आंध्र प्रदेश हाईकोर्ट: केवल धोखाधड़ी के आरोप पर संपन्न विभाजन को दोबारा नहीं खोला जा सकता; ठोस सबूत और नाबालिग के हितों पर प्रतिकूल प्रभाव साबित करना अनिवार्य

आंध्र प्रदेश हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसले में स्पष्ट किया है कि हिंदू अविभाजित परिवार (HUF) के सदस्यों के बीच अपनी स्वतंत्र इच्छा से किया गया विभाजन अंतिम होता है। न्यायालय ने कहा कि इसे केवल धोखाधड़ी, जबरदस्ती या गलत बयानी के आधार पर ही दोबारा खोला जा सकता है, जिसके लिए ठोस सबूतों की आवश्यकता होती है।

जस्टिस रवि नाथ तिलहरी और जस्टिस महेश्वर राव कुंचम की खंडपीठ ने निचली अदालत के फैसले को बरकरार रखते हुए अपील को खारिज कर दिया। पीठ ने कहा कि अपीलकर्ता यह साबित करने में विफल रहे कि पंजीकृत विभाजन और बंदोबस्त विलेख (Settlement Deed) फर्जी या धोखाधड़ीपूर्ण थे।

मामले की पृष्ठभूमि

यह अपील (Appeal Suit No. 512 of 2019) दिवंगत गोरीपार्थी नागेश्वर राव की पत्नी और बच्चों द्वारा दायर की गई थी। उन्होंने भीमावरम के तृतीय अतिरिक्त जिला न्यायाधीश के 11 जून, 2019 के फैसले को चुनौती दी थी, जिसके तहत उनके विभाजन के मुकदमे (O.S. No. 12 of 2013) को खारिज कर दिया गया था।

अपीलकर्ता (वादी) ने दिवंगत नागेश्वर राव के भाइयों (प्रतिवादियों) के खिलाफ मुकदमा दायर किया था। विवाद पूर्वज गोरीपार्थी वेंकन्ना की संपत्ति को लेकर था। वादियों ने 27 जून, 2008 के पंजीकृत विभाजन विलेख और बंदोबस्त विलेख तथा 25 अप्रैल, 2015 के एक बिक्री विलेख को “फर्जी, मिलीभगत और धोखाधड़ीपूर्ण” घोषित करने की मांग की थी। उनका तर्क था कि वे संपत्ति में हिस्से के हकदार हैं और पुराने दस्तावेज उन पर बाध्यकारी नहीं हैं।

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दूसरी ओर, प्रतिवादियों का कहना था कि नागेश्वर राव के जीवनकाल में ही भाइयों के बीच विभाजन हो चुका था। 2008 के विभाजन विलेख (Ex.A.1) के तहत, नागेश्वर राव ने अपनी व्यावसायिक आवश्यकताओं के लिए जमीन के बदले संयुक्त परिवार से 1,00,000 रुपये नकद लेना स्वीकार किया था। इसके अलावा, उन्होंने स्वेच्छा से एक बंदोबस्त विलेख (Ex.A.2) भी निष्पादित किया था।

पक्षों की दलीलें

अपीलकर्ताओं के वकील ने तर्क दिया कि विवादित दस्तावेज नाममात्र के थे और चूंकि वादी (पत्नी और बच्चे) उन दस्तावेजों में शामिल नहीं थे, इसलिए वे उन पर बाध्यकारी नहीं हैं। उन्होंने यह भी कहा कि विभाजन असमान था और इसमें नाबालिग वादी (तीसरे वादी) के हितों की अनदेखी की गई थी।

प्रतिवादियों के वकील ने इसका विरोध करते हुए कहा कि नागेश्वर राव ने अपनी पूर्ण सहमति से दस्तावेज निष्पादित किए थे। उन्होंने तर्क दिया कि धोखाधड़ी का आरोप केवल एक बाद का विचार (Afterthought) है और इसके समर्थन में कोई बुनियादी तथ्य या सबूत पेश नहीं किए गए हैं।

कोर्ट का विश्लेषण और टिप्पणियां

हाईकोर्ट ने मामले के तथ्यों और कानूनी पहलुओं पर विस्तृत विचार किया:

