सुप्रीम कोर्ट ने दहेज हत्या के एक मामले में आरोपी पति को जमानत देने के इलाहाबाद हाईकोर्ट के आदेश को पलट दिया है। शीर्ष अदालत ने हाईकोर्ट के दृष्टिकोण की कड़ी आलोचना करते हुए आरोपी को तुरंत आत्मसमर्पण करने का निर्देश दिया। कोर्ट ने इस बात पर जोर दिया कि निचली अदालत ने अपराध की गंभीरता और नए आपराधिक कानूनों के तहत वैधानिक अनुमानों (statutory presumptions) पर विचार नहीं किया।
मामले की पृष्ठभूमि
1 मार्च 2025 को मृतका सुषमा की शादी आरोपी देवराज उर्फ गोलू के साथ हुई थी। शादी के मात्र तीन महीने के भीतर, 25 अप्रैल 2025 को उसकी संदिग्ध परिस्थितियों में ससुराल में मौत हो गई। घटना की सूचना मिलने के बाद, मृतका के पिता चेतराम वर्मा ने उत्तर प्रदेश के श्रावस्ती जिले के कोतवाली भिनगा पुलिस स्टेशन में एफआईआर (FIR संख्या 188/2025) दर्ज कराई।
शिकायतकर्ता का आरोप था कि शादी के समय अपनी हैसियत के अनुसार 3,50,000 रुपये नकद दहेज देने के बावजूद, आरोपी और उसका परिवार संतुष्ट नहीं था। वे अतिरिक्त दहेज के रूप में चार पहिया वाहन की मांग कर रहे थे और इसके लिए उनकी बेटी को शारीरिक व मानसिक रूप से प्रताड़ित कर रहे थे। पोस्टमार्टम रिपोर्ट में मौत का कारण “गला घोंटने के कारण दम घुटना” (asphyxia due to strangulation) सामने आया। जांच पूरी होने के बाद चार्जशीट दायर की गई और भारतीय न्याय संहिता, 2023 (BNS) की धारा 85 और 80(2) तथा दहेज निषेध अधिनियम, 1961 की धारा 3 और 4 के तहत आरोप तय किए गए। यह मुकदमा वर्तमान में श्रावस्ती के सत्र न्यायालय (सत्र प्रकरण संख्या 280/2025) में लंबित है।
पक्षों की दलीलें
हाईकोर्ट के समक्ष सुनवाई के दौरान, आरोपी पति के वकील ने दलील दी कि सह-आरोपी रामबचन को पहले ही जमानत मिल चुकी है। बचाव पक्ष ने यह भी दावा किया कि पोस्टमार्टम रिपोर्ट में हाइपोइड बोन (hyoid bone) सुरक्षित पाई गई थी, इसलिए मेडिकल ज्यूरिस्प्रूडेंस के अनुसार मौत का कारण मृत्यु-पूर्व गला घोंटना (ante-mortem strangulation) नहीं हो सकता। वहीं, राज्य सरकार ने जमानत याचिका का कड़ा विरोध किया। हाईकोर्ट द्वारा बिना उचित कारणों के जमानत दिए जाने से असंतुष्ट होकर मृतका के पिता ने सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया।
सुप्रीम कोर्ट का विश्लेषण
न्यायमूर्ति जे.बी. पारदीवाला और न्यायमूर्ति के.वी. विश्वनाथन की पीठ ने आरोपी को जमानत देने के इलाहाबाद हाईकोर्ट के आदेश की सख्त आलोचना की। पीठ ने पाया कि हाईकोर्ट ने केवल बचाव पक्ष की दलीलें दर्ज कीं और आरोपी को सिर्फ इसलिए जमानत दे दी क्योंकि वह 27 अप्रैल 2025 से जेल में था और उसका कोई आपराधिक इतिहास नहीं था।
सुप्रीम कोर्ट ने अपनी गहरी निराशा व्यक्त करते हुए टिप्पणी की:
“आलोच्य आदेश उन सबसे चौंकाने वाले और निराशाजनक आदेशों में से एक है जो हमने पिछले कुछ समय में देखे हैं।”
