बार-बार अभ्यावेदन देने से ‘मृत वाद का कारण’ जीवित नहीं हो जाता: सुप्रीम कोर्ट ने 16 साल की देरी से दायर याचिका खारिज की

सुप्रीम कोर्ट ने यह स्पष्ट किया है कि केवल बार-बार स्मारक पत्र (Memorials) और अभ्यावेदन (Representations) देने से एक “मृत वाद का कारण” (Dead Cause of Action) फिर से जीवित नहीं हो जाता। शीर्ष अदालत ने एश्योर्ड करियर प्रोग्रेशन (ACP) के वित्तीय लाभों की मांग करने वाली एक याचिका को खारिज कर दिया, जो याचिकाकर्ता की सेवानिवृत्ति के 16 साल बाद दायर की गई थी।

जस्टिस अरविंद कुमार और जस्टिस प्रसन्न बी. वराले की पीठ ने कहा कि हालांकि परिसीमा (Limitation) का मुद्दा आम तौर पर किसी व्यक्ति के निहित अधिकार (Vested Right) से मिलने वाले वैध लाभों को रोकने का आधार नहीं होना चाहिए, लेकिन ऐसे अधिकारों का उपयोग “उचित समय और उचित स्तर” पर किया जाना चाहिए।

यह मामला भूपाल सिंह भंडारी बनाम भारत संघ एवं अन्य से संबंधित है। याचिकाकर्ता ने दिल्ली हाईकोर्ट के 2 सितंबर, 2025 के फैसले को चुनौती देते हुए सुप्रीम कोर्ट में विशेष अनुमति याचिका (SLP) दायर की थी। हाईकोर्ट ने देरी और लचेस (Delay and Laches) के आधार पर उनकी याचिका खारिज कर दी थी। सुप्रीम कोर्ट ने भी माना कि याचिकाकर्ता की मांग “अत्यधिक और स्पष्टीकरण रहित देरी” से ग्रस्त है।

तथ्य और पृष्ठभूमि

याचिकाकर्ता, भूपाल सिंह भंडारी, 31 मई 2003 को अपनी सेवा से सेवानिवृत्त (Superannuated) हुए थे। हालांकि, उन्होंने एसीपी (ACP) लाभों की मांग करते हुए दिल्ली हाईकोर्ट में रिट याचिका (WPC No. 1964/2019) वर्ष 2019 में दायर की, यानी अपनी सेवानिवृत्ति के लगभग 16 साल बाद।

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हाईकोर्ट ने इस आधार पर याचिका खारिज कर दी थी कि याचिकाकर्ता ने अदालत का दरवाजा खटखटाने में बहुत देरी की है। इसके बाद याचिकाकर्ता ने सुप्रीम कोर्ट का रुख किया।

याचिकाकर्ता की दलीलें

याचिकाकर्ता की ओर से पेश वकील श्री ओ.पी. अग्रवाल, और एडवोकेट-ऑन-रिकॉर्ड श्री मनीष कुमार गुप्ता ने तर्क दिया कि ‘वाद का कारण’ (Cause of Action) सेवानिवृत्ति की तारीख के बाद उत्पन्न हुआ था। उन्होंने गृह मंत्रालय, सशस्त्र सीमा बल महानिदेशालय द्वारा जारी 5 मई, 2015 के एक आदेश का हवाला दिया।

दलील दी गई कि 2015 की अधिसूचना के बाद, याचिकाकर्ता के दावे को खारिज करने वाला एक आदेश पारित किया गया था। उनका कहना था कि उनके अभ्यावेदन के बावजूद मिली इस अस्वीकृति ने उनके लिए संविधान के अनुच्छेद 226 के तहत हाईकोर्ट के असाधारण क्षेत्राधिकार का उपयोग करने का एक नया आधार तैयार किया।

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कोर्ट का विश्लेषण और टिप्पणियाँ

सुप्रीम कोर्ट ने याचिकाकर्ता की दलीलों को खारिज करते हुए इस बात पर जोर दिया कि वह एक दशक से अधिक समय तक निष्क्रिय रहे।

पीठ ने अपनी टिप्पणी में कहा:

“मौजूदा मामले में, याचिकाकर्ता वर्ष 2003 में सेवानिवृत्त हुए और 2015 तक, यानी 05.05.2015 को भारत सरकार द्वारा आदेश जारी होने तक, उन्होंने अपनी छोटी उंगली भी नहीं उठाई या दूसरे शब्दों में कहें तो, वह गहरी नींद (Deep Sleep) में चले गए थे। जब उक्त आदेश पारित हुआ, तभी वह अपनी नींद से जागे और मृत वाद के कारण (Dead Cause of Action) को पुनर्जीवित करने के लिए स्मारक पत्र और अभ्यावेदन प्रस्तुत करना शुरू कर दिया।”

अदालत ने कहा कि असाधारण राहत तभी दी जा सकती है जब अधिकारों का प्रयोग उचित समय पर किया जाए।

पूर्व निर्णय का हवाला

बार-बार अभ्यावेदन देने के मुद्दे पर अपने निर्णय को पुख्ता करने के लिए, कोर्ट ने कर्नाटक पावर कॉरपोरेशन लिमिटेड बनाम के. थंगप्पन और अन्य [(2006) 4 SCC 322] के मामले का हवाला दिया।

उक्त फैसले का उल्लेख करते हुए पीठ ने नोट किया:

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“इस न्यायालय द्वारा कई मामलों में यह बताया गया है कि देरी को समझाने के लिए केवल अभ्यावेदन देना पर्याप्त स्पष्टीकरण नहीं होगा… अभ्यावेदन देने के लिए एक उचित समय सीमा होती है और यदि सरकार ने एक अभ्यावेदन को खारिज कर दिया है, तो उसी तर्ज पर दूसरा अभ्यावेदन देना देरी को उचित नहीं ठहराएगा।”

निर्णय

सुप्रीम कोर्ट ने निष्कर्ष निकाला कि हाईकोर्ट ने देरी और लचेस के आधार पर याचिका को सही ही “शुरुआत में ही खारिज” (Nipped at the bud) कर दिया था। पीठ ने कहा कि कानून की स्थापित स्थिति के मद्देनजर, वे इस याचिका पर विचार करने के इच्छुक नहीं हैं। तदनुसार, विशेष अनुमति याचिका खारिज कर दी गई।

केस विवरण:

केस का नाम: भूपाल सिंह भंडारी बनाम भारत संघ एवं अन्य

केस नंबर: स्पेशल लीव पिटीशन (सिविल) डायरी नंबर 1838/2026

कोरम: जस्टिस अरविंद कुमार और जस्टिस प्रसन्न बी. वराले 

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