सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार को डिजिटल पर्सनल डेटा प्रोटेक्शन (DPDP) अधिनियम, 2023 के कुछ प्रावधानों की संवैधानिक वैधता को चुनौती देने वाली याचिका पर केंद्र सरकार को नोटिस जारी किया। हालांकि, न्यायालय ने विवादित प्रावधानों पर अंतरिम रोक लगाने से इनकार कर दिया।
मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत, न्यायमूर्ति जॉयमाल्य बागची और न्यायमूर्ति विपुल एम. पंचोली की पीठ ने कहा कि वह अधिनियम से जुड़े कानूनी प्रश्नों की जांच करेगी, लेकिन इस चरण में स्थगन देने का कोई आधार नहीं बनता।
याचिका ‘द रिपोर्टर्स कलेक्टिव’ और वरिष्ठ पत्रकार नितिन सेठी की ओर से दाखिल की गई है। याचिकाकर्ताओं का कहना है कि नया डेटा संरक्षण कानून केंद्र सरकार को व्यक्तिगत डेटा पर “व्यापक अधिकार” देता है और सूचना का अधिकार (RTI) अधिनियम के तहत स्थापित पारदर्शिता ढांचे को कमजोर करता है।
याचिका में कहा गया है कि डीपीडीपी अधिनियम व्यक्तिगत जानकारी के प्रकटीकरण पर व्यापक प्रतिबंध लगाता है, जिससे आरटीआई के तहत विकसित पारदर्शिता और जवाबदेही का संतुलन प्रभावित होगा।
याचिकाकर्ताओं की ओर से अधिवक्ता वृंदा ग्रोवर ने दलील दी कि गोपनीयता की सुरक्षा के नाम पर कानून अत्यधिक व्यापक है और इसमें आवश्यक “सर्जिकल प्रिसिजन” का अभाव है।
उन्होंने कहा कि “विधायिका ने छेनी के बजाय हथौड़े का इस्तेमाल किया है,” जिससे आरटीआई व्यवस्था को गंभीर झटका लगा है।
याचिका में यह भी कहा गया है कि नया कानून सार्वजनिक हित परीक्षण को प्रभावी रूप से समाप्त कर देता है, जिसके माध्यम से पहले बड़े सार्वजनिक हित के मामलों में व्यक्तिगत जानकारी का प्रकटीकरण संभव था।
पीठ ने केंद्र सरकार से जवाब तलब करते हुए कहा कि मामले में उठाए गए संवैधानिक प्रश्नों पर बाद में विस्तृत सुनवाई की जाएगी। फिलहाल अधिनियम के विवादित प्रावधान लागू रहेंगे।

