इलाहाबाद हाईकोर्ट (लखनऊ पीठ) ने एक महत्वपूर्ण फैसले में स्पष्ट किया है कि केवल आपराधिक मुकदमा लंबित होने के आधार पर किसी व्यक्ति को विदेश जाने की अनुमति (NOC) देने से इनकार नहीं किया जा सकता, जब तक कि रिकॉर्ड पर ऐसा कोई ठोस सबूत न हो कि आरोपी न्याय से भाग सकता है (Flight Risk)।
न्यायमूर्ति पंकज भाटिया की पीठ ने निचली अदालत के उस आदेश को रद्द कर दिया, जिसमें एक आरोपी की विदेश यात्रा की अनुमति और पासपोर्ट के लिए एनओसी (NOC) की मांग को खारिज कर दिया गया था। कोर्ट ने पासपोर्ट प्राधिकरण को निर्देश दिया है कि यदि कोई अन्य बाधा न हो, तो आवेदक को सामान्य 10 वर्षों की अवधि के लिए पासपोर्ट जारी किया जाए।
क्या था पूरा मामला?
यह मामला लक्ष्मी कांत बाजपेई बनाम उत्तर प्रदेश राज्य से जुड़ा है। आवेदक के खिलाफ भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा 420 (धोखाधड़ी), 406 (अमानत में खयानत), 323, 504 और 506 के तहत वर्ष 2019 में एक एफआईआर (केस क्राइम सं. 676/2019) दर्ज की गई थी।
आवेदक ने इस आपराधिक कार्यवाही को रद्द कराने के लिए हाईकोर्ट में एक याचिका (धारा 482) दायर की थी। हाईकोर्ट ने मामले की सुनवाई करते हुए यह पाया था कि विवाद मूल रूप से ‘दीवानी प्रकृति’ (Civil Nature) का प्रतीत होता है और इसी आधार पर सत्र परीक्षण (Sessions Trial) की कार्यवाही पर रोक (Stay) लगा दी थी।
इसके बावजूद, जब आवेदक ने विदेश जाने के लिए नया पासपोर्ट बनवाने का प्रयास किया, तो पुलिस ने लंबित मुकदमे का हवाला देते हुए एनओसी (NOC) देने से मना कर दिया। इसके बाद आवेदक ने ट्रायल कोर्ट (निचली अदालत) में विदेश जाने की अनुमति और एनओसी के लिए आवेदन किया। लेकिन 27 अगस्त 2025 को निचली अदालत ने यह कहते हुए आवेदन खारिज कर दिया कि भले ही हाईकोर्ट का स्टे ऑर्डर है, लेकिन आवेदक के विदेश भागने का खतरा (Flight Risk) है, जिससे आपराधिक कार्यवाही प्रभावित हो सकती है।
कोर्ट में क्या दलीलें दी गईं?
हाईकोर्ट में सुनवाई के दौरान विदेश मंत्रालय के विभिन्न सर्कुलर और ऑफिस मेमोरेंडम (दिनांक 25.08.1993, 10.10.2019 और 06.12.2024) का हवाला दिया गया। कोर्ट का ध्यान 6 दिसंबर 2024 के मेमोरेंडम की ओर खींचा गया, जो यह स्पष्ट करता है कि पासपोर्ट जारी करने के लिए कोर्ट से एनओसी लेने का कोई प्रावधान नहीं है; इसके बजाय कोर्ट से ‘भारत से प्रस्थान करने की अनुमति’ (Permission to depart from India) लेनी होती है।
इसके अलावा, मोहम्मद तलहा बनाम भारत संघ (2025) मामले में एक खंडपीठ (Division Bench) के फैसले का भी जिक्र किया गया। उस फैसले में कहा गया था कि यदि संबंधित कोर्ट आरोपी को विदेश यात्रा की अनुमति दे देती है, तो पासपोर्ट अधिनियम की धारा 6(2)(f) (जो लंबित मुकदमे के कारण पासपोर्ट रोकने का अधिकार देती है) के तहत पासपोर्ट से इनकार नहीं किया जा सकता।
हाईकोर्ट का निर्णय और टिप्पणियां
न्यायमूर्ति पंकज भाटिया ने मामले की गंभीरता से जांच करते हुए पाया कि निचली अदालत ने बिना किसी ठोस आधार के आवेदक को ‘फ्लाइट रिस्क’ मान लिया था।
कोर्ट ने अपने आदेश में कहा:
“चूंकि इस न्यायालय द्वारा आगे की कार्यवाही पर पहले ही रोक लगाई जा चुकी है… इसलिए ट्रायल कोर्ट के लिए विदेश यात्रा के लिए एनओसी देना अनिवार्य था, जब तक कि रिकॉर्ड पर ऐसी कोई सामग्री न हो जो यह सुझाव दे कि आवेदक न्याय से भाग सकता है।”
पीठ ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि ट्रायल कोर्ट के पास ऐसी राय बनाने के लिए कोई सामग्री मौजूद नहीं थी, इसलिए 27 अगस्त 2025 का आदेश टिकाऊ नहीं है और इसे रद्द किया जाता है। चूंकि हाईकोर्ट के सामने भी ऐसा कोई सबूत नहीं आया जिससे आवेदक के भागने का संदेह हो, इसलिए कोर्ट ने निम्नलिखित निर्देश जारी किए:
- विदेश यात्रा की अनुमति: आवेदक को विदेश यात्रा की अनुमति दी जाती है।
- 10 साल का पासपोर्ट: पासपोर्ट प्राधिकरण को निर्देश दिया जाता है कि वह आवेदक के नए पासपोर्ट के आवेदन को प्रोसेस करे और सामान्य 10 वर्षों की अवधि के लिए पासपोर्ट जारी करे।
- नवीनीकरण में बाधा नहीं: कोर्ट ने स्पष्ट किया कि केवल केस नंबर 375/2020 के लंबित होने के आधार पर भविष्य में पासपोर्ट के नवीनीकरण से इनकार नहीं किया जाएगा।
कोर्ट ने अंत में यह भी साफ किया कि यह आदेश इसलिए पारित किया जा रहा है क्योंकि मूल आपराधिक कार्यवाही (धारा 482 याचिका) वर्तमान में इसी हाईकोर्ट के समक्ष लंबित है।
केस का विवरण:
- केस टाइटल: लक्ष्मी कांत बाजपेई बनाम उत्तर प्रदेश राज्य व अन्य
- केस संख्या: आवेदन यू/एस 482 संख्या 10778 ऑफ 2025
- कोरम: न्यायमूर्ति पंकज भाटिया
- आवेदक के वकील: शशांक तिलहरी, अनुरुद्ध कुमार सिंह
- प्रतिवादी के वकील: जी.ए., एस. बी. पांडेय (DSGI), वरुण पांडेय

