देरी की माफी कोई अधिकार नहीं; ओडिशा सरकार की दलील ‘लंगड़ा बहाना’: सुप्रीम कोर्ट ने समय-बाधित याचिका खारिज की

सुप्रीम कोर्ट ने ओडिशा सरकार द्वारा दायर एक विशेष अनुमति याचिका (SLP) को खारिज करते हुए कानूनी उपचार प्राप्त करने में सरकार के रवैये को “बेहद सुस्त, धीमा और आलसी” (utterly lethargic, tardy and indolent) करार दिया है। जस्टिस दीपांकर दत्ता और जस्टिस सतीश चंद्र शर्मा की पीठ ने याचिका दायर करने में हुई देरी को माफ करने से इनकार कर दिया और टिप्पणी की कि राज्य सरकार द्वारा दिया गया स्पष्टीकरण कोई वैध कानूनी कारण नहीं, बल्कि महज एक “लंगड़ा बहाना” (lame excuse) है।

शीर्ष अदालत के समक्ष मुख्य मुद्दा यह था कि क्या ओडिशा सरकार द्वारा विशेष अनुमति याचिका दायर करने में हुई 123 दिनों की देरी (और दोबारा फाइल करने में 96 दिनों की और देरी) को माफ किया जाना चाहिए या नहीं। यह याचिका उड़ीसा हाईकोर्ट के उस आदेश के खिलाफ थी, जिसमें हाईकोर्ट ने स्वयं राज्य की अपील में हुई भारी देरी को माफ करने से इनकार कर दिया था।

सुप्रीम कोर्ट ने याचिका को समय-बाधित (Time-Barred) मानते हुए खारिज कर दिया और स्पष्ट किया कि “पर्याप्त कारण” के अभाव में विवेक का प्रयोग नहीं किया जा सकता और देरी की माफी का दावा अधिकार के रूप में नहीं किया जा सकता।

मामले की पृष्ठभूमि

कानूनी कार्यवाही की शुरुआत स्टेट एजुकेशन ट्रिब्यूनल, भुवनेश्वर के 30 दिसंबर, 2013 के आदेश से हुई थी। नमतरा गर्ल्स हाई स्कूल की प्रबंध समिति द्वारा ओडिशा एजुकेशन एक्ट, 1969 की धारा 24बी के तहत दायर एक आवेदन पर ट्रिब्यूनल ने ओडिशा राज्य और माध्यमिक शिक्षा निदेशक को स्कूल के शिक्षण और गैर-शिक्षण कर्मचारियों को सहायता अनुदान (grant-in-aid) जारी करने का निर्देश दिया था।

राज्य ने इस आदेश को 16 अक्टूबर, 2015 को उड़ीसा हाईकोर्ट में चुनौती दी। यह अपील न केवल निर्धारित समय सीमा समाप्त होने के बाद दायर की गई थी, बल्कि यह दोषपूर्ण भी थी क्योंकि इसके साथ ट्रिब्यूनल के आदेश की प्रमाणित प्रति (certified copy) संलग्न नहीं थी।

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आठ वर्षों तक राज्य इस दोष को दूर करने में विफल रहा। परिणामस्वरूप, 26 अप्रैल, 2023 को हाईकोर्ट ने ट्रिब्यूनल के आदेश की प्रमाणित प्रति दाखिल न करने के कारण अपील खारिज कर दी।

इस बर्खास्तगी के बाद, राज्य ने 13 फरवरी, 2024 को प्रमाणित प्रति प्राप्त की और 26 अप्रैल, 2023 के आदेश को वापस लेने (recall) की मांग करते हुए 291 दिनों की देरी की माफी के लिए आवेदन दायर किया। 21 फरवरी, 2025 को हाईकोर्ट ने देरी की माफी के आवेदन को खारिज कर दिया। हाईकोर्ट ने पाया कि 2015 में दायर अपील स्वाभाविक रूप से दोषपूर्ण थी और अपील प्रस्तुत करने में कुल देरी वास्तव में 11 वर्ष से अधिक थी।

सुप्रीम कोर्ट के समक्ष तर्क

हाईकोर्ट के 21 फरवरी, 2025 के आदेश से असंतुष्ट होकर ओडिशा राज्य ने सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया। यहाँ भी विशेष अनुमति याचिका 123 दिनों की देरी से दायर की गई थी, और दोषों को दूर करने के बाद दोबारा फाइल करने में 96 दिनों की अतिरिक्त देरी हुई थी।

देरी की माफी के लिए अपने आवेदन में राज्य ने दलील दी:

“अपील दायर करने में देरी उच्च अधिकारियों से अनुमोदन प्राप्त करने में प्रक्रियात्मक देरी के कारण हुई। यह देरी जानबूझकर और इरादतन नहीं है।”

