उचित प्रकाशन के अभाव में ‘अतिरिक्त विषय’ श्रेणी को समाप्त करने का निर्णय लागू करने योग्य नहीं: दिल्ली हाईकोर्ट ने सीबीएसई की अपील खारिज की

दिल्ली हाईकोर्ट की एक खंडपीठ, जिसमें मुख्य न्यायाधीश देवेंद्र कुमार उपाध्याय और न्यायमूर्ति तेजस कारिया शामिल थे, ने केंद्रीय माध्यमिक शिक्षा बोर्ड (सीबीएसई) द्वारा दायर एक इंट्रा-कोर्ट अपील को खारिज कर दिया है। हाईकोर्ट ने कहा कि प्राइवेट उम्मीदवारों के लिए ‘अतिरिक्त विषय’ (Additional Subject) श्रेणी को बंद करने का सीबीएसई का निर्णय 2026 की परीक्षाओं के लिए लागू नहीं किया जा सकता, क्योंकि इसके परीक्षा उप-नियमों (Examination Bye-Laws) में किए गए संशोधन का उचित और तर्कसंगत प्रकाशन नहीं किया गया था।

मामले की पृष्ठभूमि

यह मामला सेंट्रल बोर्ड ऑफ सेकेंडरी एजुकेशन बनाम प्रभ्रूप कौर कपूर व अन्य (LPA 72/2026) से संबंधित है। यह विवाद तब शुरू हुआ जब 2024 और 2025 में कक्षा 12वीं की परीक्षा पास करने वाले कई छात्रों ने 2026 की बोर्ड परीक्षाओं में एक अतिरिक्त विषय के लिए उपस्थित होने की अनुमति मांगी। सीबीएसई के पुराने परीक्षा उप-नियमों की धारा 43(i) के तहत, छात्रों को परीक्षा पास करने के दो साल के भीतर प्राइवेट उम्मीदवार के रूप में अतिरिक्त विषय लेने की अनुमति थी।

हालांकि, सीबीएसई ने 4 सितंबर, 2025 और 15 सितंबर, 2025 को नोटिस जारी किए, जिसमें ‘अतिरिक्त विषय’ की श्रेणी को हटा दिया गया था। छात्रों ने इन सूचनाओं को हाईकोर्ट में चुनौती दी। एकल न्यायाधीश ने 5 फरवरी, 2026 को छात्रों के पक्ष में निर्णय देते हुए सीबीएसई को उन्हें पंजीकृत करने का निर्देश दिया था। सीबीएसई ने इसी आदेश के खिलाफ खंडपीठ के समक्ष अपील दायर की थी।

पक्षों की दलीलें

अपीलकर्ता (सीबीएसई): अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल श्री चेतन शर्मा ने तर्क दिया कि बोर्ड की गवर्निंग बॉडी ने 26 दिसंबर, 2024 को राष्ट्रीय शिक्षा नीति-2020 के अनुरूप अतिरिक्त विषय श्रेणी को बंद करने का निर्णय लिया था। सीबीएसई का दावा था कि:

  • इस संशोधन को 27 फरवरी, 2025 को सीबीएसई की वेबसाइट पर ‘गवर्निंग बॉडी मिनट्स’ टैब के तहत प्रकाशित किया गया था।
  • छात्र “वैध अपेक्षा” (Legitimate Expectation) के सिद्धांत का दावा नहीं कर सकते क्योंकि यह निर्णय जनहित में लिया गया एक नीतिगत बदलाव था।
  • छात्रों को नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ ओपन स्कूलिंग (NIOS) के माध्यम से अतिरिक्त विषयों में बैठने का विकल्प उपलब्ध था।
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प्रतिवादी (छात्र): वरिष्ठ अधिवक्ता श्री राजशेखर राव ने दलील दी कि संशोधन के बारे में उन्हें कभी प्रभावी ढंग से सूचित नहीं किया गया। उनका कहना था कि:

