सुप्रीम कोर्ट ने गुरुवार को पूर्व बीसीसीआई अध्यक्ष और बीजेपी सांसद अनुराग ठाकुर को बड़ी राहत देते हुए उन्हें क्रिकेट बोर्ड के मामलों में भाग लेने की अनुमति दे दी है। न्यायालय ने अपने 2017 के आदेश को संशोधित करते हुए यह स्पष्ट किया कि ठाकुर अब बीसीसीआई के कार्यों में नियमों और विनियमों के अनुसार हिस्सा ले सकते हैं।
मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत और न्यायमूर्ति जॉयमाल्य बागची की पीठ ने अनुराग ठाकुर की ओर से दायर उस याचिका पर यह आदेश दिया जिसमें उन्होंने 2017 के निर्देश को संशोधित करने की मांग की थी। कोर्ट ने अपने आदेश में “अनुपातिकता के सिद्धांत” (doctrine of proportionality) को लागू करते हुए माना कि ठाकुर पहले ही बिना शर्त माफी मांग चुके हैं।
2 जनवरी 2017 को सुप्रीम कोर्ट ने ठाकुर को बीसीसीआई के मामलों से खुद को दूर रखने (“cease and desist”) का आदेश दिया था। साथ ही उन पर अदालत की अवमानना और झूठा हलफनामा दाखिल करने का आरोप लगाते हुए कार्यवाही भी शुरू की गई थी। यह मामला उस पत्र से जुड़ा था जो ठाकुर ने कथित रूप से उस समय के आईसीसी अध्यक्ष शशांक मनोहर को बीसीसीआई की ‘स्वायत्तता’ को लेकर लिखा था।
बाद में, 14 जुलाई 2017 को ठाकुर ने व्यक्तिगत रूप से अदालत में पेश होकर बिना शर्त और स्पष्ट रूप से माफी मांगी थी, जिसके बाद सुप्रीम कोर्ट ने उनके खिलाफ सभी अवमानना और झूठे हलफनामे की कार्यवाहियां समाप्त कर दी थीं।
गुरुवार को सुप्रीम कोर्ट ने माना कि अब अनुराग ठाकुर को बीसीसीआई से जुड़े कार्यों में भाग लेने से रोकने का कोई औचित्य नहीं है। अदालत ने कहा कि वे बोर्ड के नियमों के अनुसार अब इसकी गतिविधियों में शामिल हो सकते हैं।
पीठ ने कहा, “ऐसे मामलों में अनुपातिकता के सिद्धांत को लागू किया जाना चाहिए।”
इस आदेश के साथ ही अनुराग ठाकुर पर पिछले कई वर्षों से लगे उस प्रतिबंध का औपचारिक रूप से अंत हो गया है, जो उन्हें देश की शीर्ष क्रिकेट संस्था बीसीसीआई की कार्यप्रणाली से अलग रखे हुए था।