ओडिशा राज्य की ओर से पेश विद्वान वकील सुश्री संजना सड्डी ने तर्क दिया कि देरी जानबूझकर नहीं की गई थी। उन्होंने सुप्रीम कोर्ट के उन पुराने फैसलों का हवाला दिया जो यह सुझाव देते हैं कि जब संविधान के अनुच्छेद 12 के तहत कोई प्राधिकरण वादी हो, तो देरी की माफी के लिए उदार दृष्टिकोण अपनाया जाना चाहिए। उन्होंने कोर्ट से आग्रह किया कि देरी को माफ कर हाईकोर्ट को ट्रिब्यूनल के आदेश की गुण-दोष (merits) के आधार पर जांच करने का निर्देश दिया जाए।

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कोर्ट का विश्लेषण और टिप्पणियाँ

सुप्रीम कोर्ट ने राज्य की दलीलों को खारिज कर दिया और सरकारी देरी के प्रति न्यायिक दृष्टिकोण का विस्तृत विश्लेषण किया।

‘पर्याप्त कारण’ और सरकार के प्रति नरमी पर: कोर्ट ने कलेक्टर, लैंड एक्विजिशन, अनंतनाग बनाम मैसर्स काटिजी (1987) और जी. रामगौड़ा बनाम लैंड एक्विजिशन ऑफिसर (1988) जैसे पूर्व निर्णयों को स्वीकार किया, जिनमें कहा गया था कि जब राज्य देरी की माफी मांगता है तो “न्याय-उन्मुख दृष्टिकोण” (justice oriented approach) अपनाया जाना चाहिए क्योंकि व्यक्तिगत चूक से जनहित प्रभावित होता है।

हालांकि, पीठ ने नोट किया कि यह उदार दृष्टिकोण इस उम्मीद पर आधारित था कि स्थितियों में सुधार होगा। कोर्ट ने कमिश्नर ऑफ वेल्थ टैक्स, बॉम्बे बनाम एमेच्योर राइडर्स क्लब, बॉम्बे (1994) के बाद के फैसले का हवाला दिया, जहाँ कोर्ट ने “नौकरशाही की उदासीनता” (bureaucratic indifference) पर हताशा व्यक्त की थी।

एमेच्योर राइडर्स क्लब मामले को उद्धृत करते हुए, पीठ ने दोहराया:

“एक ऐसा बिंदु है जिसके आगे अदालतें भी वादी की मदद नहीं कर सकतीं, भले ही वह वादी सरकार ही क्यों न हो, जो स्वयं नौकरशाही की उदासीनता की बेड़ियों में जकड़ी हुई है।”

राज्य के आचरण पर: फैसला लिखते हुए जस्टिस दीपांकर दत्ता ने कहा कि ओडिशा राज्य न केवल हाईकोर्ट के समक्ष बल्कि सुप्रीम कोर्ट के समक्ष भी “बेहद सुस्त, धीमा और आलसी” रहा है।

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कोर्ट ने कहा:

“इस तथ्य के बावजूद कि हाईकोर्ट द्वारा इसकी अपील को समय-बाधित (time-barred) मानकर खारिज कर दिया गया था, ओडिशा राज्य ने समय सीमा समाप्त होने के चार महीने बाद इस न्यायालय का दरवाजा खटखटाया है।”

स्पष्टीकरण की अस्वीकृति: प्रक्रियात्मक देरी और उदार दृष्टिकोण की याचिका पर राज्य की निर्भरता को संबोधित करते हुए, कोर्ट ने कहा:

“देरी की माफी का दावा अधिकार के रूप में नहीं किया जा सकता। देरी को माफ करना या न करना पूरी तरह से न्यायालय का विवेक है। एक ‘राज्य’ के प्रति दिखाई जाने वाली तमाम नरमी के बावजूद, हमारी स्पष्ट राय है कि यहाँ ओडिशा राज्य द्वारा दिखाया गया कारण कोई स्पष्टीकरण नहीं बल्कि एक लंगड़ा बहाना (lame excuse) है। विवेक के प्रयोग के लिए कोई मामला नहीं बनता है।”

निर्णय

सुप्रीम कोर्ट ने याचिका दायर करने और दोबारा फाइल करने में हुई देरी की माफी के आवेदनों को खारिज कर दिया। नतीजतन, विशेष अनुमति याचिका को समय-बाधित होने के कारण खारिज कर दिया गया।

केस विवरण

  • केस टाइटल: स्टेट ऑफ ओडिशा व अन्य बनाम मैनेजिंग कमिटी ऑफ नमतरा गर्ल्स हाई स्कूल
  • केस नंबर: स्पेशल लीव पिटीशन (सी) डायरी नंबर 54941/2025
  • कोरम: जस्टिस दीपांकर दत्ता और जस्टिस सतीश चंद्र शर्मा

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