सुप्रीम कोर्ट में एक याचिका दायर कर विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (UGC) के वर्ष 2026 में अधिसूचित नियमों को चुनौती दी गई है। याचिकाकर्ता ने आरोप लगाया है कि इन नियमों में जाति-आधारित भेदभाव की परिभाषा को सीमित रखा गया है, जिससे ‘जनरल’ या गैर-आरक्षित वर्ग के छात्रों और शिक्षकों को संस्थागत संरक्षण से वंचित कर दिया गया है।
यह याचिका अधिवक्ता विनीत जिंदल ने दायर की है। उन्होंने UGC (Promotion of Equity in Higher Education Institutions) Regulations, 2026 की धारा 3(ग) को चुनौती दी है, जिसमें जाति-आधारित भेदभाव को केवल अनुसूचित जाति (SC), अनुसूचित जनजाति (ST), और अन्य पिछड़ा वर्ग (OBC) तक सीमित कर दिया गया है।
याचिका में कहा गया है कि यह परिभाषा संविधान के अनुच्छेद 14 (समानता का अधिकार), अनुच्छेद 15(1) (धर्म, जाति, लिंग, आदि के आधार पर भेदभाव निषेध), और अनुच्छेद 21 (जीवन और गरिमा का अधिकार) का उल्लंघन करती है।
याचिकाकर्ता के अनुसार, “UGC द्वारा केवल आरक्षित वर्गों को संरक्षण देना एक तरह का ‘संरक्षण का वर्गीकरण’ है जो असंवैधानिक है।” याचिका में यह भी कहा गया है कि ‘जनरल’ वर्ग के लोगों को भी जातिगत पहचान के कारण भेदभाव का सामना करना पड़ सकता है, लेकिन उन्हें कोई संस्थागत शिकायत निवारण व्यवस्था उपलब्ध नहीं है।
याचिका में सुप्रीम कोर्ट से अनुरोध किया गया है कि जब तक नियम की समीक्षा नहीं होती, तब तक इसे लागू करने से रोका जाए। साथ ही, यह भी मांग की गई है कि “Equal Opportunity Centres”, “Equity Helplines”, और “Ombudsperson” जैसी व्यवस्थाएं सभी छात्रों के लिए बिना किसी भेदभाव के सुलभ कराई जाएं।
याचिकाकर्ता ने कोर्ट से आग्रह किया है कि जाति आधारित भेदभाव की परिभाषा को ‘जाति-निरपेक्ष और संवैधानिक रूप से उपयुक्त’ रूप में फिर से निर्धारित किया जाए ताकि कोई भी व्यक्ति जो जातिगत भेदभाव का शिकार हो रहा हो, वह संरक्षण और न्याय की मांग कर सके—चाहे वह किसी भी जाति से संबंधित हो।

