चेक पर तारीख न होना उसे बेकार नहीं बना देता। दिल्ली हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसले में स्पष्ट किया है कि भले ही चेक बिना तारीख (undated) के हों, वे कर्ज के लेन-देन को साबित करने के लिए एक मजबूत साक्ष्य (Corroborative Value) माने जाते हैं।
जस्टिस अमित बंसल की पीठ ने 50 लाख रुपये के लोन रिकवरी मामले में यह फैसला सुनाते हुए मृतक कर्जदार के कानूनी वारिसों (Legal Heirs) की अपील को खारिज कर दिया। इतना ही नहीं, कोर्ट ने वादी (Plaintiff) की क्रॉस-आपत्ति को स्वीकार करते हुए कहा कि मुकदमे में जीतने वाले पक्ष को बिना किसी ठोस वजह के ‘पेंडेंट लाइट इंटरेस्ट’ (मुकदमा लंबित रहने के दौरान का ब्याज) और मुकदमे के खर्च से वंचित नहीं किया जा सकता।
क्या था पूरा मामला?
यह मामला दो पड़ोसियों और दोस्तों, रमेश चंद्र गुप्ता (वादी) और स्वर्गीय राकेश बहादुर माथुर के बीच का है। वादी के अनुसार, जुलाई 2013 से अगस्त 2014 के बीच उन्होंने राकेश माथुर को जरूरत पड़ने पर 50 लाख रुपये का ब्याज मुक्त दोस्ताना कर्ज (Friendly Loan) दिया था। यह रकम कुछ चेक और कुछ नकद के जरिए दी गई थी।
आरोप था कि कर्ज के बदले राकेश माथुर ने दो प्रॉमिसरी नोट्स (वचन पत्र) निष्पादित किए और 50 लाख रुपये की कुल राशि के पांच बिना तारीख वाले चेक वादी को सौंपे थे। जुलाई 2015 में राकेश माथुर का निधन हो गया। जब वादी ने उनके कानूनी वारिसों (पत्नी और बच्चों) से पैसा वापस माँगा, तो उन्होंने भुगतान नहीं किया। इसके बाद वादी ने निचली अदालत का दरवाजा खटखटाया।
निचली अदालत ने 3 सितंबर 2019 को फैसला वादी के पक्ष में सुनाया और वारिसों को 50 लाख रुपये 12% वार्षिक भविष्य ब्याज के साथ चुकाने का आदेश दिया। इस फैसले के खिलाफ वारिसों ने हाईकोर्ट में अपील (RFA 1003/2019) दायर की।
दलीलें: ‘चेक जाली हैं और कोई तारीख नहीं है’
मृतक के वारिसों (प्रतिवादी) की ओर से पेश वकील जय सहाय एंडलॉ ने तर्क दिया कि प्रॉमिसरी नोट्स और चेक फर्जी हैं। उनका कहना था कि वादी ने नकद दी गई रकम का कोई सबूत या रसीद पेश नहीं की। सबसे बड़ी दलील यह थी कि चेक पर न तो कोई तारीख थी और न ही लेने वाले (payee) का नाम, इसलिए उन्हें वैध नहीं माना जाना चाहिए। उन्होंने यह भी कहा कि दस्तावेजों पर पिता के हस्ताक्षर साबित करने का बोझ वादी पर था, जिसे गलत तरीके से प्रतिवादियों पर डाल दिया गया।
दूसरी ओर, वादी के वकील सचिन गुप्ता ने निचली अदालत के फैसले का बचाव किया। उन्होंने यह भी तर्क दिया कि निचली अदालत ने वादी को ‘पेंडेंट लाइट इंटरेस्ट’ (मुकदमा दायर करने से फैसला आने तक का ब्याज) और लोकल कमिश्नर की फीस का खर्च न देकर गलती की है।
हाईकोर्ट का फैसला: ‘चेक उधारी की पुष्टि करते हैं’
जस्टिस अमित बंसल ने मामले की गहराई से जांच की और निचली अदालत के निष्कर्षों को सही ठहराया। कोर्ट ने कहा कि प्रॉमिसरी नोट्स पर मृतक के हस्ताक्षर थे और उनमें दोनों पक्षों के नाम थे, इसलिए वे वैध हैं।
बिना तारीख वाले चेक के मुद्दे पर कोर्ट ने एक अहम टिप्पणी की:
“भले ही बिना तारीख वाले पांच चेक तकनीकी रूप से ‘विनिमय पत्र’ (Bills of Exchange) की श्रेणी में न आएं, लेकिन उनका ‘संपोषक मूल्य’ (Corroborative Value) है और वे कर्ज की पुष्टि करते हैं।”
कोर्ट ने नोट किया कि वादी ने बैंक से गवाह बुलाकर हस्ताक्षर साबित कर दिए थे। वहीं, जब मृतक के बेटे (गवाह DW-1) से जिरह की गई और पिता के हस्ताक्षर वाले अन्य दस्तावेज या चेकबुक के काउंटरफॉइल मांगे गए, तो वह उन्हें पेश करने में असमर्थ रहे। कोर्ट ने कहा कि प्रतिवादी यह बताने में विफल रहे कि अगर उनके पिता ने चेक नहीं दिए थे, तो वे वादी के पास कैसे पहुंचे।
ब्याज और मुकदमे का खर्च भी मिलेगा
हाईकोर्ट ने वादी की इस दलील को भी स्वीकार कर लिया कि उन्हें मुकदमा चलने की अवधि का ब्याज मिलना चाहिए। जस्टिस बंसल ने कहा:
“मुकदमे में सफल होने वाले पक्ष को बिना किसी कारण के पेंडेंट लाइट इंटरेस्ट से वंचित नहीं किया जा सकता।”
अदालत का अंतिम निर्णय:
- अपील खारिज: प्रतिवादियों (वारिसों) की अपील खारिज कर दी गई।
- ब्याज: कोर्ट ने आदेश दिया कि वादी को मुकदमा दायर करने की तारीख (1 अक्टूबर 2015) से डिक्री की तारीख (3 सितंबर 2019) तक 9% प्रति वर्ष की दर से ब्याज दिया जाए।
- खर्चा: वादी को मुकदमे का पूरा खर्च, जिसमें लोकल कमिश्नर को दी गई फीस भी शामिल है, पाने का हकदार माना गया।
रजिस्ट्री को निर्देश दिया गया कि जमा की गई राशि में से वादी को भुगतान किया जाए।
केस विवरण
- केस टाइटल: रेणु माथुर व अन्य बनाम रमेश चंद्र गुप्ता
- केस नंबर: RFA 1003/2019
- कोरम: जस्टिस अमित बंसल

