दिल्ली हाईकोर्ट ने लिव-इन पार्टनर की नाबालिग बेटी के साथ यौन उत्पीड़न के दोषी व्यक्ति की 10 साल की सजा को बरकरार रखा है। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि यदि पीड़िता और अन्य गवाह अपने बयानों से मुकर भी जाएं (Hostile), तब भी पितृत्व (Paternity) साबित करने वाले वैज्ञानिक डीएनए साक्ष्य के आधार पर दोषसिद्धि कायम रखी जा सकती है।
न्यायमूर्ति चंद्रशेखरन सुधा की पीठ ने अपीलकर्ता ‘मन्नू’ द्वारा दायर आपराधिक अपील को खारिज कर दिया। अपीलकर्ता ने यौन अपराधों से बच्चों का संरक्षण (POCSO) अधिनियम की विशेष अदालत, पूर्वी जिला, दिल्ली के फैसले को चुनौती दी थी। निचली अदालत ने उसे पॉक्सो एक्ट की धारा 6 और भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा 376(2)(f) के तहत दोषी ठहराया था।
मामले की पृष्ठभूमि
अभियोजन पक्ष का मामला 30 जून 2017 को दर्ज की गई पीड़िता (PW1) की शिकायत पर आधारित था, जो उस समय लगभग 14 वर्ष की थी। पीड़िता ने आरोप लगाया था कि आरोपी, जो पिछले 6 वर्षों से उसकी मां के साथ लिव-इन रिलेशनशिप में रह रहा था, ने एफआईआर दर्ज होने से लगभग 8 महीने पहले कल्याणपुरी, दिल्ली स्थित उनके घर पर कई बार उसका यौन उत्पीड़न किया।
पीड़िता के अनुसार, आरोपी ने उसकी मां की अनुपस्थिति में उसके साथ दुष्कर्म किया और चाकू दिखाकर जान से मारने की धमकी दी। लगातार यौन शोषण के कारण पीड़िता गर्भवती हो गई थी। पुलिस ने जांच पूरी कर आईपीसी की धारा 363, 376, 506 और पॉक्सो एक्ट की धारा 6 के तहत आरोप पत्र दाखिल किया।
ट्रायल कोर्ट ने 23 अक्टूबर 2017 को आरोप तय किए और 8 फरवरी 2023 को आरोपी को दोषी करार दिया। इसके बाद उसे 10 साल के कठोर कारावास और 20,000 रुपये के जुर्माने की सजा सुनाई गई।
पक्षों की दलीलें
अपीलकर्ता (दोषी) के वकील ने तर्क दिया कि फोरेंसिक जांच के लिए भेजे गए नमूनों की कस्टडी (Chain of Custody) में गंभीर खामियां थीं। बचाव पक्ष ने एफएसएल रोहिणी के सहायक निदेशक (जीव विज्ञान) (PW13) की गवाही में विसंगति का हवाला दिया। उनका कहना था कि एफएसएल कार्यालय में प्राप्त पार्सल की संख्या में अंतर था, जो नमूनों के साथ छेड़छाड़ या ‘प्लांट’ किए जाने का संकेत देता है। इसलिए एफएसएल रिपोर्ट पर भरोसा नहीं किया जा सकता।
इसके विपरीत, राज्य की ओर से अतिरिक्त लोक अभियोजक ने दलील दी कि भले ही पीड़िता अपने बयानों से मुकर गई हो, लेकिन उसने स्पष्ट रूप से स्वीकार किया था कि उसके रक्त के नमूने लिए गए थे। चिकित्सा अधिकारी (PW15) ने भी इसकी पुष्टि की। अभियोजन पक्ष ने महिपाल बनाम राज्य (NCT ऑफ दिल्ली) (2020) के फैसले का हवाला देते हुए तर्क दिया कि गवाहों के मुकर जाने पर भी केवल डीएनए रिपोर्ट के आधार पर सजा बरकरार रखी जा सकती है।
