सिक्योरिटी चेक का उपयोग देनदारी चुकाने के लिए किया जा सकता है; विवादित तथ्यों की जांच क्वैशिंग चरण में नहीं हो सकती: पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट

पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट ने निगोशिएबल इंस्ट्रूमेंट्स एक्ट, 1881 (NI Act) की धारा 138 के तहत दायर आपराधिक शिकायत को रद्द करने की मांग वाली याचिका को खारिज कर दिया है। हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि ‘सिक्योरिटी चेक’ वाणिज्यिक प्रक्रिया (commercial process) का एक अभिन्न अंग है और इसका उपयोग कानूनी रूप से देनदारी (liability) का भुगतान करने के लिए किया जा सकता है।

जस्टिस मनीषा बत्रा ने कहा कि विवादित तथ्यात्मक प्रश्न, जैसे कि खराब माल या पूर्व भुगतान के दावे, दंड प्रक्रिया संहिता (Cr.P.C.) की धारा 482 के तहत शक्तियों का प्रयोग करते हुए हाईकोर्ट द्वारा तय नहीं किए जा सकते। इन तथ्यों का निर्धारण सबूतों का आकलन करने के बाद ट्रायल कोर्ट द्वारा ही किया जाना चाहिए।

मामले की पृष्ठभूमि

यह मामला मेसर्स सुपर ऑयल्स (प्रतिवादी), जो औद्योगिक तेल और लुब्रिकेंट्स की आपूर्ति करने वाली एक साझेदारी फर्म है, द्वारा दायर शिकायत से उत्पन्न हुआ। फर्म ने आरोप लगाया कि आरती त्रेहन (याचिकाकर्ता नंबर 1), जो याचिकाकर्ता फर्म की प्रोपराइटर हैं, ने उधार पर सामान खरीदा था। शिकायत के अनुसार, 1 नवंबर 2022 तक याचिकाकर्ताओं पर 2,11,073 रुपये की राशि बकाया थी।

इस देनदारी को चुकाने के लिए, याचिकाकर्ताओं ने कथित तौर पर 1,13,245 रुपये और 96,146 रुपये के दो चेक जारी किए। जब इन चेकों को बैंक में लगाया गया, तो वे “ड्रॉअर द्वारा भुगतान रोका गया” (Payment stopped by drawer) की टिप्पणी के साथ बाउंस हो गए। चेक बाउंस होने के बाद, प्रतिवादी ने कानूनी नोटिस भेजा और भुगतान न होने पर शिकायत दर्ज कराई।

ज्यूडिशियल मजिस्ट्रेट फर्स्ट क्लास, लुधियाना ने प्रथम दृष्टया मामला पाते हुए 18 मार्च 2023 को समनिंग आदेश जारी किया। याचिकाकर्ताओं ने शिकायत और समनिंग आदेश दोनों को रद्द करने के लिए हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया।

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पक्षों की दलीलें

याचिकाकर्ताओं के वकील ने तर्क दिया कि चेक केवल “सिक्योरिटी चेक” के रूप में जारी किए गए थे। उन्होंने दावा किया कि प्रतिवादी द्वारा आपूर्ति की गई माल की अंतिम खेप खराब थी। यह कहा गया कि खराब सामग्री के संबंध में मामले को सुलझाने और बही-खातों का मिलान करने के अनुरोधों के बावजूद, प्रतिवादी ने सिक्योरिटी चेक बैंक में लगा दिए।

याचिकाकर्ताओं का दावा था कि चूंकि माल सब-स्टैंडर्ड था, इसलिए कोई कानूनी रूप से लागू करने योग्य देनदारी (legally enforceable liability) मौजूद नहीं थी। इसके अलावा, उन्होंने तर्क दिया कि यह शिकायत उनके द्वारा पहले से दायर एक दीवानी मुकदमे के जवाब में (counterblast) दायर की गई है। उन्होंने यह भी दावा किया कि वे प्रतिवादी को पहले ही 7 लाख रुपये का भुगतान कर चुके हैं।

इसके जवाब में, प्रतिवादी के वकील ने तर्क दिया कि चेक कानूनी देनदारी को चुकाने के लिए जारी किए गए थे और भुगतान जानबूझकर रोका गया था। यह कहा गया कि ट्रायल कोर्ट ने एक तर्कसंगत आदेश पारित किया है और जब तक कोई ऐसा पुख्ता सबूत न हो जो यह दिखाए कि याचिकाकर्ताओं का चेकों से कोई लेना-देना नहीं है, तब तक हाईकोर्ट को हस्तक्षेप नहीं करना चाहिए।

