सुप्रीम कोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसले में स्पष्ट किया है कि कुलपति (वाइस चांसलर) की नियुक्ति के संबंध में राज्य का कानून विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (UGC) विनियम, 2018 का उल्लंघन नहीं कर सकता। यूजीसी के ये विनियम संविधान की सूची I की प्रविष्टि 66 के तहत आते हैं। शीर्ष अदालत ने मद्रास हाईकोर्ट के उस निर्णय की पुष्टि की, जिसमें पुडुचेरी टेक्नोलॉजिकल यूनिवर्सिटी एक्ट, 2019 (PTU Act) की धारा 14(5) को ‘अधिकारतीत’ (ultra vires) घोषित किया गया था, क्योंकि इसमें सर्च-कम-सिलेक्शन कमेटी में यूजीसी के नामित सदस्य को शामिल नहीं किया गया था।
हालांकि, जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस संदीप मेहता की पीठ ने संविधान के अनुच्छेद 142 के तहत अपनी असाधारण शक्तियों का प्रयोग करते हुए अपीलकर्ता, डॉ. एस. मोहन को कुलपति के रूप में अपना कार्यकाल पूरा करने या नया उत्तराधिकारी नियुक्त होने तक पद पर बने रहने की अनुमति दी है। कोर्ट ने यह निर्णय उनकी शैक्षणिक योग्यता और प्रशासनिक शून्यता (administrative vacuum) को रोकने के लिए लिया।
यह अपील मद्रास हाईकोर्ट के 19 दिसंबर, 2023 के फैसले के खिलाफ दायर की गई थी, जिसने डॉ. एस. मोहन की नियुक्ति को रद्द कर दिया था। हाईकोर्ट ने माना था कि पीटीयू एक्ट के तहत गठित चयन समिति यूजीसी विनियम, 2018 के विनियम 7.3 के साथ असंगत थी। यद्यपि सुप्रीम कोर्ट ने कानूनी निष्कर्ष को बरकरार रखा कि यूजीसी मानदंडों का पालन न करने के कारण नियुक्ति प्रक्रिया दूषित थी, लेकिन डॉ. मोहन को राहत प्रदान की क्योंकि वह एक योग्य उम्मीदवार हैं और उनकी सत्यनिष्ठा पर कोई आरोप नहीं है।
मामले की पृष्ठभूमि
पुडुचेरी टेक्नोलॉजिकल यूनिवर्सिटी की स्थापना पीटीयू एक्ट, 2019 के तहत की गई थी। इस अधिनियम की धारा 14(5) में कुलपति की नियुक्ति के लिए सर्च-कम-सिलेक्शन कमेटी के गठन का प्रावधान था। इस समिति में चांसलर के नामित व्यक्ति, सरकार के नामित व्यक्ति और बोर्ड ऑफ गवर्नर्स के नामित व्यक्ति शामिल थे, लेकिन इसमें यूजीसी अध्यक्ष का कोई नामित सदस्य शामिल नहीं था।
20 जनवरी, 2021 को एक चयन समिति का गठन किया गया, जिसमें आईआईटी दिल्ली के निदेशक, आईआईटी मद्रास के एक प्रोफेसर और पुडुचेरी सरकार के सचिव (उच्च और तकनीकी शिक्षा) शामिल थे। उनकी सिफारिश के आधार पर, 17 दिसंबर, 2021 को डॉ. एस. मोहन को पांच साल के लिए पहले कुलपति के रूप में नियुक्त किया गया था।
मद्रास हाईकोर्ट में रिट याचिकाएं दायर कर नियुक्ति और पीटीयू एक्ट की धारा 14(5) की वैधता को चुनौती दी गई। याचिकाकर्ताओं का तर्क था कि यूजीसी के नामित सदस्य का बहिष्कार यूजीसी विनियम, 2018 के विनियम 7.3 का उल्लंघन है। हाईकोर्ट ने इन याचिकाओं को स्वीकार करते हुए प्रावधान को अवैध घोषित किया था।
पक्षों की दलीलें
अपीलकर्ता का पक्ष: डॉ. मोहन की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता निधेश गुप्ता ने तर्क दिया कि पीटीयू एक्ट को राष्ट्रपति की सहमति प्राप्त थी, जो अनुच्छेद 254(2) के तहत केंद्रीय कानूनों के साथ किसी भी असंगतता के बावजूद कानून को वैध बनाती है। उन्होंने तर्क दिया कि कुलपति की नियुक्ति सूची III (समवर्ती सूची) की प्रविष्टि 25 के तहत आती है, जो विश्वविद्यालय प्रशासन से संबंधित है, न कि सूची I की प्रविष्टि 66 के तहत, जो “मानकों” से संबंधित है।
अपीलकर्ता ने गंभीरदान के. गढ़वी बनाम गुजरात राज्य मामले से इस केस को अलग बताया और तर्क दिया कि डॉ. मोहन पूरी तरह से योग्य थे, जबकि गंभीरदान मामले में कुलपति के पास अनिवार्य योग्यता नहीं थी। यह भी कहा गया कि विश्वविद्यालय को यूजीसी से अनुदान प्राप्त नहीं होता है।
