इलाहाबाद हाईकोर्ट ने एक सरकारी अधिकारी के खिलाफ दर्ज रेप और ब्लैकमेलिंग के आपराधिक मामले को रद्द कर दिया है। कोर्ट ने महत्वपूर्ण टिप्पणी करते हुए कहा कि यह मानने योग्य नहीं है कि वायरल वीडियो की धमकी के तहत कोई पक्ष लंबे समय तक जबरन शारीरिक संबंध बनाए रख सकता है, खासकर जब सहमति स्वैच्छिक न हो।
न्यायमूर्ति अवनीश सक्सेना की पीठ ने भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS) की धारा 528 के तहत दायर आवेदन को स्वीकार करते हुए संज्ञान आदेश और आवेदकों के खिलाफ चल रही पूरी आपराधिक कार्यवाही को निरस्त कर दिया।
मामले की पृष्ठभूमि
यह मामला 1 दिसंबर, 2024 को दर्ज एक एफआईआर से संबंधित था, जिसे एक विवाहित महिला (विपक्षी संख्या 2) ने नीरज कुमार (आवेदक संख्या 1) और उनके चचेरे भाई (आवेदक संख्या 2) के खिलाफ दर्ज कराया था। शिकायतकर्ता, जिसके पति सेना में हैं, ने आरोप लगाया कि पीसीएस (PCS) परीक्षा की तैयारी के दौरान वह नीरज कुमार की बहन ममता के संपर्क में आई थी। ममता के माध्यम से उसकी मुलाकात नीरज से हुई, जिसने कथित तौर पर परीक्षा पास कर ली थी।
शिकायतकर्ता का आरोप था कि 7 अगस्त, 2022 को नीरज ने उसे अपना जन्मदिन मनाने के लिए बरेली के एक होटल में बुलाया, जहां उसने कथित तौर पर उसके साथ रेप किया और अश्लील वीडियो बनाए। उसने दावा किया कि इसके बाद नीरज ने वीडियो वायरल करने की धमकी देकर उसे ब्लैकमेल किया और अगस्त 2022 से नवंबर 2023 के बीच अलग-अलग होटलों में कई बार उसके साथ रेप किया। आरोप यह भी था कि नीरज ने ये वीडियो अपने चचेरे भाई को भेजे, जिसने भी उसे ब्लैकमेल करने की कोशिश की और अंततः वीडियो उसके परिवार वालों को भेज दिए।
एफआईआर के आधार पर, 12 फरवरी, 2025 को नीरज कुमार के खिलाफ भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा 376(2)(n), 323, 506 और सूचना प्रौद्योगिकी (संशोधन) अधिनियम की धारा 67 के तहत आरोप पत्र दाखिल किया गया था। उनके चचेरे भाई पर धारा 354(d), 506 आईपीसी और आईटी एक्ट की धारा 67 के तहत आरोप लगाए गए थे।
पक्षों की दलीलें
आवेदकों के वकील ने तर्क दिया कि एफआईआर अत्यधिक देरी से दर्ज की गई है और द्वेषपूर्ण है। यह भी कहा गया कि दोनों के बीच संबंध सहमति से थे जो बाद में खराब हो गए। बचाव पक्ष ने पीड़िता के बयानों में विरोधाभास को उजागर किया; जहां एफआईआर में जबरन रेप का आरोप लगाया गया था, वहीं बीएनएसएस की धारा 183 के तहत दिए गए बयान में उसने दावा किया कि होटल के कमरे में रखा पानी पीने के बाद उसे चक्कर आ गया था।
बचाव पक्ष ने यह भी तर्क दिया कि ब्लैकमेल का आधार यानी कथित वीडियो का कोई अस्तित्व ही नहीं है। पीड़िता ने स्वीकार किया कि उसने कभी वीडियो नहीं देखा। इसके अलावा, पीड़िता के पति ने कहा कि उन्होंने कथित तौर पर प्राप्त वीडियो को “डिलीट” कर दिया था, जबकि उसके पिता ने किसी भी वीडियो के मिलने से इनकार किया। वकील ने टोमासो ब्रूनो बनाम उत्तर प्रदेश राज्य और हसमुखलाल डी. वोरा बनाम तमिलनाडु राज्य सहित सुप्रीम कोर्ट के फैसलों का हवाला दिया।
