इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ पीठ ने एक महत्वपूर्ण निर्णय में स्पष्ट किया है कि मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट (CJM) के पास किसी पक्षकार के आवेदन पर एक आपराधिक मामले को एक अदालत से दूसरी अदालत में स्थानांतरित (Transfer) करने का वैधानिक अधिकार नहीं है।
न्यायमूर्ति तेज प्रताप तिवारी की पीठ ने कहा कि भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS) और दंड प्रक्रिया संहिता (CrPC) के तहत मामलों को स्थानांतरित करने की शक्ति विशेष रूप से सत्र न्यायाधीश (Sessions Judge), हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट में निहित है। इसके फलस्वरूप, कोर्ट ने मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट, लखनऊ द्वारा पारित स्थानांतरण आदेश को क्षेत्राधिकार से बाहर (Without Jurisdiction) बताते हुए रद्द कर दिया।
मामले की पृष्ठभूमि
यह याचिका नितेश रस्तोगी द्वारा BNSS की धारा 528 के तहत दायर की गई थी, जिसमें मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट (CJM), लखनऊ द्वारा पारित 10 अक्टूबर 2025 के आदेश को चुनौती दी गई थी। इस विवादित आदेश के द्वारा आपराधिक वाद संख्या 6148/2022 (राज्य बनाम बिजेन्द्र पाल सिंह व अन्य) का विचारण न्यायिक मजिस्ट्रेट प्रथम (A.T.S.), लखनऊ की अदालत से अतिरिक्त मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट प्रथम, लखनऊ की अदालत में स्थानांतरित कर दिया गया था।
यह मामला बिजेन्द्र पाल सिंह और राजीव सिंह के खिलाफ लगभग 3.20 करोड़ रुपये के सोने के जेवर के कथित गबन के लिए दर्ज एफआईआर से उत्पन्न हुआ था। विवेचना के बाद आरोप पत्र दाखिल किया गया और फरवरी 2022 में ट्रायल कोर्ट ने संज्ञान लिया था।
विचारण के दौरान, आरोपी व्यक्तियों ने सत्र न्यायाधीश, लखनऊ के समक्ष केस ट्रांसफर करने के लिए एक आवेदन दिया था, जिसे खारिज कर दिया गया था। इसके बाद, उन्होंने CJM, लखनऊ के समक्ष एक और ट्रांसफर आवेदन दायर किया। न्यायिक मजिस्ट्रेट से रिपोर्ट मांगने के बाद, CJM ने केस को स्थानांतरित करने का विवादित आदेश पारित कर दिया था।
पक्षों की दलीलें
याची के अधिवक्ता अमित जायसवाल और अमरीश सिंह यादव ने तर्क दिया कि CrPC की धारा 408 (BNSS की धारा 448 के अनुरूप) विशेष रूप से सत्र न्यायाधीश को केस ट्रांसफर करने की शक्ति प्रदान करती है। उन्होंने कहा कि CJM में ऐसी कोई समकक्ष शक्ति निहित नहीं है। इस तर्क के समर्थन में राधेश्याम बनाम उत्तर प्रदेश राज्य और सुदेश शिकारा बनाम राज्य (एनसीटी दिल्ली सरकार) सहित कई निर्णयों का हवाला दिया गया।
याची ने आगे तर्क दिया कि CJM के समक्ष दायर ट्रांसफर आवेदन के साथ शपथ पत्र (Affidavit) संलग्न नहीं था, जो कि दीपक बाबरिया बनाम गुजरात राज्य के मामले में निर्धारित अनिवार्य वैधानिक आवश्यकताओं का उल्लंघन है।
इसके विपरीत, सरकारी वकील (A.G.A.) और विपक्षी पक्षों के वकीलों ने तर्क दिया कि CJM के पास अपने अधीनस्थ मजिस्ट्रेटों के बीच कार्य वितरण के लिए CrPC की धारा 15 के तहत प्रशासनिक और पर्यवेक्षी अधिकार हैं। उन्होंने कहा कि मामलों को वापस लेने और पुन: सौंपने की शक्ति इस नियंत्रण से ही उत्पन्न होती है और इसका प्रयोग न्याय के हित में किया गया था।
कोर्ट का विश्लेषण
