संबंधों में खटास आने पर रेप का मुकदमा नहीं चलाया जा सकता: दिल्ली हाईकोर्ट ने रेप और SC/ST एक्ट की FIR रद्द की

दिल्ली हाईकोर्ट ने रेप और अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति (अत्याचार निवारण) अधिनियम (SC/ST Act) के तहत दर्ज एक एफआईआर (FIR) को रद्द कर दिया है। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि आपसी सहमति से बने संबंधों में खटास आने को आपराधीकरण का रूप नहीं दिया जा सकता। जस्टिस स्वर्ण कांता शर्मा की पीठ ने कहा कि निजी स्कोर सेट करने के लिए दंडनीय प्रावधानों का दुरुपयोग आपराधिक न्याय प्रणाली पर बोझ डालता है।

मामले की पृष्ठभूमि

याचिकाकर्ता डॉ. अवधेश कुमार ने दिल्ली हाईकोर्ट में याचिका दायर कर वजीराबाद पुलिस स्टेशन में धारा 376 (IPC) और SC/ST एक्ट की धारा 3(2)(v) के तहत दर्ज एफआईआर संख्या 904/2023 को रद्द करने की मांग की थी।

शिकायतकर्ता (अभियोक्त्रि) का आरोप था कि वह याचिकाकर्ता को करीब चार साल से जानती थी और उनकी मुलाकात एक छात्र संगठन के जरिए हुई थी। 2022 में जब याचिकाकर्ता कोलकाता गए, तो वे व्यक्तिगत रूप से मिले। मार्च 2023 में पीएचडी में प्रवेश मिलने के बाद शिकायतकर्ता दिल्ली आ गई, जहां उनकी मुलाकातें बढ़ गईं।

शिकायत के अनुसार, 03.04.2023 को शिकायतकर्ता याचिकाकर्ता के फ्लैट पर डिनर के लिए गई थी, जहां आरोपी ने कथित तौर पर जातिसूचक टिप्पणियां कीं और जबरन शारीरिक संबंध बनाए। आरोप था कि याचिकाकर्ता ने शादी का झांसा देकर उसे गुमराह किया और बाद में उससे किनारा कर लिया। यह एफआईआर कथित घटना के करीब पांच महीने बाद 13.09.2023 को दर्ज की गई थी।

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पक्षों की दलीलें

याचिकाकर्ता के वकील ने तर्क दिया कि दोनों के बीच 2019 से 2023 तक सहमति से संबंध थे। उन्होंने जांच के दौरान सत्यापित व्हाट्सएप चैट का हवाला दिया, जिसमें जबरन यौन शोषण या जाति-आधारित दुर्व्यवहार का कोई संकेत नहीं था। याचिकाकर्ता ने यह भी कहा कि शिकायतकर्ता ने एफआईआर में महत्वपूर्ण तथ्यों को छुपाया है, जिसमें जनवरी 2023 में उसके फ्लैट पर तीन दिन तक रहने की बात शामिल है।

वहीं, राज्य और शिकायतकर्ता के वकील ने याचिका का विरोध करते हुए कहा कि आरोप गंभीर प्रकृति के हैं। उनका तर्क था कि याचिकाकर्ता ने शादी के झूठे बहाने पर यौन शोषण किया और अभियोक्त्रि की गरिमा और सामाजिक पहचान का उल्लंघन करते हुए जातिसूचक अपशब्द कहे।

हाईकोर्ट का विश्लेषण

हाईकोर्ट ने रिकॉर्ड पर मौजूद सामग्री, जिसमें संबंधों की प्रकृति, एफआईआर में देरी, मेडिकल साक्ष्य और व्हाट्सएप चैट शामिल थे, का बारीकी से विश्लेषण किया।

