दिल्ली हाई कोर्ट ने कहा है कि किसी आवासीय संपत्ति के ठीक बगल में सार्वजनिक मूत्रालय और खुला कूड़ादान होना नागरिक के स्वच्छ, स्वस्थ और गरिमापूर्ण जीवन के संवैधानिक अधिकार का उल्लंघन है। अदालत ने नगर निगम दिल्ली (एमसीडी) को ऐसे ढांचों को तुरंत हटाने और कचरा प्रबंधन की वैकल्पिक व्यवस्था करने का निर्देश दिया।
न्यायमूर्ति अमित बंसल ने यह आदेश एक अधिवक्ता द्वारा दायर याचिका पर सुनवाई करते हुए पारित किया। याचिकाकर्ता ने शिकायत की थी कि उसके मकान की पूर्वी दीवार से सटे स्थान पर बिना अनुमति के खुला कूड़ादान और मूत्रालय बना दिया गया है, जिसका उपयोग आसपास के लगभग 150 लोग कर रहे हैं। कई बार शिकायत करने के बावजूद एमसीडी ने न तो सफाई व्यवस्था सुधारी और न ही ढांचों को हटाया।
अदालत ने कहा कि स्वच्छ और स्वास्थ्यकर वातावरण, स्वस्थ जीवन का अभिन्न हिस्सा है और इसके अभाव में गरिमा के साथ जीने का अधिकार प्रभावित होता है। न्यायालय ने स्पष्ट किया कि संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत जीवन के अधिकार में स्वच्छ पर्यावरण भी शामिल है।
अदालत ने रिकॉर्ड पर मौजूद तस्वीरों का उल्लेख करते हुए कहा कि इलाके की स्थिति अत्यंत खराब है और दुर्गंध के कारण निवासियों को असहनीय परिस्थितियों में रहना पड़ रहा है। न्यायालय ने माना कि इस तरह की व्यवस्था न केवल याचिकाकर्ता बल्कि आसपास रहने वाले अन्य लोगों के लिए भी गंभीर असुविधा और स्वास्थ्य संबंधी खतरा पैदा करती है।
मामले को “स्पष्ट रूप से उपद्रव” बताते हुए हाई कोर्ट ने एमसीडी को निर्देश दिया कि घर के पास स्थित खुले कूड़ादान और सार्वजनिक मूत्रालय को तत्काल हटाया जाए। साथ ही, निगम को सूखा और गीला कचरा अलग-अलग रखने के लिए ढका हुआ कूड़ादान उपलब्ध कराने और उसे याचिकाकर्ता के मकान से उचित दूरी पर स्थापित करने को कहा गया।

