सुप्रीम कोर्ट ने एक संपत्ति विवाद में दायर अपील को खारिज करते हुए स्पष्ट किया है कि यदि वादपत्र (plaint) में कथित बेदखली (dispossession) की तारीख और दावे के आधार के बारे में महत्वपूर्ण दलीलों (material pleadings) का अभाव है, तो कब्जे की वापसी (recovery of possession) का मुकदमा सफल नहीं हो सकता।
जस्टिस पंकज मिथल और जस्टिस एस.वी.एन. भट्टी की पीठ ने कहा कि स्थायी निषेधाज्ञा (perpetual injunction) या कब्जे की वापसी की राहत पाने के लिए, वादी को या तो वास्तविक कब्जा साबित करना होगा या यह विशिष्ट विवरण देना होगा कि कब्जा कब और कैसे खोया गया।
मामले की पृष्ठभूमि
यह अपील हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट के 24 जुलाई, 2010 के फैसले (RSA No. 221 of 1998) के खिलाफ दायर की गई थी।
मूल मुकदमा (केस संख्या 496/1990) शाम सुंदर (अब मृतक और उनके कानूनी वारिसों द्वारा प्रतिनिधित्व) द्वारा सब जज प्रथम श्रेणी, ऊना के समक्ष दायर किया गया था। वादी ने शुरू में गांव लोहारा, तहसील अंब, जिला ऊना में स्थित 8 कनाल 05 मरला कृषि भूमि पर अपने कब्जे में हस्तक्षेप रोकने के लिए प्रतिवादियों के खिलाफ स्थायी निषेधाज्ञा की मांग की थी। बाद में, वादपत्र में संशोधन कर कब्जे की वापसी की प्रार्थना भी शामिल की गई।
वादी ने भूमि का मालिक/सह-मालिक होने का दावा किया। पहली प्रतिवादी, सोमा देवी (अब मृतक), ने मुकदमे का विरोध करते हुए दावा किया कि वह वाद अनुसूची (suit schedule) के कब्जे में थीं। उन्होंने दलील दी कि उनके पति रोशन लाल की मृत्यु के बाद, उनके ससुर ने परिवार के कर्ता के रूप में भरण-पोषण (maintenance) के बदले उन्हें भूमि का उपभोग करने का अधिकार दिया था। उनका तर्क था कि हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम, 1956 की धारा 14(1) के तहत यह अधिकार पूर्ण स्वामित्व में बदल गया।
निचली अदालतों का फैसला
- ट्रायल कोर्ट: 20 जून, 1992 के फैसले द्वारा ट्रायल कोर्ट ने मुकदमा खारिज कर दिया।
- प्रथम अपीलीय न्यायालय: अतिरिक्त जिला न्यायाधीश, ऊना ने 8 अप्रैल, 1998 को वादी की अपील स्वीकार कर ली।
- हाईकोर्ट: दूसरी अपील में, हाईकोर्ट ने प्रथम अपीलीय न्यायालय के आदेश को रद्द कर दिया। हाईकोर्ट ने माना कि सोमा देवी को भरण-पोषण के बदले मिला सीमित अधिकार हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम, 1956 की धारा 14(1) के तहत पूर्ण स्वामित्व में बदल गया था।
सुप्रीम कोर्ट के समक्ष तर्क
अपीलकर्ताओं (वादियों) की ओर से पेश वकील श्री मोहित डी. राम ने तर्क दिया कि वादी का नाम राजस्व रिकॉर्ड में दर्ज है और वह संपत्ति में हिस्से के हकदार हैं। उन्होंने कहा कि कब्जे की वापसी की वैकल्पिक प्रार्थना पर विचार किया जाना चाहिए था क्योंकि पहली प्रतिवादी भरण-पोषण के लिए भूमि दिए जाने की अपनी दलील साबित करने में विफल रही थीं।
इसके विपरीत, प्रतिवादियों के वकील श्री गोविंद गोयल ने तर्क दिया कि वादी कब्जा साबित करने में विफल रहे हैं। उन्होंने कहा कि वादी ने यह उल्लेख या साबित नहीं किया कि 1990 में दायर मुकदमे में कब्जे की वापसी का दावा कैसे पोषणीय (maintainable) है, जबकि यह स्थापित नहीं किया गया कि कब्जा कब खोया गया था।
सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी
सुप्रीम कोर्ट ने स्थायी निषेधाज्ञा और कब्जे की वापसी के लिए आवश्यक शर्तों की जांच की। कोर्ट ने नोट किया कि स्थायी निषेधाज्ञा के लिए, वादी को वाद दायर करने की तारीख पर वास्तविक कब्जा साबित करना होता है।
कब्जे की वापसी के दावे के संबंध में, पीठ ने उन आवश्यक शर्तों को रेखांकित किया जिनका उल्लेख वादपत्र (pleadings) में होना अनिवार्य है:
- हकदारी (Entitlement)।
- हकदारी का तरीका।
- बेदखली की तारीख और तरीके का विशिष्ट विवरण।
- प्रतिवादी द्वारा दावा किए गए कब्जे की प्रकृति और वह अवैध क्यों है।
पीठ ने पाया कि वर्तमान मामले में, “इन दलीलों का पूरी तरह से अभाव है।”
मिसाल (Precedent) का हवाला
कोर्ट ने मारिया मार्गरीडा सिकेरा फर्नांडीस बनाम इरास्मो जैक डी सिकेरा (2012) 5 SCC 370 के फैसले का हवाला दिया, जो यह अनिवार्य करता है कि दलीलों में पर्याप्त विवरण होने चाहिए। कोर्ट ने उस फैसले को उद्धृत करते हुए कहा:
“कब्जे में बने रहने के अधिकार का दावा करने वाले व्यक्ति को, जहां तक संभव हो, अपने दावे के समर्थन में दस्तावेजों के साथ विस्तृत विशिष्ट दलीलें देनी चाहिए और बाद के आचरण का विवरण देना चाहिए जो उसके कब्जे को स्थापित करता हो।”
सुप्रीम कोर्ट ने दोहराया कि दलीलों में विशेष रूप से यह बताया जाना चाहिए कि मालिक कौन है, कब्जे में प्रवेश की तारीख क्या है और दावे का आधार क्या है।
निर्णय
सुप्रीम कोर्ट ने माना कि वादपत्र में “कथित बेदखली की तारीख और उस आधार का आवश्यक विवरण नहीं है जिस पर कब्जे की वापसी की प्रार्थना की गई है।”
पीठ ने प्रथम अपीलीय न्यायालय की आलोचना की कि उसने वादी के मामले में कमियों को नजरअंदाज करते हुए प्रतिवादी पर बोझ डाल दिया।
जस्टिस एस.वी.एन. भट्टी ने पीठ के लिए फैसला लिखते हुए कहा, “भौतिक दलीलों और सबूतों के अभाव में, वादी का मुकदमा सही रूप से खारिज किया गया है।”
परिणामस्वरूप, सिविल अपील खारिज कर दी गई। यद्यपि मुख्य रूप से कब्जे के संबंध में साक्ष्य और दलीलों की कमी के आधार पर, लेकिन हाईकोर्ट के फैसले को बरकरार रखा गया।
केस विवरण:
- केस टाइटल: कांता और अन्य बनाम सोमा देवी (मृतक) कानूनी वारिसों के माध्यम से और अन्य
- केस नंबर: सिविल अपील संख्या 8451/2011 (2026 INSC 133)
- पीठ: जस्टिस पंकज मिथल और जस्टिस एस.वी.एन. भट्टी