  1. विभाजन को दोबारा खोलना:
    पीठ ने प्राचीन ‘मनु स्मृति’ का हवाला देते हुए कहा कि एक बार किया गया विभाजन आम तौर पर irrevocable (अपरिवर्तनीय) होता है। सुप्रीम कोर्ट के रत्नम चेट्टियार बनाम एस.एम. कुप्पुस्वामी चेट्टियार (1976) के फैसले का उल्लेख करते हुए, कोर्ट ने कहा कि सहमति से किए गए विभाजन को तब तक दोबारा नहीं खोला जा सकता जब तक कि यह साबित न हो जाए कि इसे धोखाधड़ी, जबरदस्ती या गलत बयानी से प्राप्त किया गया था।
  2. नाबालिगों के अधिकार:
    कोर्ट ने माना कि यदि विभाजन सद्भावना (Good Faith) में किया गया है, तो यह नाबालिगों पर भी बाध्यकारी होता है। इसे केवल तभी चुनौती दी जा सकती है जब यह साबित हो कि विभाजन अन्यायपूर्ण, अनुचित और नाबालिगों के हितों के लिए हानिकारक है। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि “धोखाधड़ी के बिना, केवल शेयरों की असमानता विभाजन को दोबारा खोलने का आधार नहीं हो सकती, यदि विभाजन स्वैच्छिक समझौते का परिणाम हो।”
  3. धोखाधड़ी के आरोप और सबूत:
    कोर्ट ने सिविल प्रक्रिया संहिता (CPC) के आदेश VI नियम 4 का हवाला देते हुए कहा कि धोखाधड़ी का केवल आरोप लगाना पर्याप्त नहीं है, बल्कि इसे विशिष्ट विवरणों के साथ साबित करना अनिवार्य है। पीठ ने टिप्पणी की:
    “यह कानूनन तय है कि धोखाधड़ी का गठन करने वाले विशिष्ट और भौतिक अभिवचनों (pleadings) के अभाव में, ऐसे तर्क के समर्थन में पेश किया गया कोई भी सबूत पूरी तरह से अस्वीकार्य है।”

तथ्यात्मक निष्कर्ष

अदालत ने पाया कि दिवंगत नागेश्वर राव एक उच्च शिक्षित सरकारी इंजीनियर थे और बाद में निर्माण व्यवसाय में थे। साक्ष्यों से पता चला कि उन्होंने 2011 में अपनी मृत्यु से तीन साल पहले 2008 में स्वेच्छा से विभाजन विलेख निष्पादित किए थे और अपनी व्यावसायिक जरूरतों के लिए 1,00,000 रुपये नकद स्वीकार किए थे।

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कोर्ट ने कहा कि वादी पक्ष यह बताने में विफल रहा कि नागेश्वर राव या वादियों के खिलाफ धोखाधड़ी कैसे की गई। इसके अलावा, आंध्र प्रदेश राइट्स इन लैंड्स एंड पट्टादार पासबुक्स एक्ट, 1971 के तहत जारी राजस्व रिकॉर्ड की शुद्धता की वैधानिक धारणा भी प्रतिवादियों के पक्ष में थी।

निर्णय

हाईकोर्ट ने माना कि वादी किसी भी तरह की धोखाधड़ी, अनुचित प्रभाव या नाबालिग के हितों के हनन को साबित करने में विफल रहे हैं। ट्रायल कोर्ट के निष्कर्षों को सही ठहराते हुए, पीठ ने कहा:

“हम धोखाधड़ी और विभाजन की अंतिमता (finality of partition) के बारे में ट्रायल कोर्ट द्वारा दिए गए विस्तृत और तर्कसंगत निष्कर्षों में कोई त्रुटि नहीं पाते हैं।”

तदनुसार, हाईकोर्ट ने अपील खारिज कर दी और निचली अदालत के फैसले की पुष्टि की।

केस डिटेल्स:

  • केस टाइटल: गोरीपार्थी झांसी और अन्य बनाम गोरीपार्थी श्रीराम मूर्ति और अन्य
  • केस नंबर: अपील सूट संख्या 512 ऑफ 2019 (Appeal Suit No. 512 of 2019)
  • कोरम: जस्टिस रवि नाथ तिलहरी और जस्टिस महेश्वर राव कुंचम

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