मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने नेगोशिएबल इंस्ट्रूमेंट्स एक्ट (NI Act) की धारा 138 के तहत एक महत्वपूर्ण कानूनी स्थिति स्पष्ट की है। हाईकोर्ट ने कहा है कि यदि किसी चेक पर ‘Not Negotiable’ (परक्राम्य नहीं) लिखा है, तो इसका मतलब यह कतई नहीं है कि चेक बाउंस होने पर उस व्यक्ति के खिलाफ आपराधिक मामला नहीं चलाया जा सकता। न्यायमूर्ति हिमांशु जोशी की एकल पीठ ने याचिकाकर्ता की उस दलील को खारिज कर दिया जिसमें दावा किया गया था कि ‘Not Negotiable’ मार्क होने के कारण चेक की कानूनी प्रकृति बदल गई है।
मामले की पृष्ठभूमि
यह विवाद डॉक्टर संदीप पटेल (याचिकाकर्ता) और अनिल कुमार गुप्ता (प्रतिवादी) के बीच शुरू हुआ। अनिल गुप्ता के अनुसार, डॉ. पटेल ने दिसंबर 2019 में अपनी पारिवारिक जरूरतों के लिए उनसे 5 लाख रुपये का उधार लिया था। इस कर्ज की अदायगी के लिए डॉ. पटेल ने 31 मई 2020 को 4 लाख रुपये का एक चेक जारी किया।
जब यह चेक बैंक में लगाया गया, तो वह “अपर्याप्त धन” (Funds Insufficient) के कारण बाउंस हो गया। इसके बाद कानूनी नोटिस दिए जाने के बावजूद पैसे नहीं चुकाए गए, जिसके चलते अनिल गुप्ता ने रीवा की अदालत में धारा 138 के तहत शिकायत दर्ज कराई। डॉ. पटेल ने निचली अदालतों में आवेदन देकर तर्क दिया कि चूंकि चेक पर ‘Not Negotiable’ लिखा था, इसलिए यह मामला विचारणीय ही नहीं है। जब निचली अदालतों ने उनकी अर्जी खारिज कर दी, तो उन्होंने हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया।
पक्षों के तर्क
याचिकाकर्ता डॉ. पटेल के वकील ने जोर देकर कहा कि चेक पर ‘Not Negotiable’ नोट लिखने से इसकी विनिमय क्षमता (negotiability) समाप्त हो गई है। उन्होंने दुर्गा शाह मोहाल लाल बैंकर्स बनाम गवर्नर जनरल इन काउंसिल (AIR 1952 इलाहाबाद 590) के पुराने फैसले का हवाला देते हुए तर्क दिया कि ऐसे चेक पर धारा 138 के प्रावधान लागू नहीं होने चाहिए।
वहीं, प्रतिवादी (शिकायतकर्ता) के वकील ने इन दलीलों का विरोध करते हुए कहा कि यह याचिका कार्यवाही को लंबा खींचने और सजा से बचने की एक कोशिश मात्र है। उन्होंने तर्क दिया कि ‘Not Negotiable’ लिखने से केवल चेक के ट्रांसफर होने की क्षमता सीमित होती है, लेकिन यह कर्ज या चेक जारी करने वाले की कानूनी जिम्मेदारी को खत्म नहीं करता।
हाईकोर्ट का विश्लेषण और टिप्पणी
हाईकोर्ट के सामने मुख्य सवाल यह था कि क्या ‘Not Negotiable’ मार्क किया गया चेक NI Act की धारा 138 के दायरे से बाहर है। न्यायमूर्ति जोशी ने स्पष्ट किया कि धारा 138 उन सभी चेकों पर लागू होती है जो किसी कानूनी देनदारी को चुकाने के लिए जारी किए जाते हैं। NI Act की धारा 6 में चेक की जो परिभाषा दी गई है, उसमें ‘Not Negotiable’ लिखे चेकों के लिए कोई छूट नहीं दी गई है।
हाईकोर्ट ने अपने फैसले में टिप्पणी की:
“चेक पर ‘Not Negotiable’ लिखे होने से वह अमान्य या अस्तित्वहीन नहीं हो जाता। यह केवल हस्तांतरी (transferee) को हस्तांतरणकर्ता से बेहतर शीर्षक प्राप्त करने से रोकता है, जैसा कि NI Act की धारा 130 में प्रावधान है। चेक का सम्मान करने की (honour करने की) देनदार की बाध्यता इससे प्रभावित नहीं होती।”
अदालत ने यह भी कहा कि याचिकाकर्ता ने जिस ‘दुर्गा शाह मोहाल लाल’ मामले का हवाला दिया, वह भी वास्तव में इसी कानूनी स्थिति का समर्थन करता है कि जब तक कानून द्वारा स्पष्ट रूप से मना न किया जाए, चेक एक परक्राम्य लिखत (negotiable instrument) बना रहता है। हाईकोर्ट ने ट्रायल कोर्ट के इस फैसले को सही ठहराया कि कर्ज कानूनी था या नहीं, यह सबूतों का विषय है जिसे ट्रायल के दौरान तय किया जाना चाहिए, न कि शुरुआती स्तर पर।
अदालत का निर्णय
मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने निष्कर्ष निकाला कि निचली अदालतों के आदेशों में कोई कानूनी त्रुटि नहीं है। अदालत ने दोहराया कि धारा 482 CrPC के तहत अपनी अंतर्निहित शक्तियों का प्रयोग केवल कानून के दुरुपयोग को रोकने या न्याय सुनिश्चित करने के लिए बहुत कम मामलों में किया जाना चाहिए। इस मामले में ऐसी कोई असाधारण परिस्थिति नहीं पाई गई।
इन्हीं टिप्पणियों के साथ अदालत ने डॉ. पटेल की याचिका को मेरिट के आधार पर खारिज कर दिया।
मामले का विवरण:
- केस शीर्षक: डॉ. संदीप पटेल बनाम अनिल कुमार गुप्ता
- केस संख्या: MISC. CRIMINAL CASE No. 21806 of 2024
- पीठ: न्यायमूर्ति हिमांशु जोशी