पीठ ने आगे कहा:
“आलोच्य आदेश के कारण न्याय का मखौल (travesty of justice) उड़ा है।”
अदालत ने स्पष्ट किया कि हाईकोर्ट दहेज हत्या जैसे गंभीर अपराध में जमानत याचिका पर विचार करते समय आवश्यक महत्वपूर्ण कारकों को ध्यान में रखने में पूरी तरह विफल रहा। अदालत के अनुसार, हाईकोर्ट ने अपराध की प्रकृति, BNS 2023 के तहत इसके लिए कड़े दंड, पति-पत्नी के रिश्ते, घटना स्थल और गला घोंटने की ओर इशारा करने वाली पोस्टमार्टम रिपोर्ट की अनदेखी की।
सबसे महत्वपूर्ण बात, सुप्रीम कोर्ट ने इस बात पर जोर दिया कि हाईकोर्ट अपराध के वैधानिक अनुमान (statutory presumption) को भी भूल गया। पीठ ने भारतीय साक्ष्य अधिनियम, 2023 की धारा 118 (पूर्ववर्ती साक्ष्य अधिनियम, 1872 की धारा 113-B) का हवाला दिया, जो स्पष्ट करती है:
“जब सवाल यह हो कि क्या किसी व्यक्ति ने किसी महिला की दहेज हत्या की है और यह दर्शाया जाता है कि उसकी मृत्यु से ठीक पहले, ऐसे व्यक्ति द्वारा उस महिला को दहेज की किसी भी मांग के लिए या उसके संबंध में क्रूरता या उत्पीड़न का शिकार बनाया गया था, तो न्यायालय यह मान लेगा कि ऐसे व्यक्ति ने दहेज हत्या की है।”
फैसला सुप्रीम कोर्ट ने अपील स्वीकार करते हुए हाईकोर्ट द्वारा पारित अंतरिम जमानत आदेश को रद्द कर दिया। अदालत ने प्रतिवादी संख्या 2 (मूल आरोपी) को निर्देश दिया कि वह तुरंत ट्रायल कोर्ट के समक्ष आत्मसमर्पण करे, जिसके बाद उसे न्यायिक हिरासत में भेज दिया जाएगा। ट्रायल कोर्ट को मुकदमे की कार्यवाही शीघ्रता से आगे बढ़ाने का भी निर्देश दिया गया। इसके अलावा, सुप्रीम कोर्ट की रजिस्ट्री को इस आदेश की एक प्रति इलाहाबाद हाईकोर्ट के रजिस्ट्रार जनरल को भेजने का निर्देश दिया गया है, ताकि इसे हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश के समक्ष रखा जा सके।
केस विवरण
- केस का शीर्षक: चेतराम वर्मा बनाम उत्तर प्रदेश राज्य
- केस नंबर: आपराधिक अपील संख्या 770/2026 (एस एल पी (क्रिमिनल) संख्या 19237/2025 से उत्पन्न)
- पीठ: न्यायमूर्ति जे.बी. पारदीवाला और न्यायमूर्ति के.वी. विश्वनाथन
- अपीलकर्ता के अधिवक्ता: श्री गौरव यादव (अधिवक्ता), श्री चांद कुरैशी (AOR), श्री मोहम्मद उस्मान सिद्दीकी (अधिवक्ता), श्रीमती आयशा सिद्दीकी (अधिवक्ता), सुश्री सकीना किदवई (अधिवक्ता), श्री मोहम्मद सलमान सिद्दीकी (अधिवक्ता), सुश्री तस्लीम सिद्दीकी (अधिवक्ता), श्री रजत बैजल (अधिवक्ता)
- प्रतिवादी के अधिवक्ता: श्री अपूर्व अग्रवाल (ए.ए.जी.), श्री नमित सक्सेना (AOR), श्री अभिषेक कुमार सिंह (अधिवक्ता), श्री अजय कुमार सिंह (AOR), श्री यथार्थ सिंह (अधिवक्ता), श्री मनिंदर दुबे (अधिवक्ता), सुश्री सृष्टि गौतम (अधिवक्ता), श्री दिव्यांश सिंह (अधिवक्ता), श्री विकास सिंह (अधिवक्ता)

