हाईकोर्ट के राजपत्रित अधिकारियों को प्रतिपूरक अवकाश न देना मनमाना और अनुच्छेद 229 का उल्लंघन: केरल हाईकोर्ट

केरल हाईकोर्ट ने राज्य सरकार के उन आदेशों को रद्द कर दिया है जिनके तहत हाईकोर्ट के राजपत्रित अधिकारियों (Gazetted Officers) को प्रतिपूरक अवकाश (Compensatory Leave) देने से इनकार किया गया था। कोर्ट ने सरकार की इस कार्रवाई को “अवैध, मनमाना और भारत के संविधान के अनुच्छेद 229 का उल्लंघन” करार दिया है।

बुधवार को दिए गए एक फैसले में, न्यायमूर्ति एन. नागरेश ने केरल हाईकोर्ट राजपत्रित अधिकारी संघ द्वारा दायर रिट याचिका को स्वीकार करते हुए राज्य सरकार को निर्देश दिया कि वह संवैधानिक योजना और मुख्य न्यायाधीश की सिफारिशों के अनुरूप छूट के प्रस्ताव पर सख्ती से पुनर्विचार करे।

मामले की पृष्ठभूमि

इस कानूनी विवाद की शुरुआत 7 अक्टूबर 2022 के एक सरकारी आदेश (GO(P) No.123/2022/Fin) से हुई, जिसके द्वारा केरल सेवा नियमों (KSR) के भाग I के परिशिष्ट VII में संशोधन किया गया था। इस संशोधन में ‘कार्यालय प्रमुखों’ (Heads of Offices) के साथ-साथ “राजपत्रित अधिकारियों” को भी उन कर्मचारियों की श्रेणी में शामिल कर दिया गया जो प्रतिपूरक अवकाश के लिए पात्र नहीं हैं। इससे पहले, पद की परवाह किए बिना सभी अधिकारियों को सार्वजनिक छुट्टियों पर काम करने के बदले आराम सुनिश्चित करने के उपाय के रूप में प्रतिपूरक अवकाश उपलब्ध था।

याचिकाकर्ताओं का तर्क था कि हालांकि हाईकोर्ट के कर्मचारी केरल हाईकोर्ट सेवा नियम, 2007 द्वारा शासित होते हैं, लेकिन नियम 37(2) में यह प्रावधान है कि अवकाश के मामलों में KSR के प्रावधान लागू होंगे। संशोधन के बाद, हाईकोर्ट ने एक आधिकारिक ज्ञापन (Official Memorandum) जारी कर राजपत्रित अधिकारियों को प्रतिपूरक अवकाश देने की प्रथा को रद्द कर दिया था।

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न्यायपालिका में कर्तव्यों की विशिष्ट प्रकृति को देखते हुए, केरल हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश ने रजिस्ट्रार जनरल को सरकार से छूट मांगने का निर्देश दिया। रजिस्ट्रार जनरल ने 6 दिसंबर 2022 को एक पत्र भेजकर अनुरोध किया कि हाईकोर्ट के राजपत्रित अधिकारियों को इस प्रतिबंध से छूट दी जाए। सरकार ने 18 मई 2023 को एक पत्र के माध्यम से इस अनुरोध को खारिज कर दिया। अगस्त 2024 में हाईकोर्ट द्वारा किए गए एक और अनुरोध को भी सरकार ने 19 दिसंबर 2024 को इसी तरह खारिज कर दिया।

पक्षों की दलीलें

याचिकाकर्ता संघ ने तर्क दिया कि संशोधन ने हाईकोर्ट के राजपत्रित अधिकारियों द्वारा किए जाने वाले विस्तारित काम के घंटों और कर्तव्यों की अनदेखी की है। उन्होंने कहा कि ओणम और क्रिसमस जैसे अवकाशों के दौरान भी अधिकारियों को वेकेशन सिटिंग्स (vacation sittings) से संबंधित फाइलिंग, जांच, मामलों के आवंटन और तत्काल आदेशों की निगरानी करनी पड़ती है। उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि जहां सरकार ने स्वास्थ्य क्षेत्र को छूट दी है, वहीं मुख्य न्यायाधीश की सिफारिश के बावजूद हाईकोर्ट के अनुरोध को अनुचित तरीके से अस्वीकार कर दिया।

राज्य सरकार (प्रतिवादी 1-3) ने अपने निर्णय का बचाव करते हुए जवाबी हलफनामा दायर किया और कहा कि प्रतिपूरक अवकाश एक “अतिरिक्त लाभ” है और यह कोई अधिकार नहीं है। KSR भाग-I के नियम 14 पर भरोसा करते हुए, राज्य ने तर्क दिया कि “एक अधिकारी का पूरा समय सरकार के निपटान (disposal) पर होता है।” राज्य ने कहा कि राजपत्रित अधिकारियों के लिए प्रतिपूरक अवकाश बंद करना एक नीतिगत निर्णय था। यह भी कहा गया कि स्वास्थ्य क्षेत्र को केवल आपातकालीन सेवा होने के कारण छूट दी गई थी, जबकि राज्य योजना बोर्ड और खाद्य सुरक्षा विभाग सहित अन्य विभागों के अनुरोधों को खारिज कर दिया गया था।

