पटना हाई कोर्ट ने बिहार मद्यनिषेध एवं उत्पाद अधिनियम, 2016 के प्रभावी क्रियान्वयन में राज्य मशीनरी की “विफलता” पर गंभीर चिंता जताते हुए कहा है कि इससे नागरिकों का जीवन जोखिम में पड़ गया है और अवैध शराब की समानांतर अर्थव्यवस्था विकसित हो गई है।
न्यायमूर्ति पूर्णेंदु सिंह ने यह टिप्पणी एक 19 वर्षीय अभियुक्त की अग्रिम जमानत याचिका पर सुनवाई के दौरान की।
अदालत ने कहा:
“यह न्यायालय पाता है कि बिहार मद्यनिषेध एवं उत्पाद अधिनियम, 2016 के प्रावधानों के प्रभावी क्रियान्वयन में राज्य मशीनरी की विफलता के कारण राज्य के नागरिकों का जीवन जोखिम में पड़ गया है।”
पीठ ने कहा कि मद्यनिषेध से शराबखोरी पर अंकुश लगने के बजाय अवैध शराब का नेटवर्क और भूमिगत आपूर्ति तंत्र विकसित हो गया है।
अदालत ने यह भी कहा कि नाबालिगों तथा 18–19 वर्ष की आयु के युवाओं को अवैध शराब की तस्करी में इस्तेमाल किए जाने की “चिंताजनक प्रवृत्ति” सामने आई है।
पीठ ने कहा कि मिथाइल अल्कोहल तथा यूरिया जैसे पदार्थों से मिलाई गई जहरीली शराब के सेवन से राज्य में बड़ी संख्या में मौतें हुई हैं।
वैज्ञानिक तथ्यों का उल्लेख करते हुए अदालत ने कहा:
- पाँच मिलीलीटर मिथाइल अल्कोहल से अंधत्व हो सकता है
- दस मिलीलीटर से अधिक मात्रा घातक हो सकती है
- इससे एसिडोसिस और किडनी फेल होने जैसी गंभीर स्थितियाँ उत्पन्न हो सकती हैं
अदालत ने याचिकाकर्ता को यह निर्देश देते हुए अग्रिम जमानत दी कि गिरफ्तारी या आत्मसमर्पण की स्थिति में चार सप्ताह के भीतर ₹10,000 के निजी मुचलके पर रिहा किया जाए।
साथ ही गोपालगंज की निचली अदालत को निर्देश दिया गया कि याचिकाकर्ता के आपराधिक पूर्ववृत्त का सत्यापन किया जाए। यदि वह अन्य मामलों में संलिप्त पाया जाता है तो जमानत स्वतः निरस्त हो जाएगी।
पीठ ने कहा कि न्यायालयों को 18 से 35 वर्ष आयु वर्ग के युवा आरोपियों के उचित पुनर्वास के लिए मुख्य सचिव को सलाह देने के अपने संवैधानिक दायित्व से “पल्ला नहीं झाड़ना चाहिए।”
इधर राष्ट्रीय लोक मोर्चा के विधायक माधव आनंद ने विधानसभा के बाहर मद्यनिषेध कानून की विस्तृत समीक्षा की मांग करते हुए कहा कि कानून लागू हुए दस वर्ष हो चुके हैं और इसकी प्रभावशीलता का मूल्यांकन किया जाना चाहिए।
हालांकि राज्य सरकार ने इस मांग को खारिज कर दिया।

