सुप्रीम कोर्ट ने एक अहम फैसले में स्पष्ट किया है कि दंड प्रक्रिया संहिता (Cr.P.C.) की धारा 164 के तहत इकबालिया बयान (Confession) दर्ज करने से पहले आरोपी को यह बताना मजिस्ट्रेट का संवैधानिक कर्तव्य है कि उसे वकील से परामर्श करने और बचाव का अधिकार है। मोहम्मद अजमल मोहम्मद अमीर कसाब बनाम महाराष्ट्र राज्य के मामले में स्थापित नजीर का हवाला देते हुए, जस्टिस संजय कुमार और जस्टिस के. विनोद चंद्रन की पीठ ने मेघालय हाईकोर्ट द्वारा सुनाई गई हत्या की सजा को रद्द कर दिया और ट्रायल कोर्ट के बरी करने के आदेश को बहाल कर दिया।
कोर्ट ने कहा कि कानूनी सहायता प्रदान करने में विफलता और पुष्टि करने वाले अन्य ठोस सबूतों के अभाव ने कथित इकबालिया बयानों को अविश्वसनीय बना दिया।
मामले की पृष्ठभूमि
यह अपील मेघालय हाईकोर्ट के उस फैसले के खिलाफ दायर की गई थी, जिसमें हाईकोर्ट ने ट्रायल कोर्ट द्वारा दिए गए बरी करने के आदेश को पलट दिया था। यह मामला 18 फरवरी, 2006 को एक लापता छात्र की शिकायत से शुरू हुआ था, जो अपने कमरे पर नहीं लौटा था। पुलिस जांच के बाद अपीलकर्ता बर्नार्ड लिंगदोह फावा और एक अन्य को गिरफ्तार किया गया।
अभियोजन पक्ष का मामला मुख्य रूप से एक कब्रिस्तान से पीड़ित का शव बरामद होने, गला घोंटने के लिए कथित तौर पर इस्तेमाल की गई रस्सी की बरामदगी, फिरौती के लिए कॉल और पीड़ित के निजी सामान की बरामदगी पर आधारित था।
जबकि ट्रायल कोर्ट ने सबूतों को अपराध साबित करने के लिए अपर्याप्त मानते हुए आरोपियों को बरी कर दिया था, हाईकोर्ट ने अपील पर सुनवाई करते हुए उन्हें आईपीसी की धारा 302 (हत्या) और धारा 201 (साक्ष्य मिटाना) के तहत दोषी ठहराया था। हाईकोर्ट ने माना था कि परिस्थितिजन्य साक्ष्य के सिद्धांत संतुष्ट थे और परिस्थितियों की कड़ी पूरी थी।
पक्षों की दलीलें
अपीलकर्ताओं की ओर से तर्क दिया गया कि हाईकोर्ट ने ट्रायल कोर्ट के सुविचारित फैसले को बिना किसी ठोस आधार के पलट दिया। उन्होंने कहा कि पुलिस द्वारा पेश की गई “लास्ट सीन थ्योरी” (अंतिम बार साथ देखे जाने का सिद्धांत) वैध नहीं थी और मृत्यु का सटीक समय भी स्पष्ट नहीं था। बचाव पक्ष ने यह भी कहा कि इकबालिया बयान स्वैच्छिक नहीं थे और विरोधाभासों से भरे थे, तथा बरामद की गई रस्सी का अपराध से कोई फॉरेंसिक लिंक नहीं मिला था।
दूसरी ओर, राज्य सरकार ने दोषसिद्धि का बचाव करते हुए इकबालिया बयानों और बरामदगी का हवाला दिया। राज्य के वकील ने कसाब और मनोहरन के मामलों का उल्लेख करते हुए तर्क दिया कि एक स्वैच्छिक इकबालिया बयान, भले ही बाद में उससे मुकर जाया गया हो, सजा का आधार बन सकता है।
सुप्रीम कोर्ट का विश्लेषण और टिप्पणियां
कानूनी सहायता के बारे में सूचित करना मजिस्ट्रेट का कर्तव्य सुप्रीम कोर्ट ने इकबालिया बयान दर्ज करने की प्रक्रिया में हुई खामियों को गंभीरता से लिया। पीठ ने पाया कि जब आरोपियों को धारा 164 Cr.P.C. के तहत बयान दर्ज कराने के लिए मजिस्ट्रेट (PW32) के सामने पेश किया गया, तो उनसे कभी नहीं पूछा गया कि क्या उन्हें वकील की सहायता की आवश्यकता है।
