यदि आय देने वाली पैतृक संपत्ति मौजूद है, तो बाद में अर्जित संपत्ति ‘संयुक्त परिवार की संपत्ति’ मानी जाएगी: सुप्रीम कोर्ट

सुप्रीम कोर्ट ने दोराईराज बनाम दोराईसामी (मृत) जरिए एलआरएस व अन्य के मामले में दायर सिविल अपीलों को खारिज करते हुए मद्रास हाईकोर्ट के फैसले को बरकरार रखा है। जस्टिस संजय करोल और जस्टिस सतीश चंद्र शर्मा की पीठ ने स्पष्ट किया कि एक बार जब यह स्थापित हो जाता है कि परिवार के पास आय उत्पन्न करने वाली पैतृक संपत्ति थी, तो यह साबित करने का भार (Burden of Proof) उस सदस्य पर आ जाता है जो यह दावा कर रहा है कि बाद में खरीदी गई संपत्ति उसकी ‘स्व-अर्जित’ (Self-acquired) है।

सुप्रीम कोर्ट ने विभाजन की डिक्री को सही ठहराते हुए कहा कि संयुक्त परिवार के अस्तित्व के दौरान कर्ता (Karta) के नाम पर अर्जित संपत्तियों को आमतौर पर संयुक्त परिवार की संपत्ति माना जाता है, जब तक कि इसके विपरीत साबित न कर दिया जाए।

मामले की पृष्ठभूमि

यह मामला तिरुचिरापल्ली जिले के पेराम्बलूर तालुक में स्थित कृषि संपत्तियों के विभाजन और हस्तांतरण से जुड़े एक लंबे समय से चले आ रहे पारिवारिक विवाद से संबंधित है। विवाद में अचल संपत्ति की 79 वस्तुएं (Items) शामिल थीं।

यह विवाद एक पल्लीकूडाथन (Pallikoodathan) के परिवार से जुड़ा था, जो सामान्य पूर्वज थे। मामले के केंद्र में उनके पुत्र सेंगन थे, जो वादी (दुरईसामी) और अपीलकर्ता/प्रतिवादी संख्या 2 (दोराईराज) के पिता थे। वादी ने 1987 में विभाजन और अपने एक-चौथाई हिस्से के कब्जे के लिए मुकदमा (O.S. No. 99 of 1987) दायर किया था। उनका तर्क था कि ये संपत्तियां संयुक्त हिंदू परिवार की संपत्ति थीं, जो पैतृक संपत्तियों से होने वाली आय से खरीदी गई थीं। वादी ने दावा किया कि परिवार निवास, खेती और प्रबंधन में संयुक्त था और सेंगन परिवार के ‘कर्ता’ के रूप में कार्य करते थे।

मुकदमे के लंबित रहने के दौरान 27 नवंबर, 1989 को सेंगन की मृत्यु हो गई। विवाद का एक मुख्य बिंदु 24 नवंबर, 1989 की एक अपंजीकृत वसीयत (Unregistered Will) थी, जिसे उनकी मृत्यु से मात्र तीन दिन पहले कथित तौर पर निष्पादित किया गया था।

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ट्रायल कोर्ट ने 1992 में वादी के पक्ष में फैसला सुनाया। इसके बाद प्रथम अपीलीय अदालत ने 1995 में वादी के हिस्से को संशोधित कर 5/16 कर दिया। अंततः, मद्रास हाईकोर्ट ने 12 अगस्त, 2009 के अपने फैसले में कुछ विशिष्ट संपत्तियों (आइटम नंबर 74, 66 और आइटम नंबर 36 का एक हिस्सा) को विभाजन से बाहर कर दिया, क्योंकि वे तीसरे पक्ष से खरीदी गई थीं, लेकिन शेष विभाजन को बरकरार रखा।

सुप्रीम कोर्ट के समक्ष दलीलें

अपीलकर्ता का पक्ष: अपीलकर्ता (दोराईराज) की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता ने तर्क दिया कि निचली अदालतों ने सभी संपत्तियों को संयुक्त परिवार की संपत्ति मानकर गलती की है। उनका कहना था कि वादी यह साबित करने में विफल रहे कि परिवार के पास कोई ऐसा “आय-उत्पन्न करने वाला संयुक्त परिवार का केंद्र” (Nucleus) था जो बाद की खरीदे गए संपत्तियों को वित्तपोषित करने में सक्षम हो।

अपीलकर्ता ने दावा किया कि पिता सेंगन के पास सरकारी सेवा, साहूकारी और ठेकेदारी से पर्याप्त स्वतंत्र आय थी। इसके अलावा, अपीलकर्ता ने तर्क दिया कि 1960 के दशक के मध्य से ठेकेदार के रूप में उनकी अपनी स्वतंत्र आय थी, जिससे उन्होंने अपने नाम पर संपत्तियां खरीदीं। उन्होंने वसीयत की वैधता का भी बचाव किया।

