BNSS के तहत निवारक गिरफ्तारी में वैधानिक सुरक्षा उपायों का पालन अनिवार्य; अवैध हिरासत पर हाईकोर्ट ने दिया 1 लाख रुपये का मुआवजा

व्यक्तिगत स्वतंत्रता की पवित्रता और पुलिस की शक्तियों की सीमा को रेखांकित करते हुए, छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने फैसला सुनाया है कि भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS), 2023 के तहत ‘निवारक गिरफ्तारी’ (Preventive Arrest) को वैधानिक सुरक्षा उपायों और संवैधानिक आवश्यकताओं के पूर्णतः अनुरूप होना चाहिए।

मुख्य न्यायाधीश रमेश सिन्हा और न्यायमूर्ति रविंद्र कुमार अग्रवाल की खंडपीठ ने स्पष्ट किया कि किसी संज्ञेय अपराध (Cognizable Offence) के पंजीकरण के बिना, गिरफ्तार व्यक्ति को गिरफ्तारी के आधार बताए बिना, और बिना विवेक का प्रयोग किए ‘मशीनी तरीके’ (Mechanical Manner) से रिमांड पर भेजना भारत के संविधान के अनुच्छेद 21 और 22(1) का उल्लंघन है।

कोर्ट ने इस तरह की अवैध हिरासत को कार्यवाही रद्द करने और सार्वजनिक कानून उपाय (Public Law Remedy) के रूप में मुआवजा देने का पर्याप्त आधार माना। अदालत ने राज्य सरकार को याचिकाकर्ता को 1,00,000 रुपये (एक लाख रुपये) का मुआवजा देने का निर्देश दिया है।

कानूनी मुद्दा और निर्णय

हाईकोर्ट के समक्ष मुख्य कानूनी सवाल यह था कि क्या पुलिस BNSS की धारा 170 (CrPC की धारा 151 के अनुरूप) के तहत गिरफ्तारी के आधार का खुलासा किए बिना किसी व्यक्ति को गिरफ्तार कर सकती है और क्या मजिस्ट्रेट हिरासत की आवश्यकता के बारे में खुद को संतुष्ट किए बिना ऐसे व्यक्ति को रिमांड पर भेज सकते हैं।

हाईकोर्ट ने इसका उत्तर नकारात्मक दिया। पीठ ने कहा कि BNSS की धारा 35 गिरफ्तारी की शक्ति एक “निवारक उपाय के रूप में देती है, न कि दंडात्मक उपाय के रूप में।” कोर्ट ने फैसला सुनाया कि धारा 35(3) के तहत उपस्थिति का नोटिस जारी करने में विफलता और लिखित रूप में गिरफ्तारी के आधार प्रदान न करना गिरफ्तारी को अवैध बनाता है। परिणामस्वरूप, कोर्ट ने 8 सितंबर, 2025 के आदेश, ‘इस्तगासा’ और आपराधिक मामला संख्या 1379/2025 की सभी आगामी कार्यवाही को रद्द कर दिया।

मामले की पृष्ठभूमि

याचिकाकर्ता, आकाश कुमार साहू, जो एक कानून का छात्र है और भिलाई में एक होटल का मालिक है, ने अपनी गिरफ्तारी और उसके बाद की हिरासत को चुनौती देते हुए रिट याचिका दायर की थी।

  • घटना: 8 सितंबर, 2025 को पुलिस चौकी स्मृति नगर के पुलिस अधिकारी एक गुमशुदा व्यक्ति की पूछताछ के संबंध में याचिकाकर्ता के होटल गए थे। बाद में, होटल कर्मचारियों पर चोरी का आरोप लगाते हुए पुलिस वापस आई।
  • गिरफ्तारी: याचिकाकर्ता का आरोप था कि होटल पहुंचने पर उसे गाली दी गई, अपमानित किया गया और जबरन पुलिस स्टेशन ले जाकर पीटा गया। उसे BNSS की धारा 170 के तहत गिरफ्तार किया गया और BNSS की धारा 126 और 135 के तहत कार्यवाही शुरू की गई।
  • रिमांड: उसे उप-मंडल मजिस्ट्रेट (SDM), दुर्ग के समक्ष पेश किया गया, जिन्होंने उसे न्यायिक हिरासत में भेज दिया। अगले दिन उसे जमानत मिल गई। याचिकाकर्ता का कहना था कि उसे गिरफ्तारी के कारणों के बारे में कभी सूचित नहीं किया गया।
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पक्षों की दलीलें

याचिकाकर्ता का तर्क: अधिवक्ता श्री धीरज कुमार वानखेड़े ने तर्क दिया कि पूरी कार्रवाई मनमानी और अवैध थी:

  1. कोई मूल अपराध नहीं: याचिकाकर्ता के खिलाफ किसी भी संज्ञेय अपराध के लिए कोई एफआईआर (FIR) दर्ज नहीं की गई थी। गिरफ्तारी केवल कथित कहासुनी के संदेह पर आधारित थी।
  2. BNSS का उल्लंघन: पुलिस ने उपस्थिति का नोटिस जारी करने के संबंध में BNSS की धारा 35(3) के अनिवार्य प्रावधान की अनदेखी की।
  3. संवैधानिक उल्लंघन: याचिकाकर्ता को गिरफ्तारी के आधार नहीं बताए गए, जो अनुच्छेद 21 और 22(1) का उल्लंघन है। वकील ने सुप्रीम कोर्ट के मिहिर राजेश शाह बनाम महाराष्ट्र राज्य (2025) के फैसले का हवाला देते हुए तर्क दिया कि गिरफ्तारी के आधार लिखित रूप में सूचित किए जाने चाहिए।
  4. यांत्रिक रिमांड: मजिस्ट्रेट ने गिरफ्तारी की वैधता की पुष्टि किए बिना मशीनी तरीके से BNSS की धारा 187 (रिमांड) के तहत शक्ति का प्रयोग किया।
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राज्य का बचाव: महाधिवक्ता श्री विवेक शर्मा ने तर्क दिया कि पुलिस ने शांति भंग को रोकने के लिए कार्रवाई की:

