मृत पति की संपत्ति पर पत्नी का पहला अधिकार, नामांकन से उत्तराधिकार कानून की अवहेलना नहीं हो सकती: उड़ीसा हाईकोर्ट


उड़ीसा हाईकोर्ट ने एक महत्त्वपूर्ण फैसले में स्पष्ट किया है कि किसी भी बैंक या बीमा पॉलिसी में नामांकित व्यक्ति को लाभ पहुंचाने की व्यवस्था, विधिक उत्तराधिकारियों के अधिकारों को नहीं हटा सकती। अदालत ने कहा कि हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम की धारा 8 के तहत, पति की मृत्यु के बाद पत्नी को पहली श्रेणी के उत्तराधिकारी (Class-I heir) के रूप में उसके सम्पत्ति पर पहला अधिकार प्राप्त होता है।

न्यायमूर्ति बिरजा प्रसन्न सतपथी ने यह फैसला सुनाते हुए कहा कि यदि कोई पुरुष हिंदू बिना वसीयत के मरता है, तो उसकी संपत्ति सबसे पहले पहली श्रेणी के उत्तराधिकारियों को ही हस्तांतरित होती है — चाहे मृतक ने अपने बैंक या बीमा दस्तावेज़ों में किसी और को नामांकित क्यों न किया हो।

यह मामला स्निग्धा पटनायक का है, जिनके पति सुभ्रांशु मोहंती, केनरा बैंक में कार्यरत थे और जिनकी मृत्यु 18 सितंबर 2023 को हो गई, जबकि उनके द्वारा शुरू की गई तलाक की कार्यवाही अभी लंबित थी। दोनों ने 2014 में विवाह किया था और उनकी एक बेटी है।

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पति की मृत्यु के बाद बैंक ने उनका अंतिम सेवा लाभ ₹62.90 लाख निर्धारित किया, जिसमें से ₹22.16 लाख ऋण की अदायगी के बाद ₹40.74 लाख मृतक की मां सुसमा मोहंती के खाते में स्थानांतरित कर दिए गए — क्योंकि वह बैंक रिकॉर्ड में नामांकित थीं। सुसमा मोहंती ने 13 जनवरी 2024 को मृत्यु से पहले ₹6.70 लाख की राशि निकाल ली थी।

स्निग्धा पटनायक ने अदालत का रुख करते हुए दावा किया कि वह विधिक रूप से विवाहित पत्नी और हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम के तहत प्रथम श्रेणी की उत्तराधिकारी हैं, अतः उन्हें सम्पत्ति में अधिकार मिलना चाहिए। पहले के एक अंतरिम आदेश के तहत बैंक ने ₹9.33 लाख पहले ही उन्हें दे दिए थे।

न्यायालय ने सुप्रीम कोर्ट के शक्ति यजदानी बनाम जयनंद जयंत सालगांवकर (2023) के निर्णय का हवाला देते हुए कहा कि “नामांकन उत्तराधिकार का स्वतंत्र माध्यम नहीं है।”

“मृतक की मृत्यु के पश्चात् जो भी संपत्ति/राशि उपलब्ध है, वह उत्तराधिकार कानून के अनुसार उसके विधिक उत्तराधिकारियों में वितरित होती है,” अदालत ने कहा। “सिर्फ इसलिए कि मां नामांकित थीं, इसका यह मतलब नहीं कि वह अकेली पूरे लाभ की हकदार हैं।”

अदालत ने यह भी कहा कि पत्नी होने के कारण और हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम की धारा 14 के अंतर्गत Class-I उत्तराधिकारी होने के नाते, स्निग्धा पटनायक को प्राथमिक अधिकार प्राप्त है। अदालत ने 2015 के बीमा अधिनियम संशोधन का भी उल्लेख करते हुए कहा कि “उस संशोधन के बावजूद, उत्तराधिकार कानून की प्राथमिकता बरकरार रहती है और नामांकित व्यक्ति को लाभार्थी मालिक नहीं माना जा सकता।”

अदालत ने केनरा बैंक को निर्देश दिया कि वह शेष ₹34.04 लाख (₹6.70 लाख की निकासी के बाद) स्निग्धा पटनायक को चार सप्ताह के भीतर ब्याज सहित प्रदान करे। हालांकि, ₹6.70 लाख की पहले की निकासी को वैध माना गया क्योंकि वह किसी भी अंतरिम आदेश से पहले की गई थी।

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वरिष्ठ अधिवक्ता भक्ति प्रसाद पटनायक ने कहा, “यह निर्णय उत्तराधिकार के मूल सिद्धांत को दोहराता है — केवल नामांकन से उत्तराधिकारी के अधिकार समाप्त नहीं होते।” उन्होंने कहा कि “धारा 8 के तहत Class-I उत्तराधिकारी को सर्वोपरि अधिकार है। बैंक और बीमा कंपनियों को यह समझना चाहिए कि नामित व्यक्ति केवल भुगतान प्राप्त करने का माध्यम होता है, न कि लाभार्थी मालिक।”

ओडिशा में उत्तराधिकार मामलों की पैरवी करने वाले अधिवक्ता सुमन मोहंती ने कहा, “2015 के बीमा अधिनियम संशोधन ने नामित और लाभार्थी के बीच भ्रम पैदा किया था। यह निर्णय स्पष्ट करता है कि संशोधन के बावजूद पत्नी का उत्तराधिकार अधिनियम के तहत दर्जा सर्वोपरि रहता है।”

यह फैसला उन कई मामलों के लिए मार्गदर्शक है जहां बैंक/बीमा नामांकन और उत्तराधिकार के दावे टकराते हैं। हाईकोर्ट ने यह साफ कर दिया कि नामांकन केवल प्रशासनिक प्रक्रिया है, जो उत्तराधिकार कानून के अधिकारों को समाप्त नहीं कर सकती।

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