“वकील का आचरण शर्मनाक”: रेप पीड़िता को ‘चरित्रहीन’ बताने पर इलाहाबाद हाईकोर्ट ने लगाई क्लास, कहा- यह गरिमा के खिलाफ

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने दुष्कर्म (Rape) के एक मामले में आरोपी की अपील खारिज करते हुए उसके वकील को कड़ी फटकार लगाई है। कोर्ट ने कहा कि पीड़िता को ‘आसान चरित्र’ (Easy Virtue) की महिला बताना और उसके चरित्र पर कीचड़ उछालना न केवल कानूनन गलत है, बल्कि एक वकील के लिए ‘पूरी तरह से अनुचित’ (Wholly Unbecoming) आचरण है।

न्यायमूर्ति अनिल कुमार-X की पीठ ने बेचन प्रसाद बनाम उत्तर प्रदेश राज्य के मामले में स्पष्ट किया कि किसी महिला के अतीत या चरित्र का हवाला देकर उसे बदनाम करना भारतीय साक्ष्य अधिनियम (Indian Evidence Act) और संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत निजता के अधिकार का उल्लंघन है।

मामले की पृष्ठभूमि

यह मामला सिद्धार्थ नगर जिले के बांसी पुलिस स्टेशन में दर्ज केस क्राइम नंबर 132/2022 से जुड़ा है। पीड़िता ने 28 मई 2022 को एफआईआर दर्ज कराई थी। आरोपों के मुताबिक, वह इलाज के लिए आरोपी (अपीलकर्ता) के क्लिनिक गई थी, जहाँ उसे इलाज के बहाने नशीली दवा दी गई और बेहोशी की हालत में उसके साथ दुष्कर्म किया गया। पीड़िता का आरोप था कि होश में आने पर उसने अपने कपड़े अस्त-व्यस्त पाए और इस घटना के कारण वह गर्भवती हो गई।

पुलिस ने जाँच के बाद आरोपी के खिलाफ आईपीसी की धारा 376 और एससी/एसटी एक्ट की धारा 3(2)(v) के तहत चार्जशीट दाखिल की थी। विशेष न्यायाधीश (SC/ST एक्ट) द्वारा 10 नवंबर 2022 को लिए गए संज्ञान (Cognizance Order) और चार्जशीट को चुनौती देते हुए आरोपी ने हाईकोर्ट में अपील दायर की थी।

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दलीलें: ‘ब्लैकमेलर’ और ‘चरित्रहीन’ साबित करने की कोशिश

अपीलकर्ता के वकीलों, अविनाश चंद्र श्रीवास्तव और संजय कुमार मिश्रा ने कोर्ट में दलील दी कि पीड़िता “ब्लैकमेल करने की आदी” है। उन्होंने अपने दावे के समर्थन में पाँच लोगों (मुखलाल, रामावतार, संतराम, रुझान और भागीरथी) के शपथ पत्रों का हवाला दिया। इन शपथ पत्रों के आधार पर वकीलों ने तर्क दिया कि पीड़िता ‘आसान चरित्र’ की महिला है और लोगों को झूठे मुकदमों में फंसाने की धमकी देकर पैसे ऐंठती है।

बचाव पक्ष ने यह भी तर्क दिया कि एफआईआर 9 महीने की देरी से दर्ज की गई और घटना का असली कारण यह था कि आरोपी ने गर्भपात की गोलियां देने से इनकार कर दिया था। इसके अलावा, आरोपी ने ‘एलिबी’ (घटना के समय दूसरी जगह उपस्थिति) का बचाव लेते हुए अपनी उपस्थिति पंजिका (Attendance Sheet) प्रस्तुत की, जिसमें दावा किया गया कि वह बहराइच के एक अस्पताल में फार्मासिस्ट के पद पर तैनात था।

कोर्ट की तल्ख टिप्पणी और फैसला

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हाईकोर्ट ने बचाव पक्ष की दलीलों और वकील के आचरण पर कड़ी नाराजगी जताई। कोर्ट ने कहा कि केस डायरी का हिस्सा न होने के बावजूद बाहरी शपथ पत्रों पर भरोसा करना और पीड़िता के चरित्र पर हमला करना अस्वीकार्य है।

न्यायमूर्ति अनिल कुमार-X ने अपने फैसले में कहा:

“किसी महिला को ‘आसान चरित्र’ का बताकर उसे चित्रित करने या उसके नैतिक चरित्र पर लांछन लगाने का कोई भी प्रयास पूरी तरह से अप्रासंगिक है और भारतीय साक्ष्य अधिनियम, 1872 की धारा 53A और धारा 146 के प्रावधानों के तहत स्पष्ट रूप से वर्जित है। ये आरोप चरित्र हनन (Character Assassination) के समान हैं। ऐसे आरोप भारत के संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत महिला के गरिमा और निजता के अधिकार का उल्लंघन करते हैं और कानून की प्रक्रिया का दुरुपयोग हैं।”

कोर्ट ने आदेश दिया कि पीड़िता के चरित्र के खिलाफ दी गई दलीलों और शपथ पत्रों को रिकॉर्ड से हटाया जाए और उन पर कोई विचार न किया जाए।

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वकील को चेतावनी

सुनवाई के दौरान वकील द्वारा यह कहे जाने पर कि “आदेश को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी जाएगी”, हाईकोर्ट ने इसे अदालत पर दबाव बनाने (Browbeat) की कोशिश करार दिया। कोर्ट ने कहा:

“यह कोर्ट अपीलकर्ता के विद्वान वकील के आचरण की निंदा करती है, जिन्होंने एक महिला के चरित्र और गरिमा पर सवाल उठाने वाले निंदनीय आरोपों वाले हलफनामों पर भरोसा करने की अनुचित और अस्वीकार्य प्रथा अपनाई है। ऐसी दलीलें एक वकील के लिए पूरी तरह से अनुचित हैं और नैतिक वकालत की नींव पर प्रहार करती हैं।”

कोर्ट ने देरी से एफआईआर दर्ज कराने के मुद्दे पर कहा कि यौन अपराधों के मामलों में देरी का मूल्यांकन संज्ञान के चरण पर नहीं, बल्कि ट्रायल के दौरान किया जाना चाहिए। हाईकोर्ट ने अपील को योग्यताहीन मानते हुए खारिज कर दिया और ट्रायल कोर्ट को कानून के अनुसार कार्यवाही आगे बढ़ाने का निर्देश दिया।

केस विवरण:

  • केस टाइटल: बेचन प्रसाद बनाम उत्तर प्रदेश राज्य और अन्य
  • केस नंबर: क्रिमिनल अपील संख्या 9287 ऑफ 2022
  • कोरम: न्यायमूर्ति अनिल कुमार-X

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