इलाहाबाद हाईकोर्ट (लखनऊ बेंच) ने एक रेजिडेंट वेलफेयर एसोसिएशन (RWA) के पदाधिकारियों के खिलाफ दर्ज जबरन वसूली (Extortion) और आपराधिक धमकी के मुकदमे को रद्द कर दिया है। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि सोसायटी में गलत पार्किंग करने पर निर्वाचित RWA द्वारा जुर्माना लगाना ‘रंगदारी’ या ‘वसूली’ की श्रेणी में नहीं आता है।
न्यायमूर्ति पंकज भाटिया की पीठ ने भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS) की धारा 528 के तहत दायर याचिका को स्वीकार करते हुए यह फैसला सुनाया। कोर्ट ने शिकायतकर्ता (इन्फॉर्मेंट) को भी कड़ी फटकार लगाई, जिसने RWA सदस्यों पर दबाव बनाने के लिए राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) में अपनी सदस्यता का अनुचित इस्तेमाल किया था।
मामले की पृष्ठभूमि
यह मामला लखनऊ की ‘सेलिब्रिटी ग्रीन्स’ सोसायटी से जुड़ा है। सोसायटी के सचिव कमलेश अग्निहोत्री, अध्यक्ष और केयरटेकर के खिलाफ भारतीय न्याय संहिता (BNS) की धारा 308(2) (जबरन वसूली), 351(2) (आपराधिक धमकी) और 352 (शांति भंग करने के इरादे से अपमान) के तहत चार्जशीट दाखिल की गई थी। इसके बाद मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट, लखनऊ ने उन्हें समन जारी किया था, जिसे हाईकोर्ट में चुनौती दी गई थी।
याचिकाकर्ताओं के अनुसार, 24 नवंबर 2024 को हुई बोर्ड मीटिंग में RWA ने बेतरतीब पार्किंग को रोकने के लिए एक प्रस्ताव पारित किया था। इसके तहत निवासियों को सलाह और चेतावनी देने के बाद, तीसरी बार उल्लंघन करने पर वाहन को लॉक करने और 500 रुपये का जुर्माना लगाने का प्रावधान किया गया था।
विपक्षी संख्या 2 (निवासी) ने FIR दर्ज कराते हुए आरोप लगाया कि RWA सदस्यों ने एक गिरोह बना लिया है और निवासियों से अवैध वसूली कर रहे हैं। शिकायतकर्ता ने FIR में विशेष रूप से उल्लेख किया कि वह राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) के ‘भाऊराव देवरस ट्रस्ट’ का ट्रस्टी है। उसने आरोप लगाया कि 1 मई को उसे धमकाया गया और बिना किसी अधिकार के पैसे मांगे गए।
दलीलों पर चर्चा
याचिकाकर्ताओं के वकील श्री मोहित मिश्रा ने तर्क दिया कि RWA एक पंजीकृत संस्था है और पार्किंग दिशानिर्देश ट्रैफिक जाम को रोकने के लिए एक कल्याणकारी कदम था। उन्होंने कहा कि शिकायतकर्ता अपने सामाजिक पद और RSS ट्रस्ट की सदस्यता का धौंस दिखाकर निर्वाचित सदस्यों को डराना चाहता है और यह मुकदमा दुर्भावनापूर्ण है।
दूसरी ओर, शिकायतकर्ता के वकील डॉ. एल.पी. मिश्रा ने RWA के प्रबंधन को “तानाशाही” करार दिया। प्रति-शपथ पत्र में कहा गया कि शिकायतकर्ता और उसका परिवार RWA के आदेशों के सामने खुद को असहाय महसूस कर रहा था। यह भी आरोप लगाया गया कि उसकी कार का टायर जाम कर दिया गया और पैसे की मांग की गई, जिसके कारण मजबूरन FIR दर्ज करानी पड़ी।
हाईकोर्ट का विश्लेषण
न्यायमूर्ति पंकज भाटिया ने मामले के तथ्यों और BNS की धाराओं का विश्लेषण करते हुए निम्नलिखित टिप्पणियां कीं:
