कर्नाटक हाईकोर्ट ने 3.5 साल के बच्चे की हत्या के दोषी की दोषसिद्धि (conviction) को बरकरार रखा है, लेकिन उसकी सजा में महत्वपूर्ण संशोधन किया है। हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि सत्र न्यायालयों (Sessions Courts) के पास ‘प्राकृतिक मृत्यु तक’ (until natural death) आजीवन कारावास की सजा सुनाने की शक्ति नहीं है।
न्यायमूर्ति एच.पी. संदेश और न्यायमूर्ति वेंकटेश नाइक टी. की खंडपीठ ने अपने फैसले में कहा कि बिना किसी छूट (remission) के आजीवन कारावास की सजा देने का अधिकार केवल संवैधानिक न्यायालयों (सुप्रीम कोर्ट और हाईकोर्ट) को है, सत्र न्यायालयों को नहीं। इस आधार पर, पीठ ने अपीलकर्ता रुद्रेश उर्फ रुद्रैया की सजा को ‘प्राकृतिक मृत्यु तक कारावास’ से संशोधित कर सामान्य ‘आजीवन कारावास’ में बदल दिया।
मामले की पृष्ठभूमि
यह मामला अप्रैल 2017 में शिवमोग्गा जिले के होसनगरा तालुक स्थित मूलेगड्डे मठ में हुई एक दुखद घटना से संबंधित है। शिकायतकर्ता (PW1) अपने बेटे सृजय और अन्य रिश्तेदारों के साथ नए स्वामीजी के राज्याभिषेक समारोह में शामिल होने के लिए मठ गई थीं।
आरोपी रुद्रेश, जो मठ के स्वामीजी (PW15) का रिश्तेदार था, मठ में सेवा करता था। अभियोजन पक्ष के अनुसार, आरोपी का व्यवहार ठीक नहीं था और वह भक्तों का सामान चोरी करता था। शिकायतकर्ता और उनके परिवार ने उसे कई बार इस बारे में समझाया और डांटा था, जिसके कारण आरोपी उनसे रंजिश रखने लगा था।
10 अप्रैल 2017 की रात को शिकायतकर्ता और उनका परिवार भोजन के बाद मठ में सो गया। अगली सुबह बच्चा गायब मिला। परिवार के कई सदस्यों ने उनींदापन और तबीयत खराब होने की शिकायत की। तलाश करने पर आरोपी पर शक हुआ क्योंकि पूछताछ के दौरान वह चुप रहा। बाद में पुलिस ने आरोपी को गिरफ्तार किया और उसकी निशानदेही पर बच्चे का शव एक नदी से बरामद किया गया।
सागर में स्थित पंचम अतिरिक्त जिला एवं सत्र न्यायाधीश, शिवमोग्गा ने 27 नवंबर 2017 को रुद्रेश को आईपीसी की धारा 302 (हत्या) और धारा 364 के तहत दोषी ठहराया था। ट्रायल कोर्ट ने उसे आजीवन कारावास की सजा सुनाते हुए यह शर्त जोड़ी थी कि उसे “अपनी प्राकृतिक मृत्यु तक जेल में रहना होगा।”
पक्षों की दलीलें
बचाव पक्ष
अपीलकर्ता की ओर से पेश अधिवक्ता सुनील कुमार एस. ने तर्क दिया कि यह मामला पूरी तरह से परिस्थितिजन्य साक्ष्यों (circumstantial evidence) पर आधारित है और कोई प्रत्यक्षदर्शी गवाह नहीं है। उन्होंने दलील दी कि साक्ष्यों की कड़ी पूरी नहीं होती है। मुख्य तर्क थे:
- शव की बरामदगी एक खुली और सुलभ जगह से हुई थी, जिसके लिए उन्होंने सुप्रीम कोर्ट के पुताई बनाम उत्तर प्रदेश राज्य (2025) के फैसले का हवाला दिया।
- अभियोजन पक्ष के गवाह हितबद्ध (interested parties) थे।
- एफएसएल (FSL) रिपोर्ट में मृत बच्चे के शरीर में क्लोनाज़ेपैम (नींद की गोलियां) मिलीं, लेकिन परिवार के अन्य सदस्यों के लिए रिपोर्ट नेगेटिव आई, जिन्होंने कथित तौर पर वही जहरीला भोजन किया था।
- किरण बनाम कर्नाटक राज्य (2025) मामले का हवाला देते हुए, वकील ने तर्क दिया कि सत्र न्यायालय के पास शेष प्राकृतिक जीवन के लिए कारावास की सजा देने का अधिकार नहीं था।
अभियोजन पक्ष
राज्य लोक अभियोजक रजत सुब्रमण्य ने तर्क दिया कि परिस्थितिजन्य साक्ष्यों की कड़ी पूरी तरह से स्थापित है। उन्होंने निम्नलिखित बिंदु रखे:
- मकसद (Motive): गवाह PW1, PW2, PW4, PW11 और PW15 ने लगातार गवाही दी कि आरोपी को डांटने-फटकारने के कारण वह शिकायतकर्ता के परिवार से नफरत करता था।