वहीं, राज्य और शिकायतकर्ता के वकील ने आवेदन का विरोध करते हुए तर्क दिया कि देरी का कारण पीड़िता की जान और प्रतिष्ठा को खतरा था। उनका कहना था कि आवेदक, जो एक लोक सेवक है, ने मार्गदर्शन की आड़ में पीड़िता का शोषण किया और ब्लैकमेल के माध्यम से बार-बार रेप किया।
कोर्ट का विश्लेषण और टिप्पणियाँ
न्यायमूर्ति अवनीश सक्सेना ने घटनाओं की समयसीमा और आरोपों की प्रकृति की बारीकी से जांच की। कोर्ट ने नोट किया कि पीड़िता एक विवाहित महिला है और उसके 13 और 12 साल के बच्चे हैं।
ब्लैकमेल के आरोप के संबंध में, कोर्ट ने कहा:
“उसे (पीड़िता को) आरोपी आवेदक नंबर 1 द्वारा बनाया गया वीडियो नहीं दिखाया गया था। इससे पता चलता है कि पीड़िता को आरोपी द्वारा बनाए गए वीडियो के बारे में कोई विशिष्ट जानकारी नहीं थी, लेकिन वह वीडियो वायरल होने की आशंका में रही।”
कोर्ट के लिए यह स्वीकार करना कठिन था कि एक विवाहित महिला को उस वीडियो के डर से लगातार होटलों में शारीरिक संबंधों के लिए मजबूर किया जाएगा जिसे उसने कभी देखा ही नहीं था। कोर्ट ने कहा:
“यह विश्वास करना कठिन है कि एक विवाहित महिला लगातार इस डर के तहत होटल में यौन संबंधों के लिए तैयार होती रही कि आरोपी आवेदक नंबर 1, जो स्वयं एक लोक सेवक है, उसका वीडियो वायरल कर देगा।”
कोर्ट ने आवेदन के साथ संलग्न व्हाट्सएप चैट की भी जांच की और कहा:
“ये चैट देखने से ही पता चलता है कि ये केवल पढ़ाई के लिए मार्गदर्शन तक सीमित नहीं थे, बल्कि अंतरंग संचार को दर्शाते हैं।”
कोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के फैसले प्रशांत बनाम राज्य (एनसीटी दिल्ली) (2025) पर भरोसा जताया, जिसमें यह माना गया था कि स्वैच्छिक सहमति के अभाव में पार्टियों के लिए लंबे समय तक शारीरिक संबंध बनाए रखना “अकल्पनीय” (Inconceivable) है।
दूसरे आवेदक (चचेरे भाई) के खिलाफ आरोपों पर, कोर्ट को ऐसा कोई सबूत नहीं मिला जिससे यह साबित हो सके कि उसने कोई वीडियो ट्रांसफर किया या ब्लैकमेल के लिए इसका इस्तेमाल किया।
निर्णय
हाईकोर्ट ने निष्कर्ष निकाला कि पीड़िता सहमति देने वाली पक्षकार प्रतीत होती है और ट्रायल चलाना कानून की प्रक्रिया का दुरुपयोग होगा।
“रिकॉर्ड में ऐसा कुछ भी नहीं है जो यह दिखाए कि कोई अश्लील वीडियो या तस्वीरें पीड़िता के पति या परिवार के सदस्यों को भेजी गई थीं। होटल की कोई सीसीटीवी फुटेज नहीं है। ये सभी तथ्य बताते हैं कि पीड़िता एक सहमत पक्षकार है, जिसकी सहमति न तो उसके बच्चों की जान के डर से और न ही अश्लील वीडियो और तस्वीरों से ब्लैकमेल करके प्राप्त की गई थी।”
परिणामस्वरूप, कोर्ट ने आवेदन को अनुमति दी और चार्जशीट नंबर 70/2025, संज्ञान आदेश दिनांक 28.02.2025 और आपराधिक केस नंबर 1686/2025 की पूरी कार्यवाही को रद्द कर दिया।
मामले का विवरण:
- केस टाइटल: नीरज कुमार और अन्य बनाम उत्तर प्रदेश राज्य और अन्य
- केस नंबर: एप्लीकेशन यू/एस 528 बीएनएसएस नंबर 15439 ऑफ 2025
- कोरम: न्यायमूर्ति अवनीश सक्सेना