1. जबरन वसूली या धमकी का कोई अपराध नहीं बनता: कोर्ट ने पाया कि भले ही FIR और चार्जशीट में लगाए गए आरोपों को सच मान लिया जाए, फिर भी BNS की संबंधित धाराओं के तहत कोई अपराध नहीं बनता। कोर्ट ने कहा कि ऐसा कोई सबूत नहीं है जिससे यह साबित हो कि आवेदकों ने किसी व्यक्ति को जानबूझकर चोट पहुंचाने का डर दिखाया हो।
कोर्ट ने कहा, “रिकॉर्ड पर ऐसी कोई सामग्री नहीं है जिससे यह पता चले कि आवेदकों ने शिकायतकर्ता या किसी अन्य निवासी को जानबूझकर भयभीत किया या बेईमानी से कोई संपत्ति देने के लिए प्रेरित किया। शिकायतकर्ता से कोई राशि नहीं वसूली गई थी।”
कोर्ट ने माना कि जुर्माना लगाने का निर्णय RWA की जनरल बॉडी द्वारा पारित प्रस्ताव पर आधारित था, जिसे किसी भी तरह से ‘रंगदारी’ नहीं कहा जा सकता।
2. विवेचना अधिकारी की “अधूरी जांच”: हाईकोर्ट ने जांच अधिकारी (IO) श्री शिव कांत तिवारी की कार्यशैली पर गंभीर सवाल उठाए। कोर्ट ने कहा कि IO ने “अधूरी विवेचना” (Half-baked investigation) की और चार्जशीट दाखिल करने से पहले न तो RWA के उपनियमों (Bye-laws) की जांच की और न ही सोसायटी के अन्य निवासियों के बयान दर्ज किए।
कोर्ट ने टिप्पणी की, “विवेचना स्पष्ट रूप से अधूरी है और ऐसा प्रतीत होता है कि यह विपक्षी संख्या 2 (शिकायतकर्ता) द्वारा धारित पद के प्रभाव में की गई है।”
कोर्ट ने आदेश दिया कि इस फैसले की एक प्रति जांच अधिकारी की वार्षिक गोपनीय रिपोर्ट (ACR) में दर्ज की जाए और पुलिस महानिदेशक (DGP) को भेजी जाए ताकि यह तय किया जा सके कि भविष्य में उन्हें विवेचना का जिम्मा सौंपा जाना चाहिए या नहीं।
3. RSS की सदस्यता का दुरुपयोग: कोर्ट ने FIR में RSS का नाम इस्तेमाल करने पर शिकायतकर्ता के आचरण की कड़ी आलोचना की।
न्यायमूर्ति भाटिया ने कहा, “‘बड़ी शक्तियों के साथ बड़ी जिम्मेदारी भी आती है’ (With great powers come great responsibility)। विपक्षी संख्या 2 ने स्पष्ट रूप से उन शक्तियों के साथ जिम्मेदारी नहीं निभाई है, जिसका दावा उन्होंने किया है।”
कोर्ट ने आगे कहा:
“प्रथम दृष्टया, RSS जैसे अत्यधिक अनुशासित और सम्मानित सांस्कृतिक संगठन को बदनाम किया गया है और विपक्षी संख्या 2 द्वारा इस मामले में सदस्यता का दुरुपयोग किया गया है… यह कोर्ट इस पर आगे कुछ नहीं कह सकती कि विपक्षी संख्या 2 ने किस तरह से एक सम्मानित संगठन के नाम का दुरुपयोग किया है।”
निर्णय
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने निष्कर्ष निकाला कि FIR, चार्जशीट और समनिंग आदेश कानून की प्रक्रिया का दुरुपयोग (Abuse of process of law) है, जिसे एक असंतुष्ट निवासी द्वारा RWA के निर्वाचित सदस्यों के खिलाफ शुरू किया गया था।
परिणामस्वरूप, कोर्ट ने केस क्राइम संख्या 392/2025 से उत्पन्न पूरा आपराधिक मामला (केस संख्या 115214/2025) रद्द (Quash) कर दिया।
केस का विवरण:
- केस शीर्षक: कमलेश अग्निहोत्री उर्फ कमल व अन्य बनाम उत्तर प्रदेश राज्य व अन्य
- केस संख्या: APPLICATION U/S 528 BNSS No. 1980 of 2025
- कोरम: न्यायमूर्ति पंकज भाटिया
- आवेदकों के वकील: शैलेंद्र कुमार सिंह, मोहित मिश्रा, सुनील कुमार
- विपक्षी के वकील: जी.ए., श्रीनिवास बाजपेयी, विनय प्रकाश तिवारी, शंकर लाल पांडेय, डॉ. एल.पी. मिश्रा, अभय शुक्ला

