कलकत्ता हाईकोर्ट ने एक वैवाहिक विवाद (Matrimonial Dispute) से जुड़े मामले में आपराधिक कार्यवाही को रद्द कर दिया है। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि एक ही घटना और समान कारण (cause of action) पर दूसरी शिकायत दर्ज करना कानून की नजर में स्वीकार्य नहीं है। न्यायमूर्ति चैताली चटर्जी दास की पीठ ने आरोपों में भारी विसंगतियां पाते हुए इस कार्यवाही को “कानून की प्रक्रिया का पूर्ण दुरुपयोग” (Absolute abuse of process of law) करार दिया।
हाईकोर्ट ने पति और ससुराल वालों द्वारा दायर आपराधिक पुनरीक्षण याचिका (Criminal Revision Petition) को स्वीकार करते हुए राणाघाट के अतिरिक्त मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट (ACJM) के समक्ष लंबित कार्यवाही को रद्द कर दिया।
मामले की पृष्ठभूमि
याचिकाकर्ताओं (पति आशीष बेरा और उनके परिवार के सदस्यों) ने धनतला पुलिस स्टेशन केस संख्या 229/2022, दिनांक 17 अप्रैल 2022 से उत्पन्न कार्यवाही को चुनौती दी थी। यह मामला भारतीय दंड संहिता की धारा 498A (क्रूरता), 323 (मारपीट), 307 (हत्या का प्रयास), 313 (सहमति के बिना गर्भपात), 406 (आपराधिक विश्वासघात) और 34 के तहत दर्ज किया गया था।
शिकायतकर्ता पत्नी (विपक्षी संख्या 2) का आरोप था कि याचिकाकर्ता संख्या 1 (पति) के साथ उनका 12 साल का रिश्ता था, जिसके बाद उन्होंने मंदिर में हिंदू रीति-रिवाजों से शादी की। शादी के दो महीने बाद ही ससुराल वालों ने उन्हें मानसिक और शारीरिक रूप से प्रताड़ित करना शुरू कर दिया।
विशेष रूप से, पत्नी ने आरोप लगाया कि 18 मार्च 2022 को आरोपियों ने उसके बाल खींचे, उसका सिर दीवार पर पटका और उसे जिंदा जलाने के लिए मिट्टी का तेल डालने की कोशिश की। इन आरोपों के आधार पर सीआरपीसी की धारा 156(3) के तहत शिकायत दर्ज की गई, जो बाद में एफआईआर में तब्दील हुई।
हालांकि, कोर्ट ने पाया कि पत्नी ने इसी घटना (18 मार्च 2022) और इन्हीं आरोपियों के खिलाफ पहले ही सागर पुलिस स्टेशन (केस संख्या 77/2022) में 20 मार्च 2022 को एक एफआईआर दर्ज करा रखी थी।
पक्षों की दलीलें
याचिकाकर्ताओं के वकील ने तर्क दिया कि चूंकि सागर पुलिस स्टेशन में पहले ही एफआईआर दर्ज हो चुकी है, इसलिए “समान कारण और घटना की तारीख” पर दूसरी शिकायत कानूनन पोषणीय (maintainable) नहीं है। उन्होंने कहा कि आरोप सामान्य प्रकृति के हैं और पति व उनके बुजुर्ग माता-पिता को परेशान करने के दुर्भावनापूर्ण इरादे से लगाए गए हैं।
दूसरी ओर, पत्नी के वकील ने तर्क दिया कि दो शिकायतों का दर्ज होना “लगातार प्रताड़ना” को दर्शाता है। यह भी कहा गया कि पुलिस ने चार्जशीट दाखिल कर दी है और याचिकाकर्ताओं के खिलाफ सामग्री मौजूद है, इसलिए इस चरण में कार्यवाही को रद्द नहीं किया जाना चाहिए।
राज्य अभियोजन पक्ष ने स्वीकार किया कि एक ही याचिकाकर्ताओं के खिलाफ दो मामले (धनतला और सागर पुलिस स्टेशन) लंबित हैं, लेकिन उन्होंने कार्यवाही रद्द करने का विरोध किया।
कोर्ट का विश्लेषण और टिप्पणियां
न्यायमूर्ति चैताली चटर्जी दास ने केस रिकॉर्ड और केस डायरी का बारीकी से अध्ययन किया और शिकायतकर्ता के बयानों में “भारी विसंगतियां” पाईं।
