केवल ‘एडल्टरी’ के आरोपों पर पत्नी का अंतरिम गुजारा भत्ता नहीं रोका जा सकता; आरोप साबित होने पर ब्याज सहित पैसा लौटाना होगा: दिल्ली हाईकोर्ट

दिल्ली हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसले में स्पष्ट किया है कि घरेलू हिंसा से महिलाओं का संरक्षण अधिनियम, 2005 (PWDV Act) के तहत अंतरिम गुजारा भत्ता तय करते समय, केवल पति द्वारा लगाए गए “एडल्टरी (जारकर्म)” के आरोपों के आधार पर पत्नी को राहत देने से इनकार नहीं किया जा सकता, जब तक कि ये आरोप साबित न हो जाएं।

जस्टिस स्वर्ण कांता शर्मा की पीठ ने पति द्वारा दायर पुनरीक्षण याचिका (रिविजन पिटीशन) को खारिज कर दिया, जिसमें पत्नी को दिए गए अंतरिम भत्ते को चुनौती दी गई थी। हालांकि, कोर्ट ने एक महत्वपूर्ण शर्त भी जोड़ी है: यदि ट्रायल के बाद यह साबित हो जाता है कि पत्नी एडल्टरी में रह रही थी और गुजारा भत्ते की हकदार नहीं है, तो उसे प्राप्त हुई पूरी राशि 6% ब्याज के साथ पति को वापस करनी होगी।

मामले की पृष्ठभूमि

याचिकाकर्ता (पति) और प्रतिवादी (पत्नी) का विवाह 26 सितंबर, 2014 को हुआ था। वैवाहिक विवादों के चलते पत्नी ने ससुराल छोड़ दिया और घरेलू हिंसा अधिनियम की धारा 12 के तहत आवेदन दायर किया। पत्नी ने पति पर यौन, मौखिक, भावनात्मक और आर्थिक उत्पीड़न के साथ-साथ दहेज की मांग का आरोप लगाया।

महिला कोर्ट की विद्वान मेट्रोपोलिटन मजिस्ट्रेट ने 22 अक्टूबर, 2021 को पत्नी के अंतरिम राहत के आवेदन को स्वीकार करते हुए पति को 26,000 रुपये प्रति माह का भुगतान करने का निर्देश दिया। पति ने इस आदेश को सत्र न्यायालय (Sessions Court) में चुनौती दी, लेकिन 31 अक्टूबर, 2023 को उसकी अपील खारिज कर दी गई। इसके बाद, पति ने हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया।

पक्षों की दलीलें

पति के वकील ने तर्क दिया कि पत्नी घरेलू हिंसा अधिनियम की धारा 2(a) के तहत “पीड़ित व्यक्ति” नहीं मानी जा सकती, क्योंकि वह विवाह के दौरान किसी अन्य व्यक्ति के साथ “एडल्टरी” में रह रही है। पति ने अपनी दलील के समर्थन में कुछ तस्वीरें भी पेश कीं, जिनमें पत्नी को कथित तौर पर आपत्तिजनक स्थिति में दिखाया गया था। इसके अलावा, पति ने अपनी आय के आकलन को भी चुनौती दी और दावा किया कि वह केवल एक कमीशन एजेंट है और उसकी आय 25,000 रुपये प्रति माह है, जबकि निचली अदालतों ने उसकी आय 79,000 रुपये आंकी थी।

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दूसरी ओर, पत्नी के वकील ने तर्क दिया कि उसे गंभीर घरेलू हिंसा का सामना करना पड़ा है और पति उसका चरित्र हनन कर रहा है। एडल्टरी के आरोपों पर पत्नी ने कहा कि पेश की गई तस्वीरें मॉर्फ्ड (छेड़छाड़ की हुई) और फर्जी हैं। पत्नी का कहना था कि इस तरह के विवादित तथ्यों का फैसला अंतरिम चरण में नहीं किया जा सकता। पत्नी ने यह भी आरोप लगाया कि पति स्वयं विवाहेतर संबंधों में लिप्त है।

