इलाहाबाद हाईकोर्ट ने निष्पादन कार्यवाही (Execution Proceedings) को चुनौती देने वाली किराएदारों की याचिका को खारिज कर दिया है। कोर्ट ने निष्पादन न्यायालय को निर्देश दिया है कि वह पुलिस बल की सहायता से बेदखली के आदेश का तत्काल पालन सुनिश्चित करे। कोर्ट ने पाया कि किराएदार ने पूर्व में दी गई मोहलत की शर्तों का पालन न करके और अंडरटेकिंग (शपथ पत्र) दाखिल न करके न्यायालय की अवमानना की है।
मामले की पृष्ठभूमि
यह विवाद मकान मालकिन श्रीमती विद्या देवी द्वारा उत्तर प्रदेश अधिनियम संख्या 13, 1972 की धारा 21(1)(a) के तहत दुकान खाली कराने के लिए दायर किए गए वाद से शुरू हुआ था। विहित प्राधिकारी/सिविल जज (सीनियर डिवीजन), जालौन (उरई) ने 6 अक्टूबर 2023 को रिलीज एप्लीकेशन स्वीकार करते हुए दुकान खाली करने का आदेश दिया था।
याची नीरज उस्ता और अन्य ने इस आदेश के खिलाफ अपील की, लेकिन 11 जुलाई 2024 को अपर जिला जज/विशेष न्यायाधीश (डीएए), जालौन ने उनकी अपील खारिज कर दी।
इसके बाद मामला हाईकोर्ट पहुंचा (रिट-ए संख्या 12382/2024)। 20 अगस्त 2024 को हाईकोर्ट ने मकान मालकिन की सहमति से याचिका का निस्तारण किया था। कोर्ट ने किराएदारों को 19 अगस्त 2025 तक दुकान खाली करने और कब्जा सौंपने का समय दिया था। यह राहत इस विशिष्ट शर्त पर दी गई थी कि वे तीन सप्ताह के भीतर निचली अदालत में एक अंडरटेकिंग दाखिल करेंगे कि वे संपत्ति में कोई थर्ड पार्टी इंटरेस्ट (तीसरे पक्ष का हित) नहीं बनाएंगे और शांतिपूर्ण कब्जा सौंप देंगे।
इसके बाद, अन्य याचिकाकर्ताओं (संख्या 5 और 6) द्वारा दायर एक अन्य याचिका (रिट-ए संख्या 15793/2024) का भी निस्तारण 18 अक्टूबर 2024 को समान शर्तों पर किया गया था।
दलीलें और कार्यवाही
जब किराएदारों ने निष्पादन कार्यवाही को चुनौती देते हुए पुनः हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया, तो मामला 1 दिसंबर 2025 को सुनवाई के लिए आया। मकान मालकिन के वकील ने कोर्ट को सूचित किया कि किराएदारों ने निचली अदालत के समक्ष आवश्यक अंडरटेकिंग दाखिल नहीं की है। इसके विपरीत, किराएदारों के वकील ने शुरू में कहा कि उनकी जानकारी के अनुसार अंडरटेकिंग दी गई थी।
हालांकि, 17 दिसंबर 2025 को हुई सुनवाई के दौरान, याचिकाकर्ताओं के विद्वान वकील ने स्वीकार किया कि “निचली अदालत के समक्ष कोई अंडरटेकिंग प्रस्तुत नहीं की गई थी।” उन्होंने यह भी बताया कि अवमानना की कार्यवाही पहले से ही न्यायालय के समक्ष लंबित है।
कोर्ट का विश्लेषण और टिप्पणी
मामले की सुनवाई कर रहे न्यायमूर्ति रोहित रंजन अग्रवाल ने याचिकाकर्ताओं के आचरण को गंभीरता से लिया। कोर्ट ने कहा कि 20 अगस्त 2024 के आदेश के तहत दी गई सुरक्षा पूरी तरह से निर्धारित समय के भीतर अंडरटेकिंग दाखिल करने की शर्त पर आधारित थी।
कोर्ट ने अपनी टिप्पणी में कहा:
“यह न्यायालय पाता है कि याचिकाकर्ता रिट कोर्ट के दिनांक 20.08.2024 के आदेशों की अवमानना कर रहा है, क्योंकि उसने विवादित परिसर को खाली नहीं किया है, जबकि रिट कोर्ट ने उसे केवल इस शर्त पर समय दिया था कि वह आदेश की प्रमाणित प्रति प्राप्त होने के तीन सप्ताह के भीतर निचली अदालत में अंडरटेकिंग प्रस्तुत करेगा।”
कोर्ट ने आगे कहा कि याचिकाकर्ता ने न केवल निचली अदालत में अंडरटेकिंग न देकर बल्कि 19 अगस्त 2025 तक परिसर खाली न करके भी अवमानना की है, क्योंकि उसे दुकान खाली करने के लिए ही समय दिया गया था।
निर्णय
हाईकोर्ट ने माना कि निष्पादन कार्यवाही को चुनौती देने वाली यह रिट याचिका पोषणीय (maintainable) नहीं है और इसे खारिज कर दिया।
बेदखली के आदेशों का पालन सुनिश्चित करने के लिए, कोर्ट ने निष्पादन न्यायालय को निम्नलिखित निर्देश जारी किए:
“निष्पादन न्यायालय को निर्देश दिया जाता है कि वह विहित प्राधिकारी द्वारा 06.10.2023 को पारित आदेश और रेंट अपील संख्या 04/2023 में पारित 11.07.2024 के आदेश का तत्काल निष्पादन करे। यह भी प्रावधान किया जाता है कि निष्पादन न्यायालय दुकान को तत्काल खाली कराने के लिए आवश्यक पुलिस बल उपलब्ध कराने का निर्देश देगा।”
केस डिटेल्स:
- केस टाइटल: नीरज उस्ता और 6 अन्य बनाम श्रीमती विद्या देवी
- केस नंबर: मैटर्स अंडर आर्टिकल 227 नंबर 14978 ऑफ 2025
- कोरम: न्यायमूर्ति रोहित रंजन अग्रवाल
- याची के वकील: कौशलेंद्र नाथ सिंह, सार्थक सिन्हा
- प्रतिवादी के वकील: धीरेंद्र श्रीवास्तव