- तैयारी (Preparation): मेडिकल शॉप के मालिक (PW9) ने पुष्टि की कि आरोपी ने क्लोनाज़ेपैम गोलियां खरीदी थीं।
- बरामदगी (Recovery): साक्ष्य अधिनियम की धारा 27 के तहत आरोपी की निशानदेही पर शव बरामद किया गया, जो केवल उसे ही पता था।
- चिकित्सीय साक्ष्य: पोस्टमार्टम और एफएसएल रिपोर्ट से पुष्टि हुई कि मौत क्लोनाज़ेपैम के जहर और डूबने से हुई थी।
कोर्ट की टिप्पणियाँ और विश्लेषण
हाईकोर्ट ने साक्ष्यों का विस्तृत पुनर्मूल्यांकन किया।
परिस्थितिजन्य साक्ष्य पर
कोर्ट ने पाया कि अभियोजन पक्ष ने परिस्थितिजन्य साक्ष्यों पर आधारित मामले में सबूत के “पांच स्वर्णिम सिद्धांतों” (पंचशील) को सफलतापूर्वक स्थापित किया है।
- मकसद: कोर्ट ने नोट किया, “PW1, PW2, PW4, PW11 और PW15 के साक्ष्यों पर विचार करने के बाद, यह स्पष्ट है कि आरोपी PW1 और PW2 के प्रति नफरत रखता था। अभियोजन ने हत्या के मकसद को साबित कर दिया है।”
- तैयारी: कोर्ट ने मेडिकल शॉप के मालिक (PW9) की गवाही और गोलियों (MO3) की बरामदगी पर भरोसा जताया। कोर्ट ने कहा, “PW9 का साक्ष्य बहुत स्पष्ट है कि आरोपी ने ही क्लोनाज़ेपैम 0.5 मिलीग्राम खरीदा था। ये साक्ष्य तैयारी के संबंध में बहुत स्पष्ट हैं।”
साक्ष्य अधिनियम की धारा 27 के तहत बरामदगी पर
शव की बरामदगी के संबंध में बचाव पक्ष की दलील पर कोर्ट ने कहा कि मौजूदा मामले के तथ्य उद्धृत किए गए फैसलों से अलग हैं। पीठ ने पाया कि शव मठ के पीछे एक सुनसान धारा (stream) में मिला था, जो पेड़ों से घिरा था और आम जनता को दिखाई नहीं देता था। कोर्ट ने कहा: “यह बहुत स्पष्ट है कि आरोपी द्वारा स्वयं जानकारी देने पर, दो पंच गवाहों को सुरक्षित किया गया… और उसने शव दिखाया… बरामदगी के संबंध में साक्ष्य अधिनियम की धारा 27 के सिद्धांत इस मामले में साबित होते हैं।”
सत्र न्यायालय की सजा सुनाने की शक्तियां
कोर्ट द्वारा संबोधित सबसे महत्वपूर्ण कानूनी बिंदु ट्रायल कोर्ट द्वारा दी गई “प्राकृतिक जीवन” (natural life) की सजा की वैधता थी। पीठ ने किरण बनाम कर्नाटक राज्य (2025) में सुप्रीम कोर्ट के फैसले का उल्लेख किया।
कोर्ट ने कहा: “बिना किसी छूट (remission) के आजीवन कारावास की सजा देने की शक्ति केवल संवैधानिक न्यायालयों (Constitutional Courts) को दी गई थी, सत्र न्यायालयों को नहीं।”
पीठ ने आगे कहा: “इसलिए, यह बहुत स्पष्ट है कि विशिष्ट सजा को देखते हुए Cr.P.C. की धारा 428 का आह्वान नहीं किया जा सकता है और जब शेष जीवन के लिए आजीवन कारावास लगाया जाता है तो आरोपी को किसी भी छूट की मांग करने का कोई अधिकार नहीं मिलता है। इसलिए, सत्र न्यायालय Cr.P.C. की धारा 428 के तहत प्रदान किए गए सेट ऑफ के लाभ को प्रतिबंधित नहीं कर सकता है।”
निर्णय
कर्नाटक हाईकोर्ट ने निष्कर्ष निकाला कि धारा 302 आईपीसी के तहत दोषसिद्धि साक्ष्यों पर आधारित और सही थी, लेकिन सजा में संशोधन की आवश्यकता है।
कोर्ट ने आदेश दिया: “दोषसिद्धि का निर्णय दिनांक 27.11.2017… की पुष्टि की जाती है। हालांकि, सजा को संशोधित किया जाता है और ‘प्राकृतिक मृत्यु तक’ आजीवन कारावास को रद्द कर सामान्य ‘आजीवन कारावास’ में बदला जाता है।”
अपील को सजा में संशोधन की सीमा तक आंशिक रूप से स्वीकार किया गया।
केस डीटेल्स:
- केस टाइटल: रुद्रेश उर्फ रुद्रैया बनाम कर्नाटक राज्य
- केस नंबर: क्रिमिनल अपील नंबर 69/2018
- कोरम: न्यायमूर्ति एच.पी. संदेश और न्यायमूर्ति वेंकटेश नाइक टी.
- अपीलकर्ता के वकील: श्री सुनील कुमार एस.
- प्रतिवादी के वकील: श्री रजत सुब्रमण्य, एचसीजीपी