  • सहमतिपूर्ण संबंध: कोर्ट ने पाया कि दोनों पक्ष लगभग चार वर्षों से संपर्क में थे और स्वेच्छा से मिलते थे। रिकॉर्ड पर मौजूद व्हाट्सएप चैट से पता चला कि शिकायतकर्ता ने अप्रैल 2020 में ही याचिकाकर्ता के प्रति अपने प्रेम का इजहार किया था। कोर्ट ने कहा कि पूरी बातचीत यह दर्शाती है कि यह एक सहमतिपूर्ण रोमांटिक रिश्ता था, न कि ऐसा रिश्ता जो शादी के वादे पर आधारित था।
  • व्हाट्सएप वार्तालाप: कोर्ट ने रेखांकित किया कि कथित घटना (03.04.2023) के दिन और उसके बाद की चैट सामान्य और सहज थी। शिकायतकर्ता ने बिना किसी तत्काल विरोध या परेशानी के याचिकाकर्ता से बात करना जारी रखा। कोर्ट ने टिप्पणी की कि संदेशों का लहजा किसी भी तरह के संकट या विरोध का संकेत नहीं देता है।
  • एफआईआर में देरी: कोर्ट ने एफआईआर दर्ज करने में हुई पांच महीने की देरी का संज्ञान लिया। कोर्ट ने कहा कि यद्यपि यौन अपराधों में देरी हमेशा घातक नहीं होती, लेकिन जब इसे पार्टियों के बीच निरंतर संपर्क के साथ देखा जाता है, तो यह महत्वपूर्ण हो जाती है।
  • शादी का झूठा वादा: कोर्ट को ऐसा कोई सबूत नहीं मिला जिससे यह साबित हो सके कि याचिकाकर्ता ने सहमति प्राप्त करने के लिए रिश्ते की शुरुआत में शादी का कोई झूठा वादा किया था। सुप्रीम कोर्ट के प्रदीप कुमार केसरवानी बनाम उत्तर प्रदेश राज्य के फैसले का हवाला देते हुए, हाईकोर्ट ने ‘झूठे वादे’ और ‘वादा तोड़ने’ के बीच अंतर किया। कोर्ट ने कहा कि रिश्ता धीरे-धीरे विकसित हुआ था और यह याचिकाकर्ता द्वारा किसी तत्काल प्रलोभन का परिणाम नहीं था।
  • SC/ST एक्ट के आरोप: SC/ST एक्ट की धारा 3(2)(v) के तहत आरोपों पर कोर्ट ने स्पष्ट किया कि अपराध केवल इस आधार पर किया गया होना चाहिए कि पीड़ित अनुसूचित जाति का है। सत्यापित व्हाट्सएप चैट में कोई जाति-आधारित दुर्व्यवहार नहीं पाया गया। पीठ ने कहा कि केवल आरोप लगाना, जो समकालीन सामग्री या परिस्थितियों द्वारा समर्थित न हो, इस प्रावधान को लागू करने के लिए पर्याप्त नहीं है।
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फैसला

कोर्ट ने निष्कर्ष निकाला कि यह मामला एक विफल रिश्ते का उदाहरण है, जहां रिश्ते के टूटने के परिणामों को आपराधिक कार्यवाही के माध्यम से निपटाने की कोशिश की गई। पीठ ने महत्वपूर्ण टिप्पणी की:

“हर खट्टे हो चुके रिश्ते को रेप के अपराध में बदल देना न केवल अपराध की गंभीरता को कम करता है, बल्कि आरोपी पर अमिट कलंक और घोर अन्याय भी थोपता है।”

तदनुसार, दिल्ली हाईकोर्ट ने याचिका स्वीकार करते हुए एफआईआर संख्या 904/2023 और उससे जुड़ी सभी कार्यवाहियों को रद्द (Quash) कर दिया।

केस डिटेल्स:

  • केस टाइटल: डॉ अवधेश कुमार बनाम स्टेट एनसीटी ऑफ दिल्ली और अन्य
  • केस नंबर: CRL.M.C. 3/2025
  • कोरम: जस्टिस स्वर्ण कांता शर्मा

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