कोर्ट की टिप्पणियां और विश्लेषण
हाईकोर्ट ने गौर किया कि ट्रायल के दौरान पीड़िता (PW1) और उसकी मां (PW2) दोनों अपने बयानों से मुकर गए थे। पीड़िता ने कोर्ट में कहा कि आरोपी ने उसके साथ कोई गलत काम नहीं किया। वहीं, आरोपी ने सीआरपीसी की धारा 313 के तहत अपने बयान में दावा किया कि उसे झूठा फंसाया गया है।
हालांकि, कोर्ट ने पाया कि पीड़िता का नाबालिग होना और एक बच्चे को जन्म देना निर्विवाद तथ्य हैं। पीठ ने डीएनए रिपोर्ट (Ex. PW13/A) पर कड़ा भरोसा जताया।
कोर्ट ने अपने फैसले में कहा:
“भले ही पीडब्ल्यू1 (पीड़िता) और पीडब्ल्यू2 (मां) अभियोजन पक्ष के मामले के प्रति शत्रुवत (Hostile) हो गए हैं, लेकिन वैज्ञानिक साक्ष्यों से यह स्पष्ट है कि पीड़िता के गर्भधारण के लिए आरोपी जिम्मेदार था। पीडब्ल्यू13 की गवाही, जिसमें कहा गया है कि रक्त के नमूनों की जांच से आरोपी के बच्चे का पिता होने की पुष्टि हुई है, को किसी भी तरह से गलत साबित नहीं किया गया है।”
नमूनों में छेड़छाड़ की दलील को खारिज करते हुए कोर्ट ने कहा कि आरोपी का पीड़िता की मां के साथ लिव-इन में रहने के कारण पीड़िता तक उसकी पहुंच थी और डीएनए प्रोफाइलिंग ने उसे जैविक पिता के रूप में निर्णायक रूप से स्थापित कर दिया है।
कोर्ट ने सीआरपीसी की धारा 232 के गैर-अनुपालन (बरी करने की सुनवाई) के एक प्रक्रियात्मक मुद्दे पर भी विचार किया। मोइदु के. बनाम केरल राज्य (2009) के फैसले का हवाला देते हुए कोर्ट ने कहा कि ऐसी चूक से कार्यवाही तब तक दूषित नहीं होती जब तक कि इससे आरोपी को गंभीर पूर्वाग्रह (Prejudice) न हुआ हो। मौजूदा मामले में ऐसा कोई पूर्वाग्रह नहीं पाया गया।
फैसला
दिल्ली हाईकोर्ट ने निष्कर्ष निकाला कि ट्रायल कोर्ट के निष्कर्षों में कोई कमी नहीं है। कोर्ट ने अपील खारिज करते हुए कहा:
“ऐसी परिस्थितियों में, आईपीसी की धारा 376(2)(f) और 506 तथा पॉक्सो एक्ट की धारा 6 के तहत आरोपी को दोषी ठहराने वाले ट्रायल कोर्ट के फैसले में कोई ऐसी त्रुटि नहीं है जिसमें इस कोर्ट द्वारा हस्तक्षेप की आवश्यकता हो।”
नतीजतन, 10 साल के कठोर कारावास की सजा को यथावत रखा गया।
मामले का विवरण:
- केस टाइटल: मन्नू बनाम राज्य (एनसीटी ऑफ दिल्ली सरकार)
- केस नंबर: CRL.A. 583/2024 और CRL.M. (BAIL) 1129/2024
- कोरम: न्यायमूर्ति चंद्रशेखरन सुधा
- अपीलकर्ता के वकील: मो. असलम, श्री सरोज के. और श्री चिरायु शर्मा, एडवोकेट्स।
- प्रतिवादी के वकील: श्री प्रदीप गहलोत (एपीपी), एसआई शुभ्रांशु के साथ; श्री हिमांशु आनंद गुप्ता (डीएसएलएसए), सुश्री मानसी यादव, श्री सिद्धार्थ बरुआ, सुश्री नवनीत कौर, श्री शेखर आनंद गुप्ता और सुश्री शिवानी रामपाल, एडवोकेट्स।