प्रतिवादियों का पक्ष: प्रतिवादियों ने तर्क दिया कि उच्च शिक्षा में मानकों के समन्वय और निर्धारण का विधायी क्षेत्र विशेष रूप से सूची I की प्रविष्टि 66 के तहत संसद के अधिकार क्षेत्र में है। गुजरात यूनिवर्सिटी बनाम कृष्णा रंगनाथ का हवाला देते हुए, उन्होंने तर्क दिया कि मानकों के समन्वय की शक्ति पूर्ण है।
यह दलील दी गई कि यूजीसी विनियम अनिवार्य हैं और कोई भी विचलन नियुक्ति प्रक्रिया को अवैध बना देता है। उन्होंने कहा कि पीटीयू एक्ट को मिली राष्ट्रपति की सहमति यूजीसी विनियमों के साथ असंगतता के लिए विशिष्ट नहीं थी, इसलिए अनुच्छेद 254 का संरक्षण यहां लागू नहीं होता।
न्यायालय का विश्लेषण
यूजीसी विनियमों की सर्वोच्चता सुप्रीम कोर्ट ने स्थापित कानूनी स्थिति को दोहराया कि हालांकि राज्यों के पास सूची III की प्रविष्टि 25 के तहत शिक्षा पर विधायी क्षमता है, लेकिन यह शक्ति सूची I की प्रविष्टि 66 के अधीन है। कोर्ट ने कहा:
“यूजीसी विनियम, 2018 का स्रोत सूची I की प्रविष्टि 66 में है… इस आधार पर, पीटीयू एक्ट को यूजीसी विनियम, 2018 के विनियम 7.3 के साथ पूर्ण अनुरूपता में होना आवश्यक था… परिणामस्वरूप, पीटीयू एक्ट की धारा 14(5), जिस हद तक यह यूजीसी विनियमों के जनादेश के विपरीत चयन समिति की संरचना निर्धारित करती है, उसे ‘अधिकारतीत’ (ultra vires) घोषित किया जाना चाहिए।”
चयन समिति की अवैधता न्यायालय ने दो विशिष्ट उल्लंघनों को नोट किया:
- यूजीसी नामित सदस्य की अनुपस्थिति: समिति में यूजीसी अध्यक्ष का कोई नामित सदस्य नहीं था, जो विनियम 7.3 के तहत अनिवार्य है।
- हितों का टकराव (Conflict of Interest): सचिव (उच्च और तकनीकी शिक्षा) को शामिल करना इस आवश्यकता का उल्लंघन था कि सदस्य “संबंधित विश्वविद्यालय के साथ किसी भी तरह से जुड़े नहीं होने चाहिए।” कोर्ट ने नोट किया कि सचिव, प्रो-चांसलर और गवर्निंग बॉडी के पूर्व सदस्य होने के नाते, “विश्वविद्यालय के साथ सीधे जुड़े हुए थे, जिससे हितों का स्पष्ट टकराव उत्पन्न हुआ।”
अनुच्छेद 254 (असंगति) की अनुपयुक्तता पीठ ने स्पष्ट किया कि अनुच्छेद 254 के तहत ‘असंगति का सिद्धांत’ (doctrine of repugnancy) केवल तभी लागू होता है जब केंद्रीय और राज्य दोनों कानून समवर्ती सूची (सूची III) के भीतर कार्य करते हैं। चूंकि यूजीसी एक्ट सूची I के तहत और पीटीयू एक्ट सूची III के तहत आता है, कोर्ट ने कहा:
“निस्संदेह, वर्तमान मामले में, केंद्रीय कानून सूची I के तहत संसद के लिए विशेष रूप से आरक्षित क्षेत्र में है, और परिणामस्वरूप असंगतता के परीक्षण या निर्धारण का, या अनुच्छेद 254(2) का सहारा लेकर उसे ठीक करने का प्रश्न ही नहीं उठता।”
निर्णय
सुप्रीम कोर्ट ने चयन समिति के गठन की अवैधता के संबंध में हाईकोर्ट के फैसले की पुष्टि की। हालांकि, अपीलकर्ता को हटाने के संबंध में, कोर्ट ने सहानुभूतिपूर्ण दृष्टिकोण अपनाया।
यह देखते हुए कि डॉ. मोहन मेधावी पाए गए थे, उन्होंने बिना किसी शिकायत के चार साल तक सेवा की है, और उन्हें हटाने से “गंभीर कलंक” और “प्रशासनिक व्यवधान” उत्पन्न होगा, कोर्ट ने अनुच्छेद 142 के तहत अपने अधिकार क्षेत्र का प्रयोग किया।
“हम… निर्देश देते हैं कि अपीलकर्ता अपने सामान्य कार्यकाल के अंत तक या कानून के अनुसार नए कुलपति का चयन होने तक, जो भी पहले हो, कुलपति का पद संभालना जारी रखेंगे।”
कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि केंद्र शासित प्रदेश की विधायिका यूजीसी विनियमों के अनुरूप पीटीयू एक्ट में संशोधन करने के लिए स्वतंत्र है।
केस विवरण:
- केस का नाम: डॉ. एस. मोहन बनाम चांसलर के सचिव, पुडुचेरी टेक्नोलॉजिकल यूनिवर्सिटी और अन्य
- केस संख्या: सिविल अपील संख्या 54-55 / 2025
- कोरम: जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस संदीप मेहता

