आंध्र प्रदेश हाईकोर्ट ने कहा है कि परित्यक्ता पत्नी को दिया जाने वाला भरण-पोषण दान या कृपा नहीं बल्कि एक विधिक अधिकार है, जिसका प्रवर्तन समानता, न्याय और सदाचार के सिद्धांतों को बनाए रखने के लिए आवश्यक है।
न्यायमूर्ति वाई. लक्ष्मण राव ने परिवार न्यायालय के उस आदेश को बरकरार रखा जिसमें पत्नी चिन्नम किरणमयी स्माइली को ₹7,500 प्रतिमाह तथा उनके नाबालिग पुत्र को ₹5,000 प्रतिमाह भरण-पोषण देने का निर्देश दिया गया था।
परिवार न्यायालय ने 3 मार्च 2018 को भरण-पोषण का आदेश पारित किया था। पति चिन्नन किशोर कुमार ने इस आदेश को आपराधिक पुनरीक्षण याचिका के माध्यम से हाईकोर्ट में चुनौती देते हुए कहा कि—
- आदेश मनमाना और अत्यधिक है
- पत्नी ने कई कार्यवाहियाँ शुरू की हैं
- प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों का उल्लंघन हुआ है
उन्होंने आदेश को अवैध बताते हुए निरस्त करने की मांग की।
हाईकोर्ट ने याचिका खारिज करते हुए कहा कि भारत में भरण-पोषण संबंधी न्यायशास्त्र इस बात का प्रमाण है कि न्यायपालिका यह सुनिश्चित करने के लिए प्रतिबद्ध है कि कोई भी पत्नी, बच्चा या आश्रित अभिभावक आर्थिक अभाव में न रहे।
न्यायालय ने कहा:
“भरण-पोषण दान नहीं बल्कि अधिकार है और इसका प्रवर्तन समानता, न्याय तथा सदाचार के सिद्धांतों को बनाए रखने के लिए आवश्यक है।”
न्यायमूर्ति राव ने भरण-पोषण को “संवैधानिक सहानुभूति का गतिशील साधन” बताते हुए कहा कि यह अनुच्छेद 15 और 39 के संरक्षण क्षेत्र में आता है और महिलाओं व बच्चों को आर्थिक वंचना से बचाने के लिए राज्य की प्रतिबद्धता का प्रतीक है।
न्यायालय ने स्पष्ट किया कि—
- भरण-पोषण का दायित्व निरंतर और प्रवर्तनीय होता है
- यह दायित्व वैवाहिक या पारिवारिक संबंध से उत्पन्न होता है, संपत्ति के स्वामित्व से नहीं
- भरण-पोषण एकमुश्त अनुग्रह नहीं बल्कि आवर्ती अधिकार है
- अन्य वैवाहिक मुकदमों की लंबितता से यह अधिकार प्रभावित नहीं होता
न्यायालय ने कहा कि परिवार न्यायालय द्वारा भरण-पोषण देना सामाजिक न्याय के सिद्धांतों पर आधारित एक विवेकपूर्ण निर्णय है।
हाईकोर्ट ने परिवार न्यायालय के आदेश में कोई त्रुटि या अवैधता नहीं पाई और पत्नी को ₹7,500 तथा नाबालिग पुत्र को ₹5,000 प्रतिमाह भरण-पोषण देने के आदेश को बरकरार रखा।

