जम्मू-कश्मीर और लद्दाख हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण निर्णय में स्पष्ट किया है कि एक पब्लिक प्रॉसिक्यूटर (सरकारी वकील) के पास जांच एजेंसी के अनुरोध के बिना आरोपी की पुलिस रिमांड मांगने का कोई स्वतंत्र अधिकार नहीं है।
न्यायमूर्ति संजय परिहार की पीठ ने राज्य द्वारा दायर एक आपराधिक निगरानी याचिका (Criminal Revision Petition) को खारिज करते हुए यह टिप्पणी की। कोर्ट ने पाया कि संबंधित मामले में जांच एजेंसी ने न तो पूरक जांच (Supplementary Investigation) की मांग की थी और न ही उत्तरदाताओं (आरोपियों) की पुलिस हिरासत का अनुरोध किया था।
मामले की पृष्ठभूमि
यह मामला वर्ष 2005 में दर्ज एफआईआर संख्या 100/2005 से जुड़ा है, जो रणबीर दंड संहिता (RPC) की धारा 302 (हत्या), 307 (हत्या का प्रयास), 147, 148, 149, 323 और आर्म्स एक्ट की धारा 3/25 के तहत पंजीकृत की गई थी। पुलिस ने जांच पूरी कर “स्टेट ऑफ जेएंडके बनाम दिलबाग सिंह और अन्य” शीर्षक से एक चालान (चार्जशीट) ट्रायल कोर्ट के समक्ष पेश किया था।
वर्तमान याचिका में शामिल उत्तरदाता (धनवंत सिंह और अन्य) चालान में आरोपी थे, लेकिन वे फरार हो गए थे। इसके चलते उनके खिलाफ सीआरपीसी की धारा 512 के तहत कार्यवाही शुरू की गई थी। ट्रायल का सामना करने वाले सह-आरोपियों को ट्रायल कोर्ट ने 19 अगस्त, 2013 को बरी कर दिया था। राज्य ने इस बरी किए जाने के आदेश के खिलाफ अपील भी दायर की है जो खंडपीठ के समक्ष लंबित है।
सह-आरोपियों के बरी होने के बाद, फरार आरोपियों ने 25 जनवरी, 2014 को कोर्ट में सरेंडर कर दिया। इसके बाद, राज्य ने विशेष लोक अभियोजक (Special Public Prosecutor) के माध्यम से एक आवेदन दायर कर उनकी पुलिस रिमांड की मांग की। अभियोजन पक्ष का तर्क था कि पूरक चालान दायर करने से पहले अपराध में उनकी विशिष्ट भूमिका का पता लगाने के लिए हिरासत में पूछताछ आवश्यक थी।
सत्र न्यायाधीश, जम्मू ने 6 मार्च, 2014 को यह आवेदन खारिज कर दिया था, यह देखते हुए कि पुलिस द्वारा रिमांड के लिए कोई अनुरोध नहीं किया गया था। इसी आदेश के खिलाफ राज्य ने हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया था।
कोर्ट की टिप्पणियां और विश्लेषण
न्यायमूर्ति संजय परिहार ने रिकॉर्ड की जांच करते हुए कहा कि निगरानी याचिका 19 मार्च, 2014 को दायर की गई थी, लेकिन दस साल से अधिक समय तक याचिकाकर्ता द्वारा कोई तत्परता नहीं दिखाई गई।
हाईकोर्ट ने गौर किया कि ट्रायल कोर्ट द्वारा पुलिस हिरासत से इनकार किए जाने के बाद, आरोपियों ने सह-आरोपियों के ट्रायल के दौरान दर्ज किए गए सबूतों को स्वीकार कर लिया था। उन्हीं सबूतों के आधार पर सह-आरोपियों के बरी होने के मद्देनजर, इन उत्तरदाताओं को भी 19 मार्च, 2014 को बरी कर दिया गया था।
पब्लिक प्रॉसिक्यूटर के रिमांड मांगने के अधिकार के कानूनी प्रश्न पर, कोर्ट ने स्पष्ट रूप से कहा:
“रिकॉर्ड से पता चलता है कि जांच एजेंसी ने न तो पूरक जांच की मांग की थी और न ही उत्तरदाताओं की पुलिस हिरासत का अनुरोध किया था। इस तरह के अनुरोध के बिना, पब्लिक प्रॉसिक्यूटर के पास सीआरपीसी की धारा 167 के तहत पुलिस रिमांड मांगने का कोई स्वतंत्र अधिकार नहीं था।”
कोर्ट ने आगे कहा कि एक बार जब सभी आरोपियों के खिलाफ चार्जशीट दायर कर दी गई, तो इसका अर्थ यह था कि आगे की हिरासत में पूछताछ को आवश्यक नहीं माना गया था। इसलिए, निचली अदालत का आदेश कानून के अनुरूप था।
निर्णय
हाईकोर्ट ने निष्कर्ष निकाला कि 19 मार्च, 2014 को उत्तरदाताओं के बाद के बरी होने के साथ, 6 मार्च, 2014 का विवादित आदेश अंतिम निर्णय में विलीन हो गया था, जिससे यह निगरानी याचिका निष्प्रभावी हो गई। कोर्ट ने यह भी नोट किया कि ऐसा कोई रिकॉर्ड नहीं दिखाया गया कि 19 मार्च, 2014 के बरी किए जाने के आदेश को अलग से चुनौती दी गई थी या नहीं।
तदनुसार, कोर्ट ने याचिका खारिज कर दी।
केस का विवरण:
- केस का शीर्षक: स्टेट ऑफ जेएंडके बनाम धनवंत सिंह और अन्य
- केस नंबर: CRR No. 17/2014
- कोरम: न्यायमूर्ति संजय परिहार

