इलाहाबाद हाईकोर्ट: सेवानिवृत्ति से पहले किए गए नियमितीकरण के दावे को केवल सेवानिवृत्त होने के आधार पर खारिज नहीं किया जा सकता; डीएम उन्नाव का आदेश रद्द

इलाहाबाद हाईकोर्ट (लखनऊ बेंच) ने एक महत्वपूर्ण निर्णय में स्पष्ट किया है कि यदि किसी कर्मचारी ने अपनी सेवानिवृत्ति (Superannuation) से पहले नियमितीकरण का दावा किया है, तो उसे केवल इस आधार पर खारिज नहीं किया जा सकता कि कर्मचारी अब सेवानिवृत्त हो चुका है।

जस्टिस श्री प्रकाश सिंह की पीठ ने जिला मजिस्ट्रेट, उन्नाव द्वारा 17 दिसंबर 2024 को पारित उस आदेश को रद्द कर दिया, जिसके तहत एक सीजनल कलेक्शन अमीन के नियमितीकरण के दावे को खारिज कर दिया गया था। कोर्ट ने कहा कि इस तरह की अस्वीकृति कर्मचारी के सेवानिवृत्ति के बाद मिलने वाले लाभों (Post-terminal benefits) को प्रभावित करती है और यह कानून की दृष्टि में सही नहीं है।

मामले की पृष्ठभूमि

याची भानु शंकर द्विवेदी ने जिला मजिस्ट्रेट, उन्नाव के आदेश को चुनौती देते हुए हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया था। द्विवेदी को शुरुआत में 2 फरवरी 1989 को सीजनल कलेक्शन अमीन के पद पर नियुक्त किया गया था। उन्होंने अपनी अधिवर्षता आयु (Superannuation) यानी 30 सितंबर 2024 तक लगातार सेवा की।

सेवानिवृत्ति के बाद, जिला मजिस्ट्रेट ने उनके नियमितीकरण के दावे पर विचार किया, लेकिन 17 दिसंबर 2024 के आदेश के जरिए इसे खारिज कर दिया। अस्वीकृति का एकमात्र आधार यह बनाया गया कि चूंकि याची 30 सितंबर 2024 को सेवानिवृत्त हो चुके हैं, इसलिए अब वे नियमितीकरण के हकदार नहीं हैं। इस निर्णय से व्यथित होकर द्विवेदी ने रिट-ए संख्या 166 वर्ष 2025 दायर की।

पक्षों की दलीलें

याची के अधिवक्ता पीयूष पाठक और वीरेंद्र सिंह यादव ने तर्क दिया कि याची ने दशकों तक विभाग की सेवा की है। उन्होंने कहा कि उसी विभाग में समान रूप से स्थित अन्य कर्मचारियों को नियमितीकरण का लाभ दिया गया है।

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अधिवक्ताओं ने कोर्ट का ध्यान विभाग के ही एक अन्य कर्मचारी, नंद किशोर के मामले की ओर आकर्षित किया, जो याची से वरिष्ठ थे और जिनकी सेवाकाल के दौरान मृत्यु हो गई थी। यह बताया गया कि हाईकोर्ट द्वारा रिट-ए संख्या 6865 वर्ष 2013 में 23 मई 2024 को दिए गए फैसले के बाद, स्वर्गीय नंद किशोर की सेवाओं को नियमित माना गया और उनके बेटे को मृतक आश्रित कोटे (Dying-in-Harness Rules) के तहत नियुक्ति के लिए विचार किया गया।

याची ने तर्क दिया कि “यदि नियम और कानून अनुमति देते हैं, तो कर्मचारी की सेवानिवृत्ति उसके नियमितीकरण के दावे को शून्य नहीं कर देती है।” यह भी कहा गया कि वरिष्ठता सूची में याची का नाम क्रम संख्या 90 पर है और उनके दावे को पद की अनुपलब्धता के कारण नहीं, बल्कि केवल उनकी सेवानिवृत्ति के कारण खारिज किया गया है।

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इसके विपरीत, राज्य की ओर से पेश हुए मुख्य स्थायी अधिवक्ता (C.S.C.) ने याचिका का विरोध करते हुए कहा कि याची से कनिष्ठ (Junior) किसी भी कर्मचारी को नियमित नहीं किया गया है। राज्य का तर्क था कि जिला मजिस्ट्रेट ने दावे पर विचार करने के बाद एक “विस्तृत आदेश” पारित किया है, इसलिए इसमें कोई त्रुटि नहीं है।

कोर्ट का विश्लेषण और अवलोकन

जस्टिस श्री प्रकाश सिंह ने रिकॉर्ड का अवलोकन किया और पाया कि वरिष्ठता सूची में याची का नाम वास्तव में क्रम संख्या 90 पर दर्ज है। कोर्ट ने नोट किया कि नियुक्ति प्राधिकारी (जिला मजिस्ट्रेट) ने दावे को केवल इसी आधार पर खारिज किया है कि याची सेवानिवृत्त हो चुके हैं।

कोर्ट ने पाया कि आक्षेपित आदेश “कानून के प्रावधानों और स्थापित कानूनी सिद्धांतों पर विचार किए बिना” पारित किया गया था।

जस्टिस सिंह ने अपने आदेश में कहा:

“नियमितीकरण के लिए याची का दावा, जो सेवानिवृत्ति से पहले उठाया गया था, केवल इस आधार पर खारिज नहीं किया जा सकता कि याची सेवानिवृत्त हो गया है, क्योंकि इसका सीधा प्रभाव याची के सेवानिवृत्ति पश्चात लाभों (Post terminal benefits) और अन्य लाभों पर पड़ेगा।”

पीठ ने जिला मजिस्ट्रेट के आदेश को “त्रुटिपूर्ण” और “बिना विवेक का प्रयोग किए पारित किया गया” माना।

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निर्णय

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने रिट याचिका स्वीकार करते हुए 17 दिसंबर 2024 के आक्षेपित आदेश को रद्द कर दिया।

मामले को पुनः जिला मजिस्ट्रेट, उन्नाव के पास वापस भेज दिया गया है। कोर्ट ने निर्देश दिया है कि आदेश की प्रमाणित प्रति प्राप्त होने की तारीख से छह सप्ताह के भीतर याची के दावे पर नए सिरे से विचार कर निर्णय लिया जाए।

केस का विवरण:

  • केस शीर्षक: भानु शंकर द्विवेदी बनाम उत्तर प्रदेश राज्य (द्वारा प्रमुख सचिव राजस्व, लखनऊ) व 3 अन्य
  • केस नंबर: रिट – ए संख्या 166 वर्ष 2025
  • कोरम: जस्टिस श्री प्रकाश सिंह
  • याची के वकील: पीयूष पाठक, वीरेंद्र सिंह यादव
  • प्रतिवादी के वकील: सी.एस.सी. (मुख्य स्थायी अधिवक्ता)

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