सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि यदि पति-पत्नी के बीच सुलह की रत्ती भर भी गुंजाइश नहीं बची है, तो हिंदू विवाह अधिनियम की धारा 13बी(2) के तहत निर्धारित छह महीने के ‘कूलिंग पीरियड’ (प्रतीक्षा अवधि) को बाध्यकारी नहीं माना जा सकता। शीर्ष अदालत ने मध्य प्रदेश हाईकोर्ट के उस आदेश को रद्द कर दिया, जिसमें आपसी सहमति से तलाक मांग रहे एक जोड़े के लिए इस अवधि को माफ करने से इनकार कर दिया गया था।
जस्टिस एम.एम. सुंदरेश और जस्टिस नोंगमीकप्पम कोटेश्वर सिंह की पीठ ने यह अहम फैसला सुनाया। कोर्ट के सामने मुख्य कानूनी सवाल यह था कि क्या वर्तमान मामले के तथ्यों को देखते हुए आपसी सहमति से तलाक के लिए अनिवार्य छह महीने की प्रतीक्षा अवधि में छूट दी जा सकती है या नहीं। सुप्रीम कोर्ट ने पक्षकारों के हक में फैसला सुनाते हुए हाईकोर्ट के आदेश को खारिज कर दिया और विवाह विच्छेद की डिक्री प्रदान की।
पृष्ठभूमि
यह मामला एक ऐसे पति-पत्नी से संबंधित है जो आपसी सहमति से अपनी शादी खत्म करने के लिए पूरी तरह सहमत (ad idem) थे। दोनों पक्षों ने हाईकोर्ट में अर्जी लगाकर हिंदू विवाह अधिनियम, 1955 की धारा 13बी(2) के तहत अनिवार्य छह महीने की प्रतीक्षा अवधि में छूट की मांग की थी।
हालाँकि, हाईकोर्ट ने उनके अनुरोध को अस्वीकार कर दिया था। हाईकोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के पूर्व निर्णय अमरदीप सिंह बनाम हरवीन कौर (2017) का हवाला देते हुए यह माना कि उस फैसले में निर्धारित शर्तें अनिवार्य हैं और मौजूदा मामले में उनका पालन नहीं होने के कारण छूट नहीं दी जा सकती।
दलीलें और अवलोकन
सुप्रीम कोर्ट में पक्षकारों की ओर से पेश वकीलों ने तर्क दिया कि हाईकोर्ट ने अमरदीप सिंह मामले के फैसले का गलत अर्थ निकाला है। उन्होंने कोर्ट का ध्यान अमित कुमार बनाम सुमन बेनीवाल (2023) के फैसले की ओर आकर्षित किया, जिसमें सुप्रीम कोर्ट ने कूलिंग पीरियड माफ करने के सिद्धांतों को विस्तार से समझाया था।
शीर्ष अदालत ने इस दलील को स्वीकार किया। पीठ ने कहा कि हाईकोर्ट ने अमरदीप सिंह मामले में उल्लिखित कारकों को केवल उदाहरण के तौर पर देखने के बजाय उन्हें कठोर शर्तों के रूप में लागू करने की गलती की है।
कोर्ट का विश्लेषण
कानूनी स्थिति को स्पष्ट करने के लिए, सुप्रीम कोर्ट ने अमित कुमार बनाम सुमन बेनीवाल के फैसले के पैरा 18 से 21 का उल्लेख किया। कोर्ट ने दोहराया कि कूलिंग पीरियड का उद्देश्य सुलह की संभावना तलाशना है।
कोर्ट ने अमित कुमार मामले की निम्नलिखित टिप्पणी को उद्धृत किया:
“जहां सुलह की थोड़ी सी भी संभावना हो, वहां तलाक की याचिका दायर करने की तारीख से छह महीने की कूलिंग पीरियड को लागू किया जाना चाहिए। हालांकि, यदि सुलह की कोई संभावना नहीं है, तो विवाह के पक्षकारों की पीड़ा को लंबा खींचना निरर्थक होगा।”
पीठ ने इस सिद्धांत पर जोर दिया कि यदि शादी पूरी तरह से टूट चुकी है (irretrievably broken) और पति-पत्नी ने अलग होने का फैसला कर लिया है, तो उन्हें जीवन में आगे बढ़ने में सक्षम बनाने के लिए विवाह को समाप्त करना ही बेहतर है।
प्रतीक्षा अवधि की कानूनी प्रकृति के संबंध में, कोर्ट ने कहा कि धारा 13-बी(2) में उल्लिखित अवधि अनिवार्य (mandatory) नहीं बल्कि निर्देशामक (directory) है। अदालत ने स्पष्ट किया कि यदि यह पाया जाता है कि पार्टियों के दोबारा साथ रहने की कोई संभावना नहीं है, तो अदालत अपने विवेक का प्रयोग कर सकती है।
कोर्ट ने कहा कि जब पार्टियों ने धारा 13बी के तहत आपसी सहमति से तलाक लेने का सचेत निर्णय ले लिया है, तो शादी को जारी रखने का कोई औचित्य नहीं है।
फैसला
इन टिप्पणियों के आधार पर, सुप्रीम कोर्ट ने माना कि हाईकोर्ट का आदेश रद्द किए जाने योग्य है।
नतीजतन, कोर्ट ने संविधान के अनुच्छेद 142 के तहत अपनी शक्तियों का प्रयोग करते हुए पक्षकारों को आपसी सहमति से तलाक की डिक्री प्रदान की। कोर्ट ने आदेश दिया कि सेटलमेंट एग्रीमेंट (अनुबंध पी/1) की शर्तें इस आदेश का हिस्सा होंगी।
तदनुसार अपील का निपटारा कर दिया गया।
केस डिटेल्स:
- केस का नाम: मिशा सोमानी बनाम ऋतुराज सोमानी
- केस नंबर: सिविल अपील संख्या 801/2026 (@ एसएलपी [सी] संख्या 3775/2026)
- कोरम: जस्टिस एम.एम. सुंदरेश और जस्टिस नोंगमीकप्पम कोटेश्वर सिंह