न्यायमूर्ति तिवारी ने BNSS और CrPC की योजना, विशेष रूप से धारा 15 (न्यायिक मजिस्ट्रेटों की अधीनता), धारा 410 (मामलों को वापस लेना), और धारा 407/408 (मामलों को स्थानांतरित करने की हाईकोर्ट/सत्र न्यायाधीश की शक्ति) का परीक्षण किया।
कोर्ट ने महत्वपूर्ण टिप्पणी करते हुए कहा:
“आपराधिक मामलों के स्थानांतरण से संबंधित शक्तियों की योजना विधायी मंशा को पर्याप्त स्पष्टता के साथ प्रदर्शित करती है। इन प्रावधानों के तहत, आपराधिक मामलों को स्थानांतरित करने का अधिकार स्पष्ट रूप से सुप्रीम कोर्ट, हाईकोर्ट और सत्र न्यायालय को प्रदान किया गया है।”
कोर्ट ने आगे कहा:
“वैधानिक ढांचे का सावधानीपूर्वक अध्ययन यह स्पष्ट करता है कि मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट (CJM) को आपराधिक मामलों को स्थानांतरित करने की कोई शक्ति नहीं दी गई है। संहिता के तहत निर्धारित पदानुक्रम और अधीनता स्पष्ट रूप से स्थापित करती है कि CJM सत्र न्यायाधीश के अधीनस्थ हैं।”
सुदेश शिकारा बनाम राज्य (2025) और ए.के. सिंह बनाम वीरेन्द्र कुमार जैन (1999) के निर्णयों का हवाला देते हुए, कोर्ट ने मामलों की प्रशासनिक वापसी और न्यायिक स्थानांतरण के बीच के अंतर को स्पष्ट किया:
“धारा 410… मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट का अधिकार क्षेत्र प्रशासनिक प्रकृति का है। यह उनके अधीन काम करने वाले विभिन्न मजिस्ट्रेटों के बीच मामलों का संतुलन बनाए रखने के लिए है… यह प्रावधान मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट को किसी एक पक्ष की शिकायत पर स्थानांतरण की शक्ति का प्रयोग करने का अधिकार नहीं देता है। इसके लिए, पीड़ित पक्ष का उपाय धारा 408 के तहत है… जिसका प्रयोग सत्र न्यायाधीश द्वारा किया जाता है।”
कोर्ट ने इलाहाबाद हाईकोर्ट के परिपत्र आदेशों (Circular Orders) का भी उल्लेख किया, जिसमें कहा गया है कि CJM द्वारा कार्य के किसी भी वितरण या उसमें बदलाव के लिए जिला न्यायाधीश के पूर्व अनुमोदन की आवश्यकता होती है। कोर्ट ने पाया कि वर्तमान मामले में न तो पूर्व अनुमोदन लिया गया और न ही सत्र न्यायाधीश को सूचित किया गया।
निर्णय
हाईकोर्ट ने माना कि CJM, लखनऊ ने अपने अधिकार क्षेत्र से बाहर जाकर कार्य किया। कोर्ट ने इस बात पर जोर दिया कि सत्र न्यायाधीश द्वारा ट्रांसफर आवेदन को पहले ही खारिज कर दिया गया था, जिसे विवादित आदेश पारित करते समय नजरअंदाज किया गया।
परिणामस्वरूप, कोर्ट ने 10 अक्टूबर 2025 के आदेश को रद्द करते हुए याचिका को स्वीकार कर लिया।
विशेष रूप से, यह देखते हुए कि जिला अदालतों में इस तरह की प्रथा प्रचलित है, कोर्ट ने रजिस्ट्री को एक निर्देश जारी किया:
“इस मामले में उठाए गए मुद्दे के महत्व और इस गंभीर तथ्य को देखते हुए कि उत्तर प्रदेश राज्य भर में अधिकांश जिला न्यायालयों द्वारा ऐसी प्रथा का पालन किया जा रहा है, इस न्यायालय के विद्वान महानिबंधक (Registrar General) को निर्देश दिया जाता है कि वे इस संबंध में एक उचित परिपत्र (Circular) जारी करें।”
केस विवरण:
केस टाइटल: नितेश रस्तोगी बनाम उत्तर प्रदेश राज्य एवं अन्य
केस नंबर: एप्लीकेशन यू/एस 482 नंबर 9472 ऑफ 2025
कोरम: माननीय न्यायमूर्ति तेज प्रताप तिवारी
याची के अधिवक्ता: अमित जायसवाल, अमरीश सिंह यादव
विपक्षी के अधिवक्ता: जी.ए., दुर्गेश कुमार शुक्ला, पं. एस. चंद्रा, अरविंद के. त्रिपाठी