कोर्ट की टिप्पणियाँ और विश्लेषण

जस्टिस मनीषा बत्रा ने याचिकाकर्ताओं की दलीलों को खारिज करते हुए जोर दिया कि धारा 482 Cr.P.C. के तहत अंतर्निहित अधिकार क्षेत्र का प्रयोग “संयम और सावधानी” के साथ किया जाना चाहिए।

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विवादित तथ्यों पर

हाईकोर्ट ने देखा कि याचिकाकर्ताओं द्वारा माल की गुणवत्ता और पूर्व भुगतान के संबंध में उठाए गए बचाव तथ्यात्मक मुद्दे हैं, जिनकी पुष्टि केवल ट्रायल के दौरान ही की जा सकती है। सुप्रीम कोर्ट के मेसर्स एम.एम.टी.सी. लिमिटेड और अन्य बनाम मेसर्स मेडचल केमिकल्स एंड फार्मा पी. लिमिटेड और एचएमटी वॉचेस लिमिटेड बनाम एम.ए. आबिदा के फैसलों का हवाला देते हुए, कोर्ट ने कहा कि हाईकोर्ट क्वैशिंग के चरण में आरोपी के संभावित बचाव की सराहना करने के लिए ट्रायल कोर्ट की भूमिका नहीं निभा सकता।

कोर्ट ने कहा:

“यह साबित करने का भार कि कोई मौजूदा ऋण या दायित्व नहीं था, उत्तरदाताओं (आरोपियों) पर है। उन्हें इसे ट्रायल में चुकाना होगा। इस स्तर पर, केवल आरोपी द्वारा दायर याचिका में किए गए बयानों के आधार पर, हाईकोर्ट को यह निष्कर्ष नहीं निकालना चाहिए कि कोई मौजूदा ऋण या दायित्व नहीं था।”

सिक्योरिटी चेक पर

यह तर्क कि चेक सुरक्षा (security) के लिए जारी किए गए थे, पर कोर्ट ने शालिनी एंटरप्राइज और अन्य बनाम इंडियाबुल्स फाइनेंशियल सर्विसेज लिमिटेड के फैसले पर भरोसा किया। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि “सिक्योरिटी चेक” का लेबल ड्रॉअर को एनआई एक्ट के तहत दायित्व से मुक्त नहीं करता है।

कोर्ट ने टिप्पणी की:

“सुरक्षा (Security) ड्रॉअर के लिए अपनी वित्तीय प्रतिबद्धता का अनादर करने के खिलाफ कोई निवारक नहीं है, बल्कि इसे ड्रॉअर के दायित्व के निर्वहन के लिए कानूनी और वैध रूप से उपयोग किया जा सकता है… एक सिक्योरिटी चेक ड्रॉअर की ओर से दायित्व की स्वीकृति है कि चेक धारक अपनी देनदारी के निर्वहन के वैकल्पिक तरीके के रूप में सिक्योरिटी चेक का उपयोग कर सकता है।”

धारा 139 एनआई एक्ट के तहत उपधारणा

कोर्ट ने इस बात पर प्रकाश डाला कि याचिकाकर्ता ने न तो चेक पर अपने हस्ताक्षर से इनकार किया है और न ही उनके जारी होने के तथ्य से। नतीजतन, एनआई एक्ट की धारा 139 के तहत उपधारणा (presumption) उत्पन्न होती है कि चेक किसी ऋण या दायित्व के निर्वहन के लिए जारी किए गए थे। कोर्ट ने कहा कि हालांकि याचिकाकर्ताओं को ट्रायल के दौरान इस उपधारणा का खंडन करने की स्वतंत्रता है, लेकिन इस स्तर पर सुविधा का संतुलन शिकायतकर्ता के पक्ष में है।

फैसला

हाईकोर्ट ने निष्कर्ष निकाला कि याचिकाकर्ताओं को तलब करने का मजिस्ट्रेट का आदेश इस “संभावित दृष्टिकोण” पर आधारित था कि चेक कानूनी रूप से लागू करने योग्य ऋण के निर्वहन में लिखे गए थे। कोर्ट को शिकायत या समनिंग आदेश को रद्द करने का कोई आधार नहीं मिला।

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याचिका को खारिज कर दिया गया और यह स्पष्ट किया गया कि आदेश में की गई टिप्पणियां ट्रायल के दौरान मामले के गुणों को प्रभावित नहीं करेंगी।

केस विवरण:

केस टाइटल: आरती त्रेहन और अन्य बनाम मेसर्स सुपर ऑयल्स

केस नंबर: CRM-M No.32093 of 2023

कोरम: जस्टिस मनीषा बत्रा 

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