सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार को 2027 की जनगणना में नागरिकों की जाति से जुड़ी जानकारी को रिकॉर्ड करने, वर्गीकृत करने और सत्यापित करने की प्रक्रिया को लेकर दायर एक जनहित याचिका (PIL) पर सुनवाई से इनकार कर दिया। हालांकि, शीर्ष अदालत ने केंद्र सरकार और भारत के रजिस्ट्रार जनरल व जनगणना आयुक्त से याचिकाकर्ता द्वारा दिए गए सुझावों पर विचार करने को कहा है।
मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली पीठ ने कहा कि यह मुद्दा नीति निर्धारण से संबंधित है और इसे जनगणना अधिनियम, 1958 और इसके तहत बनाए गए नियमों (1990) के दायरे में ही संबोधित किया जाना चाहिए। कोर्ट ने यह भी माना कि याचिकाकर्ता ने कुछ महत्वपूर्ण बिंदु उठाए हैं और प्रासंगिक सुझाव दिए हैं जिन्हें संबंधित प्राधिकरणों द्वारा विचार किया जा सकता है।
यह याचिका अकादमिक शोधकर्ता आकाश गोयल ने दायर की थी, जिनकी ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता मुक्ता गुप्ता ने पैरवी की। याचिका में कहा गया कि चूंकि 2027 की जनगणना में 1931 के बाद पहली बार व्यापक जातीय आंकड़ों को शामिल किया जा रहा है, ऐसे में पारदर्शी प्रक्रिया अपनाना जरूरी है।
गुप्ता ने दलील दी कि जातीय जानकारी रिकॉर्ड करने के लिए उपयोग की जाने वाली प्रश्नावली को सार्वजनिक किया जाना चाहिए, ताकि वर्गीकरण और सत्यापन की प्रक्रिया पारदर्शी और वैज्ञानिक हो सके। उन्होंने यह भी कहा कि निदेशालय द्वारा यह स्पष्ट नहीं किया गया है कि नागरिकों की जाति पहचान दर्ज करने के लिए क्या मापदंड अपनाए जाएंगे।
पीठ ने कहा कि जनगणना की पूरी प्रक्रिया एक कानूनी ढांचे के तहत संचालित होती है और जनगणना अधिनियम एवं नियमों के तहत ही केंद्र सरकार व संबंधित प्राधिकरण यह तय करते हैं कि कौन से विवरण एकत्र किए जाएंगे और कैसे।
अदालत ने कहा, “जनगणना प्रक्रिया जनगणना अधिनियम, 1958 और 1990 के नियमों के तहत विनियमित होती है, जो उत्तरदायी प्राधिकरण को जनगणना संचालन की प्रकृति और तरीके तय करने का अधिकार देते हैं।”
सीजेआई सूर्यकांत ने कहा, “हमें इसमें कोई संदेह नहीं है कि संबंधित प्राधिकरणों ने विशेषज्ञों की सहायता से ऐसी ठोस प्रक्रिया विकसित की होगी जिससे याचिकाकर्ता और अन्य समान विचारधारा वाले लोगों की आशंकाओं को दूर किया जा सके।”
पीठ ने यह भी कहा कि याचिकाकर्ता ने जो सुझाव दिए हैं, वे पहले ही रजिस्ट्रार जनरल को भेजे जा चुके हैं और प्राधिकरण चाहें तो उन पर विचार कर सकते हैं। इसके साथ ही कोर्ट ने याचिका का निस्तारण कर दिया।
2027 की जनगणना, जो भारत की 16वीं राष्ट्रीय जनगणना होगी, कई मायनों में ऐतिहासिक होने वाली है। यह पहली बार पूरी तरह डिजिटल रूप में आयोजित होगी और 1931 के बाद पहली बार व्यापक रूप से जाति आधारित आंकड़ों को एकत्रित किया जाएगा।
सुप्रीम कोर्ट का यह फैसला स्पष्ट करता है कि जनगणना जैसे नीतिगत मामलों में अदालत हस्तक्षेप से बचेगी, हालांकि नागरिकों की ओर से पारदर्शिता और वैज्ञानिक प्रक्रिया की मांग लगातार उठ रही है।