1. आरोपों में विरोधाभास: कोर्ट ने जबरन गर्भपात (Forced Abortion) के आरोप में विसंगति पाई। सीआरपीसी की धारा 164 के तहत दिए गए बयान में पत्नी ने शादी से पहले 2016 में गर्भपात का उल्लेख किया था, जबकि चार्जशीट दाखिल करते समय दर्ज बयान में इसे वैवाहिक जीवन (2021 की शादी के बाद) के दौरान की घटना बताया गया।
2. केस डायरी में सबूतों का अभाव: हत्या के प्रयास के गंभीर आरोप के संबंध में कोर्ट ने टिप्पणी की:
“केस डायरी में ऐसा कोई भी साक्ष्य नहीं मिला है जो यह साबित करे कि उन पर मिट्टी का तेल डाला गया या उनका सिर दीवार से टकराया गया। इतनी क्रूर घटना के बावजूद पहले कोई शिकायत भी दर्ज नहीं कराई गई थी।”
3. तथ्यों को छिपाना: कोर्ट ने पाया कि धारा 156(3) के तहत दायर लिखित शिकायत में सागर पुलिस स्टेशन में दर्ज पहली शिकायत के बारे में “पूरी तरह चुप्पी” साधी गई थी। कोर्ट ने कहा कि “इसका कोई संतोषजनक स्पष्टीकरण नहीं मिलता कि शिकायतकर्ता को 2 महीने के भीतर एक ही घटना के संबंध में अलग-अलग जगहों पर दो अलग-अलग शिकायतें क्यों दर्ज करानी पड़ीं।”
4. प्रक्रियात्मक उल्लंघन: कोर्ट ने सीआरपीसी की धारा 154(1) और 154(3) की अनिवार्य आवश्यकताओं के उल्लंघन को भी नोट किया। शिकायतकर्ता ने दावा किया कि उसने पुलिस अधीक्षक (SP) को पत्र लिखा था, लेकिन धारा 156(3) की अर्जी के साथ उस पत्र की कोई प्रति संलग्न नहीं की गई।
5. पूर्व निर्णयों का हवाला: हाईकोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के फैसले प्रीति गुप्ता बनाम झारखंड राज्य का हवाला देते हुए दोहराया कि अन्याय को रोकने के लिए धारा 482 के तहत अंतर्निहित शक्तियों का प्रयोग किया जाना चाहिए। कोर्ट ने कहा:
“पति और उसके सभी करीबी रिश्तेदारों को फंसाने की प्रवृत्ति असामान्य नहीं है… अदालतों को इन शिकायतों से निपटने में बेहद सावधान और सतर्क रहना होगा।”
कोर्ट ने गीता मेहरोत्रा बनाम उत्तर प्रदेश राज्य मामले का भी उल्लेख किया, जिसमें यह कहा गया था कि यदि वैवाहिक विवादों में परिवार के सभी सदस्यों को बिना किसी ठोस सामग्री के घसीटा जाता है, तो हाईकोर्ट को ऐसी शिकायतों को रद्द कर देना चाहिए।
निर्णय
कोर्ट ने निष्कर्ष निकाला कि शिकायत की प्रकृति “तंग करने वाली और तुच्छ” (Vexatious and frivolous) प्रतीत होती है। न्यायमूर्ति दास ने कहा कि कार्यवाही को जारी रखने की अनुमति देना कानून की प्रक्रिया का दुरुपयोग होगा। कोर्ट ने अपने आदेश में कहा:
“इसलिए, संपूर्ण तथ्यों और परिस्थितियों के संचयी मूल्यांकन पर, इस न्यायालय को कार्यवाही को आगे जारी रखने की अनुमति देने के लिए कोई सामग्री या पर्याप्त सामग्री नहीं मिली है, क्योंकि अन्यथा यह कानून की प्रक्रिया का पूर्ण दुरुपयोग होगा।”
तदनुसार, कोर्ट ने पुनरीक्षण आवेदन को अनुमति दी और जी.आर. केस संख्या 1366 ऑफ 2022 की कार्यवाही को रद्द कर दिया।
केस विवरण:
- केस शीर्षक: आशीष बेरा व अन्य बनाम पश्चिम बंगाल राज्य व अन्य
- केस संख्या: CRR 476 OF 2023
- कोरम: न्यायमूर्ति चैताली चटर्जी दास
- निर्णय की तिथि: 30.01.2026