  1. कर्तव्य में बाधा: राज्य का आरोप था कि गुमशुदा व्यक्ति की जांच के दौरान याचिकाकर्ता ने पुलिस के साथ बहस की, वाहन की चाबियां छीनीं और ड्राइवर के साथ मारपीट की।
  2. निवारक कार्रवाई: स्थिति को देखते हुए धारा 170 BNSS के तहत निवारक गिरफ्तारी आवश्यक थी।
  3. सूचना: राज्य ने दावा किया कि याचिकाकर्ता के पिता को मोबाइल के माध्यम से गिरफ्तारी की सूचना दी गई थी।
  4. जमानत: यह तर्क दिया गया कि याचिकाकर्ता को जेल इसलिए भेजा गया क्योंकि वह गिरफ्तारी की तारीख पर जमानत बांड प्रस्तुत करने में विफल रहा था।

कोर्ट का विश्लेषण और अवलोकन

हाईकोर्ट ने पुलिस रिपोर्ट (इस्तगासा) और वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक, दुर्ग द्वारा दायर शपथ पत्र की बारीकी से जांच की।

1. निवारक गिरफ्तारी और वैधानिक सुरक्षा उपाय: पीठ ने कहा कि BNSS की धारा 35 सख्त सुरक्षा उपायों से बंधी है।

“इस प्रावधान का उद्देश्य … नियमित या मशीनी गिरफ्तारी को अधिकृत करना नहीं है। इसके अलावा, BNSS, 2023 की धारा 35(3) पुलिस अधिकारी के लिए उन मामलों में उपस्थिति का नोटिस जारी करना अनिवार्य बनाती है जहां गिरफ्तारी आवश्यक नहीं है। … इस वैधानिक जनादेश का पालन करने में विफलता गिरफ्तारी को ही दूषित कर देती है।”

2. गिरफ्तारी के आधार (मिहिर राजेश शाह मामले पर भरोसा): कोर्ट ने नोट किया कि गिरफ्तारी मेमो में याचिकाकर्ता की हस्तलिखित टिप्पणी थी: “I don’t know the matter” (मुझे मामले की जानकारी नहीं है)

“केवल परिवार के किसी सदस्य को गिरफ्तारी के बारे में सूचित करना संविधान और कानून के तहत गिरफ्तार व्यक्ति को स्वयं गिरफ्तारी के आधार सूचित करने की आवश्यकता का अनुपालन नहीं है… वर्तमान मामले में, राज्य के शपथ पत्र में यह दिखाने के लिए कोई भी बात नहीं है कि याचिकाकर्ता को लिखित रूप में गिरफ्तारी के आधार कभी भी प्रदान किए गए थे।”

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3. मशीनी रिमांड: कोर्ट ने ‘न्यायिक प्रहरी’ (Judicial Sentinel) के रूप में अपने कर्तव्य का निर्वहन न करने के लिए एसडीएम की आलोचना की।

“वर्तमान मामले में, जहां कोई एफआईआर दर्ज नहीं की गई थी और कोई अपराध प्रकट नहीं किया गया था, याचिकाकर्ता को न्यायिक हिरासत में भेजना संवैधानिक जनादेश की पूर्ण अवहेलना में शक्ति का एक मशीनी प्रयोग दर्शाता है… मजिस्ट्रेट को एक न्यायिक प्रहरी के रूप में कार्य करने की आवश्यकता थी, जिस कर्तव्य का, दुर्भाग्य से, निर्वहन नहीं किया गया।”

4. मुआवजे पर: डी.के. बसु बनाम पश्चिम बंगाल राज्य का हवाला देते हुए, कोर्ट ने माना कि याचिकाकर्ता को गंभीर मानसिक और वित्तीय कठिनाई का सामना करना पड़ा।

“उपर्युक्त तथ्यों का संचयी प्रभाव स्पष्ट रूप से स्थापित करता है कि याचिकाकर्ता को अवैध गिरफ्तारी, गैरकानूनी हिरासत और अनुचित कारावास का शिकार होना पड़ा… गरिमा के साथ स्वतंत्रता अनुच्छेद 21 का सार है।”

निर्णय

हाईकोर्ट ने रिट याचिका को स्वीकार करते हुए निम्नलिखित निर्देश जारी किए:

  1. रद्दीकरण: 08.09.2025 का आदेश और आपराधिक मामला संख्या 1379/2025 की सभी कार्यवाही रद्द कर दी गई।
  2. मुआवजा: राज्य को चार सप्ताह के भीतर याचिकाकर्ता को 1,00,000/- रुपये का भुगतान करने का निर्देश दिया गया।
  3. ब्याज: यदि भुगतान में देरी होती है तो 9% प्रति वर्ष की दर से ब्याज लागू होगा।
  4. जवाबदेही: राज्य को उचित जांच के बाद दोषी अधिकारियों से राशि वसूलने की स्वतंत्रता दी गई।

केस विवरण

  • केस टाइटल: आकाश कुमार साहू बनाम छत्तीसगढ़ राज्य व अन्य
  • केस नंबर: डब्ल्यूपीसीआर (WPCR) नंबर 553 ऑफ 2025
  • पीठ: मुख्य न्यायाधीश रमेश सिन्हा और न्यायमूर्ति रविंद्र कुमार अग्रवाल

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