प्रतिवादी का पक्ष: प्रतिवादी ने तर्क दिया कि विशिष्ट संपत्तियों (आइटम नंबर 14 और 15) की पैतृक प्रकृति स्वीकार्य तथ्य है। उनका कहना था कि चूंकि यह दिखाया गया है कि संयुक्त परिवार के दौरान पैतृक संपत्तियों से आय होती थी, इसलिए यह साबित करने की जिम्मेदारी अपीलकर्ता पर थी कि नई संपत्तियां स्व-अर्जित थीं, जिसे वे साबित करने में विफल रहे। उन्होंने वसीयत की वैधता को भी चुनौती दी।

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कोर्ट का विश्लेषण और टिप्पणियां

फैसला लिखते हुए जस्टिस सतीश चंद्र शर्मा ने कहा कि हाईकोर्ट ने दलीलों और हिंदू कानून के सिद्धांतों का सही मूल्यांकन किया है।

संयुक्त परिवार की संपत्ति और सबूत का भार: सुप्रीम कोर्ट ने पट्टुसामी पदयाची और श्रीनिवास कृष्णराव कांगो मामलों के फैसलों का हवाला दिया। कोर्ट ने नोट किया कि आइटम नंबर 14 और 15 को निर्विवाद रूप से पैतृक संपत्ति माना गया था। राजस्व रिकॉर्ड (Adangal extracts) से यह स्पष्ट था कि इन जमीनों पर लगातार खेती होती थी और वहां कुएं व पंप सेट मौजूद थे, जिससे आय होती थी।

सुप्रीम कोर्ट ने महत्वपूर्ण टिप्पणी की:

“जहां संयुक्त परिवार के अस्तित्व के दौरान अधिग्रहण किया जाता है, और जहां आय देने वाली पैतृक संपत्तियों का अस्तित्व दिखाया जाता है, वहां कर्ता के नाम पर अर्जित संपत्तियों को आमतौर पर संयुक्त परिवार की संपत्ति माना जाता है, जब तक कि इसके विपरीत साबित न हो जाए।”

स्वतंत्र आय का तर्क: कोर्ट ने स्वीकार किया कि सेंगन की कुछ स्वतंत्र कमाई थी, लेकिन स्पष्ट किया कि केवल “कुछ स्वतंत्र कमाई का अस्तित्व अपने आप में संयुक्त परिवार की आय के योगदान को नकारता नहीं है।” अपीलकर्ता (D2) के इस दावे को भी कोर्ट ने खारिज कर दिया कि उन्होंने छात्र रहते हुए इतनी बचत कर ली थी कि संपत्ति खरीद सकें।

वसीयत पर संदेह: सुप्रीम कोर्ट ने वसीयत (Ex. B-200) को खारिज करने के हाईकोर्ट के निर्णय को सही ठहराया। कोर्ट ने वसीयत के आसपास की संदिग्ध परिस्थितियों पर प्रकाश डाला:

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“वसीयतकर्ता आमतौर पर दस्तावेजों पर हस्ताक्षर करते थे, लेकिन इस दस्तावेज पर केवल अंगूठे का निशान लगाया गया; वसीयत कथित तौर पर मृत्यु से बमुश्किल 72 घंटे पहले निष्पादित की गई थी; इसे पेशेवर लेखक के बजाय एक करीबी रिश्तेदार द्वारा लिखा गया था; और चुनाव ड्यूटी के कारण लेखक की उपस्थिति भी संदिग्ध थी।”

निर्णय

सुप्रीम कोर्ट ने निष्कर्ष निकाला कि हाईकोर्ट का फैसला तर्कसंगत है और रिकॉर्ड पर मौजूद सामग्री पर आधारित है। कोर्ट ने कहा कि हाईकोर्ट ने संयम और सटीकता के साथ उन विशिष्ट संपत्तियों को विभाजन से बाहर रखा जिन्हें तीसरे पक्ष से स्वतंत्र रूप से खरीदा गया था।

तदनुसार, सुप्रीम कोर्ट ने अपीलों को खारिज कर दिया और विभाजन की डिक्री को बरकरार रखा।

केस विवरण:

केस टाइटल: दोराईराज बनाम दोराईसामी (मृत) जरिए एलआरएस व अन्य

केस नंबर: सिविल अपील संख्या 2129-2130 ऑफ 2012

कोरम: जस्टिस संजय करोल और जस्टिस सतीश चंद्र शर्मा

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