सुप्रीम कोर्ट ने आयकर विभाग के कैजुअल वर्कर्स को दी बड़ी राहत: नियमितीकरण का आदेश जारी, हाईकोर्ट और ट्रिब्यूनल के फैसले को पलटा

सुप्रीम कोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसले में मध्य प्रदेश हाईकोर्ट के आदेश को रद्द करते हुए ग्वालियर आयकर विभाग (Income Tax Department) में कार्यरत दैनिक वेतन भोगी कर्मचारियों (Casual Workers) को नियमित करने का निर्देश दिया है। न्यायमूर्ति जे.के. माहेश्वरी और न्यायमूर्ति अतुल एस. चंदुरकर की पीठ ने स्पष्ट किया कि जब समान स्थिति वाले अन्य कर्मचारियों को सुप्रीम कोर्ट के पूर्व आदेशों के तहत राहत मिल चुकी है, तो विभाग इन अपीलकर्ताओं के साथ भेदभाव नहीं कर सकता।

क्या था पूरा मामला?

यह मामला ग्वालियर के आयकर आयुक्त कार्यालय में 1993 से 1998 के बीच नियुक्त किए गए कैजुअल वर्कर्स (सफाई कर्मचारी, रसोइया, वॉटरमैन आदि) से जुड़ा है। इन कर्मचारियों का नाम रोजगार कार्यालय (Employment Exchange) द्वारा प्रायोजित किया गया था और इंटरव्यू के बाद उन्हें काम पर रखा गया था।

दशकों तक सेवा देने के बाद, इन कर्मचारियों ने नियमितीकरण (Regularization) की मांग की, लेकिन विभाग ने उनकी मांग स्वीकार नहीं की। इसके बाद उन्होंने केंद्रीय प्रशासनिक न्यायाधिकरण (CAT), जबलपुर का दरवाजा खटखटाया।

वर्ष 2015 में ट्रिब्यूनल ने उनकी याचिका यह कहते हुए खारिज कर दी कि वे सचिव, कर्नाटक राज्य बनाम उमादेवी (3) (2006) के मामले में संविधान पीठ द्वारा निर्धारित मानदंडों को पूरा नहीं करते हैं। ट्रिब्यूनल का कहना था कि 10 अप्रैल 2006 तक उनकी 10 साल की नियमित सेवा पूरी नहीं हुई थी। इसके बाद मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने भी 2019 में ट्रिब्यूनल के फैसले को सही ठहराया, जिसके खिलाफ कर्मचारी सुप्रीम कोर्ट पहुंचे।

सुप्रीम कोर्ट में क्या दलीलें दी गईं?

अपीलकर्ताओं ने कोर्ट को बताया कि 2011 और 2012 के सर्कुलर के जरिए विभाग उनके काम को आउटसोर्स करने की कोशिश कर रहा था, जिससे यह साबित होता है कि काम की प्रकृति स्थायी (perennial) थी।

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उनकी सबसे मजबूत दलील ‘समानता’ (Parity) को लेकर थी। उन्होंने रवि वर्मा और अन्य बनाम भारत संघ (2018) के मामले का हवाला दिया। उनका कहना था कि रवि वर्मा केस में जिन कर्मचारियों को सुप्रीम कोर्ट ने नियमित करने का आदेश दिया था, वे भी उसी विभाग में और उसी ‘डेली वेज लिस्ट’ में शामिल थे जिसमें मौजूदा अपीलकर्ताओं के नाम हैं।

दूसरी ओर, केंद्र सरकार (भारत संघ) ने दलील दी कि ग्वालियर में कोई स्वीकृत पद (sanctioned post) खाली नहीं था और अपीलकर्ता उमादेवी जजमेंट की शर्तों को पूरा नहीं करते।

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सुप्रीम कोर्ट का विश्लेषण और फैसला

सुप्रीम कोर्ट ने मामले की गहराई से जांच की और 31 अक्टूबर 2005 की ‘डेली वेज वर्कर्स’ की सूची का अवलोकन किया। कोर्ट ने पाया कि इस सूची में रवि वर्मा केस के लाभार्थियों के साथ-साथ मौजूदा अपीलकर्ताओं के नाम भी शामिल थे।

पीठ ने कहा कि जब रवि वर्मा और रमन कुमार के मामलों में समान स्थिति वाले कर्मचारियों को नियमित किया जा चुका है, तो आयकर विभाग इन कर्मचारियों के साथ भेदभाव नहीं कर सकता।

कोर्ट ने जग्गो बनाम भारत संघ (2024) के हालिया फैसले का भी उल्लेख किया, जिसमें कहा गया था कि उमादेवी के फैसले का गलत अर्थ निकालकर लंबे समय से सेवा दे रहे कर्मचारियों के वैध दावों को खारिज नहीं किया जाना चाहिए। कोर्ट ने दोहराया कि नियुक्तियां ‘अनियमित’ (irregular) हो सकती हैं लेकिन ‘अवैध’ (illegal) नहीं, और प्रक्रियात्मक कमियों के आधार पर दशकों की सेवा को नजरअंदाज करना अनुचित है।

निर्णय

सुप्रीम कोर्ट ने मध्य प्रदेश हाईकोर्ट के 26 अगस्त 2019 के फैसले को रद्द कर दिया। कोर्ट ने आदेश दिया:

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“अपीलकर्ताओं की सेवाओं को 01.07.2006 से उसी तर्ज पर नियमित किया जाए जैसा कि रवि वर्मा और रमन कुमार के मामलों में किया गया था। अपीलकर्ताओं को तीन महीने के भीतर सभी लाभ प्रदान किए जाएं।”

कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि इस मामले में जो अन्य आवेदक प्रतिवादी के रूप में शामिल हुए थे, वे भी इसी राहत के हकदार होंगे।

केस का विवरण:

मामले का नाम: पवन कुमार और अन्य बनाम भारत संघ और अन्य

सिविल अपील संख्या: एसएलपी (सी) संख्या 29214/2019 से उत्पन्न (2026 INSC 156)

पीठ: न्यायमूर्ति जे.के. माहेश्वरी और न्यायमूर्ति अतुल एस. चंदुरकर

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