हाईकोर्ट का विश्लेषण और टिप्पणियाँ

अंतरिम चरण पर एडल्टरी के आरोप

हाईकोर्ट ने पाया कि जहां पति तस्वीरों के आधार पर एडल्टरी का आरोप लगा रहा है, वहीं पत्नी ने उन्हें फर्जी बताया है। पीठ ने कहा कि यह साक्ष्य का विषय है जिसे ट्रायल के दौरान साबित किया जाना बाकी है।

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जस्टिस शर्मा ने टिप्पणी की:

“अंतरिम आदेश पारित करते समय, न्यायालय को केवल रिकॉर्ड पर मौजूद सामग्री के आधार पर प्रथम दृष्टया विचार करना होता है… इसलिए, इस चरण पर, यह न्यायालय केवल इस आधार पर अंतरिम भत्ते के आदेश में हस्तक्षेप करने का इच्छुक नहीं है कि पति ने पत्नी पर एडल्टरी में रहने का आरोप लगाया है।”

कोर्ट ने घरेलू हिंसा अधिनियम और दंड प्रक्रिया संहिता (CrPC) के बीच अंतर स्पष्ट किया। जहां CrPC की धारा 125(4) स्पष्ट रूप से एडल्टरी में रहने वाली पत्नी को गुजारा भत्ता पाने से रोकती है, वहीं कोर्ट ने कहा:

“गौरतलब है कि CrPC की धारा 125(4) के विपरीत, PWDV अधिनियम के तहत ऐसा कोई स्पष्ट वैधानिक प्रतिबंध नहीं है जो किसी महिला को केवल इस आरोप पर राहत मांगने से रोकता हो कि वह एडल्टरी में रह रही है।”

हालांकि, कोर्ट ने स्पष्ट किया कि अंतिम निर्णय लेते समय पत्नी के आचरण सहित समग्र तथ्यों पर विचार किया जाएगा।

आय का आकलन

पति की वित्तीय क्षमता के संबंध में, हाईकोर्ट ने निचली अदालतों के आकलन को सही ठहराया। कोर्ट ने नोट किया कि पति के बैंक स्टेटमेंट में तीन वर्षों में कुल 28,45,120 रुपये की क्रेडिट प्रविष्टियां दिखाई दीं। कोर्ट ने पति की इस दलील को खारिज कर दिया कि यह पैसा पीपीएफ और एफडी की परिपक्वता राशि थी। कोर्ट ने कहा कि क्या ये प्रविष्टियां आय से संबंधित हैं या नहीं, यह ट्रायल के दौरान विस्तार से जांचा जा सकता है।

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निर्णय और निर्देश

हाईकोर्ट ने पति की याचिका को खारिज करते हुए 26,000 रुपये प्रति माह के अंतरिम गुजारा भत्ते को बरकरार रखा।

हालांकि, न्याय का संतुलन बनाए रखने के लिए, कोर्ट ने निम्नलिखित निर्देश जारी किए:

  1. त्वरित ट्रायल: मजिस्ट्रेट को निर्देश दिया गया कि वह धारा 12 की याचिका का निपटारा प्राथमिकता के आधार पर, अधिमानतः एक वर्ष के भीतर करें।
  2. रिफंड की शर्त: यदि ट्रायल कोर्ट अंततः इस निष्कर्ष पर पहुंचता है कि पत्नी एडल्टरी में रहने के कारण गुजारा भत्ते की हकदार नहीं है, तो वह पति को प्राप्त पूरी अंतरिम भत्ते की राशि 6% प्रति वर्ष की दर से ब्याज सहित वापस करने के लिए उत्तरदायी होगी।
  3. हलफनामा: पत्नी को ट्रायल कोर्ट के समक्ष एक हलफनामा दायर करना होगा, जिसमें वह यह वचन देगी कि यदि वह एडल्टरी के आधार पर भत्ते के लिए अयोग्य पाई जाती है, तो वह ब्याज सहित राशि वापस कर देगी।

केस का विवरण:

  • केस टाइटल: अतीत जैन बनाम छवि जैन
  • केस नंबर: CRL.REV.P. 335/2024
  • कोरम: जस्टिस स्वर्ण कांता शर्मा

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