मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत ने शनिवार को कहा कि न्याय तक पहुँच केवल कानूनी रूप से सशक्त लोगों तक सीमित एक अमूर्त आदर्श नहीं रह सकती, बल्कि इसका वास्तविक लाभ समाज के हाशिये पर खड़े नागरिकों तक पहुँचना चाहिए। उन्होंने कहा कि न्याय प्रणाली की विश्वसनीयता उसकी पहुँच, संवेदनशीलता और मानवीय दृष्टिकोण पर निर्भर करती है।
कॉमनवेल्थ ज्यूडिशियल एजुकेटर्स (CJE) की 11वीं द्विवार्षिक बैठक में मुख्य वक्तव्य देते हुए मुख्य न्यायाधीश ने कहा कि न्यायिक नेतृत्व को केवल प्रशासनिक अधिकार या संस्थागत पदानुक्रम तक सीमित नहीं किया जा सकता, बल्कि यह बौद्धिक और नैतिक दृष्टिकोण पर आधारित होना चाहिए।
उन्होंने कहा,
“न्याय तक पहुँच केवल कानूनी रूप से सशक्त लोगों के लिए सुरक्षित एक अमूर्त आदर्श नहीं रह सकती। यह उस अंतिम व्यक्ति तक वास्तविक परिणामों के रूप में पहुँचना चाहिए जो कतार में खड़ा है और जिसका न्याय प्रणाली पर विश्वास उसकी पहुँच, संवेदनशीलता और मानवीयता पर आधारित है।”
मुख्य न्यायाधीश ने कहा कि न्यायिक नेतृत्व के लिए प्रशासनिक दूरदर्शिता के साथ गहरी संवेदनशीलता भी आवश्यक है। उन्होंने चेतावनी दी कि प्रक्रिया की जटिलता जरूरतमंद लोगों के लिए बाधा नहीं बननी चाहिए और न्यायालयों को इस बात के प्रति सतर्क रहना होगा।
उन्होंने कहा कि न्यायपालिका को अपने तर्क की स्पष्टता, पारदर्शिता और निर्णयों की निरंतरता के माध्यम से जनता का विश्वास निरंतर अर्जित करना होगा।
न्याय प्रणाली में प्रौद्योगिकी के उपयोग पर जोर देते हुए मुख्य न्यायाधीश ने कहा कि कृत्रिम बुद्धिमत्ता न्यायिक निर्णय-प्रक्रिया में सहायक की भूमिका निभाए, उसका स्थानापन्न नहीं बने। उन्होंने कहा कि तकनीक से दक्षता और पहुँच में सुधार होगा, लेकिन न्याय का मानवीय तत्व सुरक्षित रहना चाहिए।
उन्होंने कहा कि मध्यस्थता, सुलह और विशेष न्यायालयों का बढ़ता उपयोग न्याय प्रणाली में व्यापक परिवर्तन को दर्शाता है, जहाँ लक्ष्य केवल मुकदमों का निपटारा नहीं बल्कि समयबद्ध, प्रभावी और उत्तरदायी न्याय उपलब्ध कराना है।
उन्होंने कहा,
“यह परिवर्तन इस बात को स्वीकार करता है कि न्याय केवल सिद्धांत में नहीं बल्कि व्यवहार में भी सुलभ होना चाहिए — समयबद्ध, प्रभावी और वादकारियों की आवश्यकताओं के प्रति उत्तरदायी।”
मुख्य न्यायाधीश ने कहा कि न्यायाधीशों को संवैधानिक विधि के सिद्धांतों के साथ-साथ उसके दार्शनिक आधारों को भी समझना चाहिए, जिसके लिए तुलनात्मक संवैधानिक संवाद, ऐतिहासिक अध्ययन और नैतिक चिंतन आवश्यक है।
उन्होंने कहा कि न्यायालयों को बदलती परिस्थितियों के अनुरूप स्वयं को ढालते हुए संविधान की पहचान के संरक्षक के रूप में कार्य करना चाहिए। साथ ही उन्होंने कॉमनवेल्थ के न्यायिक मंचों से भारत और एशिया क्षेत्र की न्यायिक प्रवृत्तियों को अधिक मान्यता देने का आह्वान किया, ताकि साझा शिक्षण को सुदृढ़ किया जा सके और लोगों-केन्द्रित न्याय की अवधारणा को आगे बढ़ाया जा सके।

