तय तारीख पर मूल दस्तावेज न देने पर उम्मीदवारी रद्द करना सही: आंध्र प्रदेश हाईकोर्ट

आंध्र प्रदेश हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसले में स्पष्ट किया है कि दस्तावेजों के सत्यापन (Verification) के लिए तय की गई तारीख पर मूल प्रमाण पत्र (Original Certificates) प्रस्तुत करना एक अनिवार्य शर्त है। कोर्ट ने कहा कि यदि कोई उम्मीदवार ऐसा करने में विफल रहता है, तो उसकी उम्मीदवारी रद्द करना पूरी तरह से उचित है।

जस्टिस रवि नाथ तिलहरी और जस्टिस महेश्वर राव कुंचेम की खंडपीठ ने ‘ऑफिस सबऑर्डिनेट’ पद के लिए एक उम्मीदवार की चयन प्रक्रिया को चुनौती देने वाली याचिका को खारिज करते हुए यह निर्णय सुनाया। कोर्ट ने माना कि भर्ती अधिसूचना में दी गई शर्तें बाध्यकारी थीं और इनका पालन न करने पर उम्मीदवारी खारिज की जा सकती है।

मामले की पृष्ठभूमि

याचिकाकर्ता, सालिकमेनी पेद्दा मधु यादव ने कुरनूल जिले की जिला न्यायपालिका में ‘ऑफिस सबऑर्डिनेट’ के पद के लिए आवेदन किया था। यह भर्ती अधिसूचना संख्या 10/2022-RC, दिनांक 21 अक्टूबर 2022 के तहत निकाली गई थी। याचिकाकर्ता को इस पद के लिए अनंतिम रूप से (Provisionally) चुना गया था।

भर्ती प्रक्रिया के तहत, उम्मीदवारों को 6 सितंबर 2023 को प्रमाण पत्रों के सत्यापन के लिए बुलाया गया था। इस तारीख को याचिकाकर्ता अपना मूल ‘ट्रांसफर स्टडी सर्टिफिकेट’ प्रस्तुत करने में विफल रहा, हालांकि उसने दावा किया कि उसने स्व-सत्यापित (Self-attested) प्रति जमा की थी। याचिकाकर्ता का आरोप था कि उसने दो दिन बाद, 8 सितंबर 2023 को मूल दस्तावेज जमा करने का प्रयास किया, लेकिन अधिकारियों ने इसे स्वीकार करने से इनकार कर दिया। इसके बाद उसकी उम्मीदवारी रद्द कर दी गई।

इस अस्वीकृति को चुनौती देते हुए, याचिकाकर्ता ने 2025 में रिट याचिका दायर की और मांग की कि उसे बीसी ‘डी’ श्रेणी में अन्य चयनित उम्मीदवारों के बराबर माना जाए।

पक्षों की दलीलें

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याचिकाकर्ता का तर्क: याचिकाकर्ता के वकील श्री पी. रविकांत (श्री के. वीरमणी का प्रतिनिधित्व करते हुए) ने स्वीकार किया कि 6 सितंबर 2023 को मूल दस्तावेज जमा नहीं किया गया था। हालांकि, उन्होंने तर्क दिया कि याचिकाकर्ता ने सत्यापित प्रति दी थी और बाद में मूल प्रति जमा करने की कोशिश की थी।

सुप्रीम कोर्ट के स्वीटी कुमारी बनाम बिहार राज्य और अन्य (2023 SCC OnLine 1212) के फैसले का हवाला देते हुए, वकील ने तर्क दिया कि अधिसूचना की शर्त अनिवार्य नहीं थी। उन्होंने कहा कि जब मूल प्रमाण पत्र प्रस्तुत करना अनिवार्य नहीं होता, तो साक्षात्कार के समय इसकी अनुपस्थिति के आधार पर किसी मेरिट वाले उम्मीदवार को खारिज नहीं किया जा सकता।

प्रतिवादियों का तर्क: हाईकोर्ट और प्रधान जिला न्यायाधीश, कुरनूल की ओर से पेश वकील श्री एल. साई मनोज रेड्डी ने याचिका का विरोध किया। उन्होंने तर्क दिया कि अधिसूचना के पैरा नंबर 10 में शर्त संख्या (V) स्पष्ट रूप से कहती है कि आवेदकों को हाईकोर्ट द्वारा बताई गई तारीख पर ही मूल प्रमाण पत्र प्रस्तुत करने होंगे। इसमें साफ चेतावनी दी गई थी कि ऐसा न करने पर उम्मीदवारी खारिज कर दी जाएगी।

