पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसले में स्पष्ट किया है कि पति-पत्नी के बीच चल रहे मुकदमों की आड़ में किसी को कानून हाथ में लेने का अधिकार नहीं मिल जाता। जस्टिस सूर्य प्रताप सिंह की पीठ ने कहा कि भले ही वैवाहिक विवाद चल रहा हो, लेकिन यह किसी को जबरन दूसरे के घर में घुसने और वहां मौजूद लोगों के साथ मारपीट करने की अनुमति नहीं देता।
कोर्ट ने भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा 452, 500, 506, 509 और 34 के तहत दर्ज एफआईआर (FIR) को रद्द करने की मांग वाली याचिका को खारिज कर दिया।
क्या था पूरा मामला?
यह मामला यमुना नगर जिले के जगाधरी शहर थाने में 8 अप्रैल 2017 को दर्ज एफआईआर संख्या 551 से जुड़ा है। शिकायतकर्ता नूतन के अनुसार, 7 अप्रैल 2017 को उनके घर पर ‘स्वामी सत्य नारायण भगवान की पूजा और हवन’ का आयोजन किया गया था।
आरोप है कि दोपहर करीब 3:30 बजे, याचिकाकर्ता वंदना त्यागी अपने माता-पिता, बहन और कुछ अन्य लोगों के साथ जबरन घर में घुस आईं। शिकायतकर्ता का कहना है कि वंदना त्यागी ने दावा किया कि उनके पति दूसरी शादी कर रहे हैं। इसके बाद, आरोपियों ने गालियां दीं, भोजन परोसने के लिए रखे गए बर्तनों और अन्य सामान को इधर-उधर फेंक दिया और वहां मौजूद लोगों के साथ हाथापाई की। उन्होंने करीब 45 मिनट तक वहां हंगामा किया।
याचिकाकर्ताओं की दलील: ‘दूसरी शादी रोकने गए थे’
वंदना त्यागी और उनके ससुराल वालों ने हाईकोर्ट में याचिका दायर कर एफआईआर को रद्द करने की मांग की। उनके वकील दिनेश शर्मा ने तर्क दिया कि शिकायतकर्ता ने तथ्यों को तोड़-मरोड़ कर पेश किया है।
याचिकाकर्ताओं का कहना था कि वंदना की शादी 20 मई 2009 को प्रतिवादी नंबर 1 से हुई थी और उनकी एक बेटी भी है। उन्होंने आरोप लगाया कि पति द्वारा दहेज के लिए प्रताड़ित किए जाने के कारण उन्होंने पहले ही 2019 में एफआईआर दर्ज कराई थी और घरेलू हिंसा अधिनियम के तहत भी मामला चल रहा है।
बचाव पक्ष ने दलील दी कि उन्हें सूचना मिली थी कि वंदना का पति अवैध रूप से दूसरी शादी करने जा रहा है। इसे रोकने के लिए उन्होंने पुलिस से संपर्क किया था। उनका दावा था कि वे वरिष्ठ पुलिस अधिकारी के निर्देश पर स्थानीय पुलिस के साथ मौके पर गए थे और पूरी घटना की वीडियो रिकॉर्डिंग भी मौजूद है। उन्होंने इसे दहेज के मामलों के बदले में दर्ज कराई गई झूठी एफआईआर बताया।
राज्य सरकार का पक्ष
दूसरी ओर, हरियाणा राज्य के अतिरिक्त महाधिवक्ता परवीन कुमार अग्रवाल ने याचिका का विरोध किया। उन्होंने तर्क दिया कि याचिकाकर्ताओं के खिलाफ घर में जबरन घुसने, गाली-गलौज करने और मारपीट करने के विशिष्ट और स्पष्ट आरोप हैं।
सरकारी वकील ने कहा कि जांच के दौरान प्रथम दृष्टया सबूत जुटाए गए हैं और इस चरण में बिना ट्रायल के आरोपों की विश्वसनीयता पर फैसला नहीं सुनाया जा सकता।
हाईकोर्ट की टिप्पणी और फैसला
जस्टिस सूर्य प्रताप सिंह ने सुप्रीम कोर्ट के विभिन्न फैसलों (जैसे स्टेट ऑफ हरियाणा बनाम भजन लाल और नीहारिका इंफ्रास्ट्रक्चर प्रा. लि. बनाम स्टेट ऑफ महाराष्ट्र) का हवाला देते हुए कहा कि एफआईआर रद्द करने की शक्ति का प्रयोग “विरले से विरले मामलों” (rarest of rare cases) में ही किया जाना चाहिए।
मामले के तथ्यों पर गौर करते हुए कोर्ट ने एक महत्वपूर्ण टिप्पणी की:
“एक बार जब याचिकाकर्ताओं के खिलाफ बहुत विशिष्ट आरोप हैं, तो केवल इस आधार पर कि याचिकाकर्ता नंबर 1 और प्रतिवादी नंबर 1 के बीच वैवाहिक कलह को लेकर कुछ मुकदमे चल रहे हैं, याचिकाकर्ताओं को बिना अनुमति किसी व्यक्ति के घर में जबरन घुसने और उनके साथ मारपीट करने की अनुमति नहीं मिल जाती।”
याचिकाकर्ताओं की इस दलील पर कि वे पुलिस के साथ गए थे, कोर्ट ने सख्त रुख अपनाते हुए कहा:
“तर्क के लिए, भले ही याचिका में कही गई इस बात को सच मान लिया जाए कि उक्त घटना पुलिस अधिकारियों की उपस्थिति में हुई थी, तब भी याचिकाकर्ताओं को शिकायतकर्ता के परिसर में घुसने और उसके साथ मारपीट करने का कोई अधिकार नहीं था।”
कोर्ट ने कहा कि शिकायत में लगाए गए आरोपों की सच्चाई अभी तय होनी बाकी है और केवल झूठे फंसाए जाने की दलील पर जांच एजेंसी द्वारा जुटाए गए शुरुआती सबूतों को खारिज नहीं किया जा सकता। अंततः, हाईकोर्ट ने यह कहते हुए याचिका खारिज कर दी कि याचिकाकर्ताओं पर मुकदमा चलाना कानून की प्रक्रिया का दुरुपयोग नहीं है।
केस डिटेल्स:
- केस टाइटल: वंदना त्यागी और अन्य बनाम जतिन त्यागी और अन्य
- केस नंबर: CRM-M No.7636 of 2021 (O&M)
- कोरम: जस्टिस सूर्य प्रताप सिंह