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कोर्ट का विश्लेषण और अवलोकन

न्यायमूर्ति एन. नागरेश ने हाईकोर्ट की कार्यात्मक वास्तविकताओं का विश्लेषण किया और नोट किया कि वे “अन्य सरकारी विभागों से भौतिक रूप से भिन्न हैं।” कोर्ट ने देखा:

“प्रशासनिक और न्यायिक कार्य ओणम और क्रिसमस जैसी प्रमुख छुट्टियों के दौरान भी जारी रहते हैं। छुट्टियों के दौरान भी वेकेशन सिटिंग्स आयोजित की जाती हैं, जिनमें फाइलिंग, जांच, मामलों के आवंटन, आदेश जारी करने और यहां तक कि पेंडेंसी को निपटाने की पूरी प्रक्रिया की आवश्यकता होती है… हाईकोर्ट के राजपत्रित अधिकारियों को ऐसे सभी कर्तव्यों को पूरा करने के लिए पर्यवेक्षण, समन्वय और सुनिश्चित करना आवश्यक है।”

कोर्ट ने भारत के संविधान के अनुच्छेद 229 पर महत्वपूर्ण भरोसा जताया, जो मुख्य न्यायाधीश को अपने कर्मचारियों पर पूर्ण नियंत्रण देकर हाईकोर्ट की स्वतंत्रता को सुरक्षित करने के लिए बनाया गया है।

सुप्रीम कोर्ट के फैसलों हाईकोर्ट एम्प्लॉइज वेलफेयर एसोसिएशन बनाम पश्चिम बंगाल राज्य [(2004) 1 SCC 334] और भारत संघ बनाम एस.बी. वोहरा [(2004) 2 SCC 150] का हवाला देते हुए, कोर्ट ने दोहराया कि सरकार को सामान्य रूप से मुख्य न्यायाधीश के सुझावों को स्वीकार करना चाहिए और केवल “ठोस और पर्याप्त” कारणों से ही उनसे असहमत होना चाहिए।

सरकार के अस्वीकृति पत्रों (Exts.P4 और P6) की आलोचना करते हुए कोर्ट ने कहा:

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“सरकार ने हाईकोर्ट द्वारा उजागर की गई विशिष्ट चिंताओं पर ध्यान नहीं दिया… Ext.P6 में भी अनुरोध को खारिज करने का कोई कारण नहीं था।”

कोर्ट ने माना कि अनुच्छेद 229 के तहत नियंत्रण रखने वाले संवैधानिक प्राधिकारी से आने वाली सिफारिशों को कार्यपालिका द्वारा बिना मजबूत और पर्याप्त कारणों के “अनदेखा नहीं किया जा सकता”।

निर्णय

हाईकोर्ट ने रिट याचिका को स्वीकार करते हुए कहा कि प्रतिवादी मुख्य न्यायाधीश के इशारे पर किए गए अनुरोध को खारिज करने में उचित नहीं थे।

कोर्ट ने आदेश दिया:

“Exts.P4 और P6 संचार (communications) को रद्द किया जाता है। यह घोषित किया जाता है कि Ext.P1 के तहत हाईकोर्ट के राजपत्रित अधिकारियों को प्रतिपूरक अवकाश देने से इनकार करना अवैध, मनमाना और भारत के संविधान के अनुच्छेद 229 का उल्लंघन है।”

प्रतिवादी संख्या 1 से 3 को तीन महीने के भीतर हाईकोर्ट प्रतिष्ठान के प्रस्ताव पर पुनर्विचार करने का निर्देश दिया गया है।

मामले का विवरण:

  • मामले का शीर्षक: केरल हाईकोर्ट राजपत्रित अधिकारी संघ बनाम केरल राज्य और अन्य
  • मामला संख्या: डब्ल्यूपी (सी) संख्या 45866/2025
  • कोरम: न्यायमूर्ति एन. नागरेश
  • याचिकाकर्ता के वकील: श्री मैथ्यूज के. नेल्लुवेली, रेजी मैथ्यू एम., मैथ्यू वर्गीस, जोएल रेजी मैथ्यू, एंड्रयू मैथ्यूज
  • प्रतिवादियों के वकील: श्री पी.के. बाबू, विशेष सरकारी प्लीडर (वित्त); श्री अनीश जेम्स (हाईकोर्ट के लिए)

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