धारा 127 CrPC: एकमुश्त राशि स्वीकार करने के बाद भी पत्नी भरण-पोषण बढ़ाने की हकदार; बॉम्बे हाईकोर्ट ने 5 साल की समय सीमा को स्पष्ट किया

बॉम्बे हाईकोर्ट (औरंगाबाद बेंच) ने एक महत्वपूर्ण निर्णय में कहा है कि पत्नी द्वारा पूर्व के आदेश के तहत एकमुश्त भरण-पोषण (Lump Sum Maintenance) स्वीकार कर लेने मात्र से वह भविष्य में भरण-पोषण राशि में बढ़ोत्तरी (Enhancement) की मांग करने से वंचित नहीं हो जाती। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि दंड प्रक्रिया संहिता (CrPC) की धारा 125 के तहत दी गई एकमुश्त राशि की वैधता एक बार में पांच वर्ष से अधिक नहीं होती है, जिसके बाद पत्नी पुनः राशि बढ़ाने का दावा कर सकती है।

जस्टिस अभय एस. वाघवासे की पीठ ने पति द्वारा दायर पुनरीक्षण याचिका (Revision Application) को खारिज करते हुए यह फैसला सुनाया। कोर्ट ने कहा कि संशोधित प्रावधानों के अनुसार, एकमुश्त भुगतान एक निर्दिष्ट अवधि को कवर करता है जो पांच साल से अधिक नहीं हो सकती, इसलिए पत्नी इसके बाद बढ़ोत्तरी की मांग करने की हकदार है।

मामले की पृष्ठभूमि

प्रतिवादी पत्नी ने शुरुआत में सीआरपीसी की धारा 125 के तहत भरण-पोषण के लिए याचिका दायर की थी। नांदेड़ की फैमिली कोर्ट ने 29 सितंबर 2020 को अपने फैसले में पति को निर्देश दिया था कि वह पत्नी को 2,000 रुपये प्रति माह भरण-पोषण दे, अथवा इसके बदले में 2,50,000 रुपये की एकमुश्त राशि का भुगतान करे। पति ने आदेश का पालन किया और पत्नी ने एकमुश्त राशि स्वीकार कर ली।

इसके बाद, वर्ष 2022 में पत्नी ने सीआरपीसी की धारा 127 के तहत एक नया आवेदन दायर कर भरण-पोषण राशि बढ़ाने की मांग की। उसका कहना था कि महंगाई और जीवन यापन की लागत में वृद्धि के कारण पूर्व में निर्धारित राशि अपर्याप्त है। उसने 15,000 रुपये की मांग की।

फैमिली कोर्ट ने 21 जुलाई 2025 को आंशिक रूप से आवेदन स्वीकार करते हुए भरण-पोषण राशि को 2,000 रुपये से बढ़ाकर 6,000 रुपये कर दिया। इस आदेश से असंतुष्ट होकर पति ने हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया।

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पक्षकारों की दलीलें

याचिकाकर्ता पति की ओर से पेश वकील आई. डी. मणियार ने तर्क दिया कि दोनों का विवाह 2001 में हुआ था, लेकिन संबंधों में खटास आने के कारण 2018 में तलाक हो गया था।

पति की मुख्य दलील यह थी कि चूंकि 2020 के आदेश में मासिक भुगतान या एकमुश्त भुगतान का विकल्प था और उसने 2.50 लाख रुपये की एकमुश्त राशि का भुगतान कर दिया है जिसे पत्नी ने स्वीकार भी कर लिया है, इसलिए अब वह धारा 127 के तहत नई कार्यवाही शुरू नहीं कर सकती। वकील ने जोर देकर कहा कि एकमुश्त भरण-पोषण देने के बाद पत्नी द्वारा दोबारा दावा करना अनुचित है।

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प्रतिवादी पत्नी इस पुनरीक्षण कार्यवाही में उपस्थित नहीं हुई।

हाईकोर्ट का विश्लेषण और टिप्पणियाँ

जस्टिस वाघवासे ने फैमिली कोर्ट के आदेश की कानूनी वैधता की जांच की। कोर्ट ने सीआरपीसी की धारा 125 के संशोधित प्रावधान (2A) का हवाला दिया, जो यह निर्धारित करता है कि मजिस्ट्रेट एकमुश्त भुगतान का आदेश दे सकता है।

प्रावधान का उल्लेख करते हुए कोर्ट ने पाया कि कानून स्पष्ट रूप से कहता है कि एकमुश्त भरण-पोषण आदेश “एक समय में पांच वर्ष से अधिक की अवधि” को कवर नहीं करता है, जब तक कि पार्टियों द्वारा आपसी सहमति से लंबी अवधि तय न की गई हो।

इस मामले के तथ्यों पर इसे लागू करते हुए, कोर्ट ने नोट किया कि 29 सितंबर 2020 को दी गई 2,50,000 रुपये की एकमुश्त राशि का “जीवनकाल” केवल पांच वर्षों के लिए यानी सितंबर 2025 तक ही वैध था।

जस्टिस वाघवासे ने अपनी टिप्पणी में कहा:

“यहाँ कोई आपसी समझौता नहीं हुआ है, हालाँकि भरण-पोषण बढ़ाते समय विद्वान फैमिली कोर्ट ने उपरोक्त प्रावधान को ध्यान में रखा है और यह माना कि पत्नी ने 2,50,000 रुपये के एकमुश्त भरण-पोषण का विकल्प चुना था और इसलिए, पांच साल की उक्त अवधि के मद्देनजर, वह वृद्धि के लिए अपने अनुरोध को नवीनीकृत करने की हकदार है।”

कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि तलाकशुदा पत्नी तब तक भरण-पोषण प्राप्त करने की हकदार है जब तक वह पुनर्विवाह नहीं कर लेती, बशर्ते उसके पास आजीविका के साधन न हों। याचिकाकर्ता यह साबित करने में विफल रहा कि पत्नी ने पुनर्विवाह कर लिया है।

निर्णय

हाईकोर्ट ने निष्कर्ष निकाला कि भरण-पोषण राशि बढ़ाने के फैमिली कोर्ट के निर्णय में कोई अवैधता या अनियमितता नहीं है। कोर्ट ने कहा कि कानूनन एकमुश्त भुगतान की सीमा समाप्त होने के बाद पत्नी बढ़ी हुई राशि की मांग कर सकती है।

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नतीजतन, कोर्ट ने पति की आपराधिक पुनरीक्षण याचिका को खारिज कर दिया।

मामले का विवरण:

  • केस टाइटल: शिवाजी पुत्र नागनाथ फुलारी बनाम सोनाली पत्नी शिवाजी फुलारी
  • केस नंबर: क्रिमिनल रिविजन एप्लीकेशन नंबर 351 ऑफ 2025
  • कोरम: जस्टिस अभय एस. वाघवासे

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