प्रतिवादियों ने याचिकाकर्ता के इस दावे का भी खंडन किया कि उसने 8 सितंबर 2023 को दस्तावेज जमा करने की कोशिश की थी। इसके अलावा, वकील ने देरी (Laches) का मुद्दा उठाया और कहा कि चयन प्रक्रिया 2023 में पूरी हो चुकी थी और चयनित उम्मीदवार पदभार ग्रहण कर चुके थे, इसलिए 2025 में दायर यह याचिका स्वीकार्य नहीं है।

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कोर्ट का विश्लेषण

शर्त की अनिवार्य प्रकृति खंडपीठ ने भर्ती अधिसूचना के पैरा नंबर 10 की शर्त संख्या (V) की बारीकी से जांच की, जिसमें लिखा था:

“आवेदक को सत्यापन के लिए हाईकोर्ट द्वारा बताई गई तारीख पर मूल प्रमाण पत्र प्रस्तुत करने होंगे। यदि आवेदक किसी भी आवश्यक प्रमाण पत्र को प्रस्तुत करने में विफल रहता है, तो उसकी उम्मीदवारी खारिज कर दी जाएगी।”

इस प्रावधान की व्याख्या करते हुए, कोर्ट ने कहा:

“उक्त शर्त हमें अनिवार्य (Mandatory) प्रतीत होती है। इसने स्पष्ट शब्दों में सत्यापन के लिए मूल दस्तावेज प्रस्तुत करने की तारीख तय की थी। यह आगे सत्यापन की तय तारीख पर मूल दस्तावेज प्रस्तुत न करने का परिणाम भी बताती है। परिणाम यह दिया गया है कि उम्मीदवारी खारिज कर दी जाएगी। उम्मीदवारी खारिज होने का यह परिणाम इस विचार का समर्थन करता है कि यह प्रावधान अनिवार्य है।”

कोर्ट ने याचिकाकर्ता के इस तर्क को खारिज कर दिया कि यह शर्त केवल निर्देशिका (Directory) थी।

नजीरों में अंतर कोर्ट ने स्वीटी कुमारी और आरव जैन बनाम बिहार लोक सेवा आयोग (2022 (14) SCC 35) के मामलों में याचिकाकर्ता द्वारा दिए गए हवाले को भी स्पष्ट किया। बेंच ने कहा कि उन मामलों में सुप्रीम कोर्ट ने अस्वीकृति को केवल तब अनुचित माना था जब “मूल प्रमाण पत्र प्रस्तुत करने की ऐसी शर्त अनिवार्य नहीं थी।”

हाईकोर्ट ने वर्तमान मामले को अलग बताते हुए कहा:

“उक्त मामले में प्रतिपादित कानून के प्रस्ताव पर कोई विवाद नहीं है… लेकिन, उक्त सिद्धांत वर्तमान मामले में लागू नहीं होगा क्योंकि यहां पैरा नंबर 10 में शर्त संख्या (V) अनिवार्य है, निर्देशिका नहीं।”

देरी और विलंब (Laches) बेंच ने रिट याचिका दायर करने में हुई देरी को भी गंभीरता से लिया। कोर्ट ने कहा कि याचिकाकर्ता 2023 में उत्पन्न हुए विवाद के लिए 2025 में कोर्ट आने का कोई ठोस कारण नहीं बता सका।

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कोर्ट ने कहा:

“एक बार जब याचिकाकर्ता का मामला यह है कि 08.09.2023 को वह मूल दस्तावेज के साथ पहुंचा और उसे स्वीकार नहीं किया गया, तो उसे अपनी शिकायतों के निवारण के लिए तुरंत कोर्ट का दरवाजा खटखटाना चाहिए था। चयन पूरा होने और 2023 में ही चयनित उम्मीदवारों के शामिल होने के बाद, 2025 में बिना किसी पर्याप्त स्पष्टीकरण के देरी से दायर रिट याचिका को बनाए नहीं रखा जा सकता।”

निर्णय

आंध्र प्रदेश हाईकोर्ट ने निष्कर्ष निकाला कि अनिवार्य शर्त का पालन न करने के कारण याचिकाकर्ता की उम्मीदवारी रद्द करने में कोई अवैधता नहीं थी। कोर्ट ने रिट याचिका को योग्यता के अभाव में खारिज कर दिया।

केस डीटेल्स:

  • केस टाइटल: सालिकमेनी पेद्दा मधु यादव बनाम आंध्र प्रदेश हाईकोर्ट
  • केस नंबर: रिट याचिका संख्या 3349 वर्ष 2025
  • कोरम: जस्टिस रवि नाथ तिलहरी और जस्टिस महेश्वर राव कुंचेम
  • याचिकाकर्ता के वकील: श्री पी. रविकांत (श्री के. वीरमणी के लिए)
  • प्रतिवादियों के वकील: श्री एल. साई मनोज रेड्डी (श्री एन.वी. सुमंत के लिए)

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