इलाहाबाद हाईकोर्ट का निर्देश: केवल अपील या पुनरीक्षण लंबित होने पर नहीं रुकेगा आरोप तय करने की प्रक्रिया, जब तक स्थगन आदेश न हो

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने साफ किया है कि उत्तर प्रदेश की निचली अदालतें किसी आरोपी की डिस्चार्ज (मुक्ति) याचिका खारिज होने के बाद केवल इस आधार पर आरोप तय करने की कार्यवाही को स्थगित नहीं कर सकतीं कि उच्च अदालत में पुनरीक्षण याचिका या अपील लंबित है, जब तक कि उस आदेश पर विशेष रूप से रोक न लगाई गई हो।

यह महत्वपूर्ण टिप्पणी न्यायमूर्ति चव्वन प्रकाश ने एक याचिका खारिज करते हुए की, जो कि 2004 के एक धोखाधड़ी के मामले में आरोपी सेवानिवृत्त सरकारी कर्मचारी अवनीश चंद्र श्रीवास्तव द्वारा दायर की गई थी। याचिका में उन्होंने कौशांबी के मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट (CJM) द्वारा उनकी डिस्चार्ज अर्जी खारिज किए जाने के आदेश को चुनौती दी थी।

हाईकोर्ट ने 8 जनवरी को दिए अपने आदेश में ट्रायल कोर्ट्स की उस प्रवृत्ति पर चिंता जताई जिसमें आरोप तय करने की कार्यवाही सिर्फ इसलिए टाल दी जाती है कि उच्च न्यायालय में कोई याचिका लंबित है, भले ही उस पर कोई स्थगन आदेश जारी न हुआ हो।

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“यह विधिक रूप से स्थापित सिद्धांत है कि केवल आपराधिक पुनरीक्षण या अपील दायर होने मात्र से यह नहीं माना जा सकता कि निचली अदालत की कार्यवाही पर रोक लग गई है,” कोर्ट ने कहा।

हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि अगर सत्र अदालत या मजिस्ट्रेट को आरोपी को डिस्चार्ज करने का कोई आधार नहीं मिला और उसकी याचिका खारिज कर दी गई है, तो जब तक उच्च अदालत से उस आदेश पर स्थगन नहीं मिलता, निचली अदालतों का यह वैधानिक दायित्व है कि वे आरोप तय करें।

कोर्ट के इस आदेश से स्पष्ट संकेत मिलता है कि अभियुक्तों द्वारा कार्यवाही टालने की प्रवृत्ति पर अंकुश लगेगा और आपराधिक मामलों में ट्रायल बिना अनावश्यक देरी के आगे बढ़ सकेंगे।

यह फैसला ट्रायल कोर्ट्स को यह याद दिलाता है कि प्रक्रिया को केवल लंबित याचिकाओं के आधार पर नहीं रोका जा सकता, जब तक कि विधिवत रूप से रोक का आदेश न हो।

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