सुप्रीम कोर्ट ने बुधवार को पूर्वोत्तर राज्यों तथा अन्य क्षेत्रों के नागरिकों के खिलाफ कथित भेदभाव और हिंसा को रोकने के लिए दायर जनहित याचिका पर विचार करने से इंकार कर दिया। कोर्ट ने कहा कि व्यक्तियों की पहचान नस्ल, क्षेत्र, लिंग या जाति के आधार पर करना स्वतंत्रता के इतने वर्षों बाद “प्रतिगामी रास्ते” पर चलने के समान होगा। साथ ही कोर्ट ने अटॉर्नी जनरल से याचिका को उपयुक्त प्राधिकरण के पास भेजने पर विचार करने को कहा।
मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली पीठ, जिसमें न्यायमूर्ति जॉयमाल्य बागची और न्यायमूर्ति विपुल एम. पंचोली शामिल थे, ने कहा,
“अपराध, अपराध होता है और उससे लोहे के हाथों निपटा जाना चाहिए।”
पीठ ने कहा कि नागरिकों की पहचान जाति, क्षेत्र, नस्ल या लिंग के आधार पर करना स्वतंत्रता के इतने वर्षों बाद एक प्रतिगामी कदम होगा। कोर्ट ने माना कि याचिका में उठाए गए मुद्दे पर सीधे न्यायिक हस्तक्षेप के बजाय इसे सक्षम प्राधिकरण के समक्ष रखा जाना अधिक उपयुक्त होगा।
आदेश में कहा गया कि याचिकाकर्ता याचिका की सॉफ्ट कॉपी तथा आदेश की प्रति अटॉर्नी जनरल के कार्यालय को सौंप सकते हैं, जो इस पर आवश्यक कदम उठाएंगे।
दिल्ली के अधिवक्ता अनूप प्रकाश अवस्थी ने यह जनहित याचिका 28 दिसंबर को दायर की थी। याचिका 24 वर्षीय अंजेल चकमा की हत्या की घटना की पृष्ठभूमि में दाखिल की गई, जो त्रिपुरा के निवासी थे और देहरादून के सेलाकुई क्षेत्र में कथित रूप से नस्लीय हमले में गंभीर रूप से घायल होने के बाद 26 दिसंबर 2025 को उनकी मृत्यु हो गई थी।
याचिका में कहा गया कि चकमा की उनके छोटे भाई की मौजूदगी में चाकू मारकर हत्या की गई और यह घटना पूर्वोत्तर के लोगों के खिलाफ जारी भेदभाव और हिंसा को दर्शाती है। याचिकाकर्ता ने इसे “संवैधानिक विफलता” बताते हुए न्यायिक हस्तक्षेप की मांग की थी।
याचिका में यह भी कहा गया कि इस मुद्दे को संसद में उठाया गया था, लेकिन ऐसे अपराधों से निपटने के लिए कोई विशेष एजेंसी नहीं बनाई गई। याचिका में केंद्र सरकार के साथ सभी राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों को पक्षकार बनाया गया था।
याचिका में पूर्वोत्तर और अन्य सीमावर्ती क्षेत्रों के नागरिकों के खिलाफ भेदभाव और हिंसा को रोकने के लिए संस्थागत तंत्र बनाने की मांग की गई थी। मृतक के परिजनों ने आरोपियों के लिए मृत्युदंड या कम से कम आजीवन कारावास की मांग की है।
सुप्रीम कोर्ट ने याचिका पर हस्तक्षेप करने से इंकार करते हुए इसे निस्तारित कर दिया और याचिकाकर्ता को अटॉर्नी जनरल के समक्ष अपनी याचिका प्रस्तुत करने की स्वतंत्रता दी।

