सुप्रीम कोर्ट ने बुधवार को केंद्र सरकार से पूछा कि क्या जलवायु कार्यकर्ता सोनम वांगचुक की गिरती सेहत को देखते हुए उनकी राष्ट्रीय सुरक्षा कानून (NSA) के तहत हुई हिरासत पर पुनर्विचार किया जा सकता है।
न्यायमूर्ति अरविंद कुमार और न्यायमूर्ति पी बी वराले की पीठ ने यह टिप्पणी वांगचुक की पत्नी गीतेांजली जे अंगमो द्वारा दायर याचिका पर सुनवाई करते हुए की। यह याचिका उनकी एनएसए के तहत हुई गिरफ्तारी को चुनौती देती है। वांगचुक वर्तमान में जोधपुर सेंट्रल जेल में बंद हैं और उन्हें 26 सितंबर 2025 को गिरफ्तार किया गया था।
“कानूनी दलीलों से इतर, एक अधिकारी के रूप में ज़रा विचार कीजिए। हिरासत का आदेश 26 सितंबर को पारित हुआ था, यानी लगभग पांच महीने हो चुके हैं। उनकी स्वास्थ्य रिपोर्ट ठीक नहीं है… कुछ आयु से जुड़ी समस्याएं हैं या और भी हो सकती हैं। क्या सरकार के लिए पुनर्विचार या पुनरावलोकन संभव है?” — पीठ ने मौखिक टिप्पणी की।
एडिशनल सॉलिसिटर जनरल (ASG) के एम नटराज ने जवाब दिया कि वह यह सुझाव संबंधित अधिकारियों तक पहुंचाएंगे।
सुनवाई के दौरान नटराज ने तर्क दिया कि वांगचुक की भड़काऊ बातों के कारण लद्दाख के लेह में पिछले साल जो हिंसक प्रदर्शन हुए, उसमें चार लोगों की मौत और 161 लोग घायल हुए थे। उन्होंने कहा कि भले ही वांगचुक सीधे हिंसा में शामिल नहीं थे, लेकिन उनकी बातों से भीड़ को भड़काने की प्रवृत्ति पर्याप्त है।
उन्होंने बताया कि 3 अक्टूबर 2025 को हिरासत आदेश की पुष्टि की गई थी और उस पुष्टि आदेश को चुनौती नहीं दी गई है।
इससे पहले सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने अदालत को बताया था कि वांगचुक ने ‘जेनरेशन Z’ को नेपाल और बांग्लादेश जैसे आंदोलनों के लिए उकसाने की कोशिश की थी और ‘अरब स्प्रिंग’ जैसे आंदोलनों का भी ज़िक्र किया था, जिससे कई सरकारें गिर गई थीं।
मेहता ने कहा कि वांगचुक की गिरफ्तारी एनएसए के तहत सभी वैधानिक प्रक्रियाओं का पालन करते हुए की गई है। यह कानून केंद्र और राज्यों को ऐसे व्यक्तियों को अधिकतम 12 महीने तक हिरासत में रखने की अनुमति देता है, जो देश की रक्षा के लिए खतरा माने जाएं।
वरिष्ठ अधिवक्ता कपिल सिब्बल, जो याचिकाकर्ता अंगमो की ओर से पेश हुए, ने दलील दी कि वांगचुक की गिरफ्तारी गलत तथ्यों, “उधार लिए गए सामग्री” और कुछ चुनिंदा वीडियो के आधार पर की गई है ताकि उन्हें गलत तरीके से दोषी ठहराया जा सके।
याचिका में कहा गया कि वांगचुक ने पिछले तीन दशकों में शिक्षा, नवाचार और पर्यावरण संरक्षण के क्षेत्र में राज्य, राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर योगदान दिया है और हिंसा से उनका कोई लेना-देना नहीं है।
वांगचुक ने खुद सोशल मीडिया पर 24 सितंबर की हिंसा की कड़ी निंदा की थी और इसे लद्दाख की शांतिपूर्ण “तपस्या” के लिए सबसे दुखद दिन बताया था।
याचिका में गिरफ्तारी को मौलिक अधिकारों का उल्लंघन और एक मनमानी कार्रवाई करार दिया गया है।
पीठ के समक्ष दलीलें बुधवार को पूरी नहीं हो सकीं और अब गुरुवार को सुनवाई जारी रहेगी। सुप्रीम कोर्ट की यह टिप्पणी कि वांगचुक की तबीयत ठीक नहीं है और सरकार को इस पर पुनर्विचार करना चाहिए, उनकी गिरफ्तारी पर नए सिरे से बहस को जन्म दे सकती है।