मोहम्मद अजमल मोहम्मद अमीर कसाब बनाम महाराष्ट्र राज्य के फैसले का उल्लेख करते हुए, कोर्ट ने दोहराया कि जब किसी आरोपी को पहली बार मजिस्ट्रेट के सामने पेश किया जाता है, तो कानूनी सहायता का अधिकार उत्पन्न हो जाता है। कोर्ट ने कहा:
“हम यह मानते हैं कि जिस मजिस्ट्रेट के समक्ष किसी संज्ञेय अपराध के आरोपी को पहली बार पेश किया जाता है, उसका यह कर्तव्य और दायित्व है कि वह उसे पूरी तरह से जागरूक करे कि वकील से परामर्श करना और अपना बचाव करना उसका अधिकार है… इस कर्तव्य को निभाने में कोई भी विफलता कर्तव्य में लापरवाही मानी जाएगी।”
कोर्ट ने पाया कि मजिस्ट्रेट ने ऐसी कोई कानूनी सहायता प्रदान नहीं की, जिससे पूरी प्रक्रिया संदेह के घेरे में आ गई।
इकबालिया बयानों में विसंगतियां कोर्ट ने दर्ज बयानों में स्पष्ट विसंगतियां भी पाईं। रिकॉर्ड के अनुसार, आरोपी ने 8 मार्च, 2006 को बयान पर हस्ताक्षर किए थे, जबकि मजिस्ट्रेट ने 9 मार्च, 2006 को हस्ताक्षर किए थे। मजिस्ट्रेट जिरह के दौरान इस तारीख के अंतर का संतोषजनक जवाब नहीं दे सके। इसके अलावा, मुद्रित फॉर्म में लिखा था कि बयान खासी भाषा में है, लेकिन रिकॉर्ड में यह अंग्रेजी में था।
बयानों की प्रकृति बयानों के गुण-दोष पर विचार करते हुए, कोर्ट ने देखा कि पहले आरोपी (A1) का बयान खुद को बचाने वाला (exculpatory) था और उसने सारा दोष सह-आरोपी पर मढ़ दिया था। वहीं, दूसरे आरोपी (A2) ने केवल यह स्वीकार किया था कि मृतक ने उसकी गोद में दम तोड़ा, जो अपराध की स्वीकृति नहीं है। कांडा पांड्याची मामले का हवाला देते हुए कोर्ट ने कहा कि जो बयान अपराध की पूर्ण स्वीकृति नहीं है, उसे इकबालिया बयान नहीं माना जा सकता।
चिकित्सीय और परिस्थितिजन्य साक्ष्य इकबालिया बयानों के अलावा, कोर्ट ने अन्य सबूतों को भी कमजोर पाया:
- मेडिकल साक्ष्य: डॉक्टर ने स्वीकार किया कि मौत फांसी लगाने से आत्महत्या भी हो सकती है, क्योंकि लैरिंक्स (larynx) सुरक्षित था और गला घोंटने के सामान्य लक्षण नदारद थे। इसलिए, यह हत्या का निश्चित मामला साबित नहीं होता।
- लास्ट सीन थ्योरी: कोर्ट ने कहा कि यह सिद्धांत पूरी तरह विफल रहा क्योंकि किसी भी गवाह ने मृत्यु से ठीक पहले मृतक को आरोपियों के साथ नहीं देखा था।
- बरामदगी: रस्सी अपराध स्थल पर खुले में मिली थी और फॉरेंसिक जांच में उस पर कोई मानव त्वचा या बाल नहीं मिले।
फैसला
सुप्रीम कोर्ट ने निष्कर्ष निकाला कि अन्य सबूतों से पुष्टि न होने और प्रक्रियात्मक त्रुटियों के कारण इकबालिया बयानों के आधार पर सजा नहीं दी जा सकती। पीठ ने माना कि हाईकोर्ट ने बरी करने के आदेश को पलटने में गलती की थी।
नतीजतन, सुप्रीम कोर्ट ने मेघालय हाईकोर्ट के फैसले को रद्द कर दिया और ट्रायल कोर्ट के उस आदेश को बहाल कर दिया जिसमें आरोपियों को बरी किया गया था। कोर्ट ने अपीलकर्ताओं को तत्काल रिहा करने का निर्देश दिया।
केस डीटेल्स:
- केस टाइटल: बर्नार्ड लिंगदोह फावा बनाम मेघालय राज्य
- केस नंबर: क्रिमिनल अपील नंबर 3738 ऑफ 2023
- कोरम: जस्टिस संजय कुमार और जस्टिस के. विनोद चंद्रन

