृत नहीं करता है। इसके साथ ही, अदालत ने निचली अदालतों के फैसले को बरकरार रखते हुए आपातकालीन वैश्विक टैरिफ को तत्काल प्रभाव से रद्द कर दिया।

हालांकि, अदालत ने इस जटिल मुद्दे पर कोई निर्देश नहीं दिया कि अमेरिकी आयातकों से पहले ही वसूले जा चुके अरबों डॉलर के टैरिफ को सरकार कैसे वापस करेगी। जस्टिस कवानुघ ने अपनी असहमति में इस बात का जिक्र करते हुए लिखा: “अदालत आज इस बारे में कुछ नहीं कहती है कि सरकार को आयातकों से एकत्र किए गए अरबों डॉलर वापस करने चाहिए या नहीं, और यदि हां, तो कैसे। लेकिन वह प्रक्रिया संभवतः एक भारी ‘गड़बड़ (mess)’ साबित होने वाली है।”

गौरतलब है कि यह फैसला व्यापार विस्तार अधिनियम, 1962 की धारा 232 या व्यापार अधिनियम, 1974 की धारा 301 जैसे अन्य विशिष्ट कानूनों के तहत लगाए गए शुल्कों को अमान्य नहीं करता है।

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