  • केवल ‘गवर्निंग बॉडी मिनट्स’ टैब के तहत मिनट्स पोस्ट करना परीक्षा उप-नियमों में बदलाव का उचित प्रकाशन नहीं माना जा सकता।
  • छात्र पिछले एक-दो साल से मौजूदा नियमों के आधार पर अतिरिक्त विषयों की तैयारी कर रहे थे।
  • आम जनता को इस श्रेणी के खत्म होने की जानकारी पहली बार सितंबर 2025 में मिली, जो तैयारी कर रहे छात्रों के लिए बहुत देर हो चुकी थी।
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हाईकोर्ट का विश्लेषण

हाईकोर्ट ने इस बात पर ध्यान केंद्रित किया कि क्या संशोधन को “उपयुक्त तरीके” से प्रचारित किया गया था। सुप्रीम कोर्ट के बी.के. श्रीनिवासन और अन्य बनाम कर्नाटक राज्य और अन्य (1987) के फैसले का हवाला देते हुए हाईकोर्ट ने जोर दिया कि अधीनस्थ कानूनों (subordinate legislation) को प्रभावी होने के लिए उचित तरीके से प्रकाशित किया जाना अनिवार्य है।

हाईकोर्ट ने टिप्पणी की:

“सीबीएसई की ‘अतिरिक्त विषय’ श्रेणी की परीक्षा में बैठने का इरादा रखने वाले किसी भी छात्र से यह उम्मीद की जाती है कि वह सीबीएसई की वेबसाइट पर ‘परीक्षा उप-नियम’ (Examination Bye-Laws) टैब के तहत नियमों की तलाश करेगा… कोई छात्र वेबसाइट पर ‘गवर्निंग बॉडी मिनट्स’ टैब पर क्लिक नहीं करेगा।”

हाईकोर्ट ने पाया कि सीबीएसई की पहले की प्रथा यह रही है कि वह मिनट्स अपलोड करने के अलावा संशोधनों को अलग से अधिसूचित करता है। ऐसा न करके सीबीएसई ने छात्रों के साथ “भारी अन्याय” किया है।

वैध अपेक्षा (Legitimate Expectation) के सिद्धांत पर हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि यह भारतीय प्रशासनिक कानून का हिस्सा है जो मनमानेपन पर रोक लगाता है। हाईकोर्ट ने कहा:

“वर्तमान मामले में, छात्रों के पास सीबीएसई के परीक्षा उप-नियमों के खंड 43(i) के तहत अतिरिक्त विषय की परीक्षा में बैठने का अधिकार मौजूद था। इसी अधिकार के आधार पर छात्रों ने उच्च शिक्षा पाठ्यक्रमों में प्रवेश न लेकर तैयारी करने का निर्णय लिया था।”

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हाईकोर्ट ने निष्कर्ष निकाला कि यह संशोधन केवल 15 सितंबर, 2025 से ही प्रभावी माना जा सकता है जब इसे औपचारिक रूप से सार्वजनिक नोटिस के माध्यम से अधिसूचित किया गया था। उन छात्रों पर इसे पिछली तारीख से लागू करना जो पहले से तैयारी शुरू कर चुके थे, “पूरी तरह से मनमाना और तर्कहीन” है।

निर्णय

खंडपीठ ने सीबीएसई की अपील को खारिज कर दिया और एकल न्यायाधीश के निर्देश को बरकरार रखा। हाईकोर्ट ने आदेश दिया:

“…सीबीएसई छात्रों के ‘अतिरिक्त विषय’ की परीक्षा के पंजीकरण के लिए तत्काल आवश्यक व्यवस्था करे, यदि ऐसी व्यवस्था पहले से नहीं की गई है, तो आज से तीन कार्य दिवसों के भीतर इसे पूरा किया जाए।”

हाईकोर्ट ने कहा कि सीबीएसई की कार्रवाई संविधान के अनुच्छेद 14 के तहत गैर-मनमानेपन के सिद्धांत का उल्लंघन है।

केस का शीर्षक: सेंट्रल बोर्ड ऑफ सेकेंडरी एजुकेशन बनाम प्रभ्रूप कौर कपूर व अन्य

केस संख्या: LPA 72/2026

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