सुप्रीम कोर्ट ने मुंबई स्थित ऐतिहासिक बाबुलनाथ मंदिर परिसर के एक हिस्से से 75 वर्षीय संन्यासी को बेदखल करने के बॉम्बे हाई कोर्ट के आदेश को बरकरार रखा है। हालांकि, साधु की उन्नत आयु और संन्यासी जीवन को ध्यान में रखते हुए उसे परिसर खाली करने के लिए चार वर्ष का समय दिया गया है।
न्यायमूर्ति संजय करोल और न्यायमूर्ति एन. कोटिश्वर सिंह की पीठ ने जगन्नाथ गिरि की अपील खारिज करते हुए कहा कि स्मॉल कॉजेज कोर्ट, उसकी अपीलीय पीठ और हाई कोर्ट के समवर्ती निष्कर्षों में हस्तक्षेप का कोई आधार नहीं बनता।
पीठ ने कहा कि ट्रायल कोर्ट ने 18 अक्टूबर 1996 को बेदखली का डिक्री पारित किया था, जिसे 22 जून 2001 को अपीलीय पीठ ने बरकरार रखा। इसके बाद बॉम्बे हाई कोर्ट ने 6 नवंबर 2025 को अनुच्छेद 227 के तहत हस्तक्षेप से इनकार कर दिया था।
हाई कोर्ट ने अपने आदेश में कहा था कि उसकी पर्यवेक्षी (supervisory) अधिकारिता सीमित है और वह साक्ष्यों का पुनर्मूल्यांकन नहीं कर सकता। सुप्रीम कोर्ट ने इस दृष्टिकोण से सहमति जताते हुए कहा कि अधीनस्थ अदालतों के “सुसंगत और सुविचारित” निष्कर्षों में हस्तक्षेप का कोई कारण नहीं है।
विवाद बाबुलनाथ मंदिर की मुख्य सीढ़ियों के लैंडिंग पर स्थित एक छोटे से हिस्से को लेकर है। यह परिसर वर्ष 1927 में बाबा रामगिरि महाराज को दिया गया था। उनके निधन के बाद उनके शिष्य बाबा ब्रह्मानंदजी महाराज ने किरायेदार के रूप में कब्जा जारी रखा।
हाई कोर्ट में लंबित कार्यवाही के दौरान बाबा ब्रह्मानंदजी महाराज का निधन हो गया, जिसके बाद उनके विधिक प्रतिनिधि के रूप में जगन्नाथ गिरि को पक्षकार बनाया गया और वही परिसर में रह रहे थे।
मंदिर ट्रस्ट ने स्मॉल कॉजेज कोर्ट में बेदखली का वाद दायर किया था, जिसमें उसके पक्ष में डिक्री पारित हुई थी।
अपीलकर्ता ने वर्ष 1968 से निरंतर कब्जे और किराया भुगतान का हवाला दिया, लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि समवर्ती निष्कर्षों के बाद केवल दीर्घकालीन कब्जा हस्तक्षेप का आधार नहीं बन सकता।
मामले के गुण-दोष पर राहत से इनकार करते हुए पीठ ने साधु की आयु और संन्यासी जीवन को देखते हुए परिसर खाली करने के लिए चार वर्ष का समय दिया ताकि वह वैकल्पिक आवास की व्यवस्था कर सके।
कोर्ट ने निर्देश दिया कि इस अवधि के दौरान:
- साधु शांतिपूर्वक परिसर में रहेगा,
- मंदिर परिसर के विकास में कोई बाधा नहीं डालेगा,
- मंदिर प्राधिकरण उस हिस्से में किसी तीसरे पक्ष को प्रवेश नहीं देगा और साधु को कोई परेशान नहीं करेगा।
अपील इसी के साथ खारिज कर दी गई।

